अटल बिहारी वाजपेयी : राजनीति में अटल संकल्प, शब्दों में कविता और हृदय में बसता था भारत*
|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
*अटल बिहारी वाजपेयी : राजनीति में अटल संकल्प, शब्दों में कविता और हृदय में बसता था भारत*
कुछ व्यक्तित्व समय के साथ इतिहास बन जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो इतिहास का हिस्सा बनने के बाद भी जनमानस की स्मृतियों में लगातार जीवित रहते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी ऐसा ही एक विराट व्यक्तित्व थे। वे भारत के प्रधानमंत्री रहे, विपक्ष के नेता रहे, विदेश मंत्री रहे, सांसद रहे, पत्रकार रहे और सबसे बढ़कर एक संवेदनशील कवि रहे। उनके भीतर राजनीति की दृढ़ता और कविता की कोमलता का अद्भुत संगम था। 16 अगस्त 2018 को उनके निधन के बाद हर वर्ष 16 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि आती है तो देश केवल अपने पूर्व प्रधानमंत्री को याद नहीं करता, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति को भी स्मरण करता है जिसमें असहमति के बीच संवाद, सत्ता के बीच संयम और राष्ट्रहित को राजनीति से ऊपर रखने की परंपरा थी।
अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक जीवन संघर्षों से होकर गुजरा। 1952 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली। पराजय ने उनके कदम नहीं रोके। 1957 में बलरामपुर से लोकसभा के लिए चुने गए और इसके बाद भारतीय राजनीति में उनकी पहचान लगातार मजबूत होती गई। भारतीय जनसंघ के संस्थापक नेताओं में शामिल होकर उन्होंने संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत किया और 1968 से 1973 तक उसके अध्यक्ष रहे।
वे पत्रकार भी थे और राष्ट्रधर्म, पांचजन्य तथा वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने विचारों को समाज तक पहुंचाते रहे। पत्रकारिता ने उनकी भाषा को धार दी और राजनीति ने उनके विचारों को व्यापक मंच दिया। 1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री बने तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की आवाज को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के समय वे उसके प्रमुख संस्थापक नेताओं में रहे और उसके प्रथम अध्यक्ष बने।
उनका राजनीतिक जीवन लगभग चार दशकों तक संसद से जुड़ा रहा। लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यह लंबी संसदीय यात्रा केवल पदों की संख्या नहीं थी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के बदलते दौर की साक्षी थी।
अटल जी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने। 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री पद संभाला, लेकिन बहुमत सिद्ध न कर पाने के कारण 13 दिन बाद इस्तीफा देना पड़ा। 19 मार्च 1998 को उन्होंने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। गठबंधन सहयोगी के समर्थन वापस लेने के कारण उनकी सरकार 1999 में गिर गई। इसके बाद 13 अक्टूबर 1999 को वे तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और 2004 तक उन्होंने सरकार का नेतृत्व किया।
उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में गठबंधन सरकार को स्थायित्व देना माना जाता है। अनेक दलों और अलग-अलग राजनीतिक विचारों को साथ लेकर सरकार चलाना उस दौर में आसान नहीं था। अटल जी ने संवाद, सहमति और राजनीतिक संतुलन के सहारे गठबंधन को सफलतापूर्वक चलाया। यही कारण है कि वे केवल अपनी पार्टी के नेता नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में गठबंधन राजनीति के एक महत्वपूर्ण शिल्पकार के रूप में भी याद किए जाते हैं।
अटल जी का व्यक्तित्व केवल मधुर भाषणों तक सीमित नहीं था। वे आवश्यकता पड़ने पर साहसिक निर्णय लेने वाले नेता भी थे। 1998 में उनके नेतृत्व में पोखरण में परमाणु परीक्षण किए गए। अंतरराष्ट्रीय दबाव और संभावित प्रतिबंधों की आशंकाओं के बावजूद भारत ने अपनी सामरिक क्षमता का प्रदर्शन किया।
लेकिन शक्ति के प्रति उनका दृष्टिकोण युद्धोन्मादी नहीं था। वे मजबूत भारत को शांति का आधार मानते थे। उनका विश्वास था कि राष्ट्र की सुरक्षा मजबूत होगी तो वह दुनिया के सामने अपनी स्वतंत्र नीति के साथ खड़ा रह सकेगा। इसी कारण उनकी राजनीति में शक्ति और शांति दोनों साथ दिखाई देते हैं।
वे देश की वास्तविक चुनौतियों को भी पहचानते थे। उनका सपना ऐसा भारत था जो भूख, भय, निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो। वे मानते थे कि बेरोजगारी, बीमारी, गरीबी और पिछड़ापन भी राष्ट्र के विरुद्ध बड़ी चुनौतियां हैं। व्यक्ति का विकास ही राष्ट्र की मजबूती की आधारशिला है, यह विचार उनके सार्वजनिक जीवन में लगातार दिखाई देता रहा।
संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की गूंज
अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन का सबसे गौरवपूर्ण प्रसंग 4 अक्टूबर 1977 का है, जब विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में ऐतिहासिक भाषण दिया। यह केवल भाषा का गौरव नहीं था, बल्कि भारत के आत्मविश्वास की अंतरराष्ट्रीय अभिव्यक्ति थी।
वह शीतयुद्ध का दौर था। दुनिया दो बड़े शक्ति-गुटों में विभाजित थी और भारत गुटनिरपेक्षता की नीति के माध्यम से अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए हुए था। अटल जी ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से भारत की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता और मानवाधिकारों की रक्षा का संदेश दिया। आपातकाल के बाद देश में लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं की पुनर्स्थापना को उन्होंने विश्व समुदाय के सामने रखा।
उनके विचारों में भारत की प्राचीन विश्व-दृष्टि भी स्पष्ट थी। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को वे केवल श्लोक नहीं, बल्कि विश्व व्यवस्था के लिए एक मानवीय दृष्टिकोण मानते थे। उनका विश्वास था कि दुनिया के राष्ट्र एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भर न रहें, बल्कि सहयोग और सह-अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़ें। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी के माध्यम से भारत की बात रखने वाला उनका संबोधन आज भी भारतीय कूटनीति के गौरवपूर्ण क्षणों में गिना जाता है।
अटल जी को केवल राजनेता के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। वे मूल रूप से संवेदनशील कवि थे। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी स्वयं कवि थे और घर का साहित्यिक वातावरण अटल जी के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता रहा।
‘मेरी इक्यावन कविताएँ’ उनका प्रसिद्ध काव्य-संग्रह है। ‘कैदी कविराय की कुण्डलियाँ’, ‘अमर आग है’, ‘राजनीति की रपटीली राहें’, ‘बिन्दु-बिन्दु विचार’ और ‘संसद में तीन दशक’ जैसी रचनाएं उनके साहित्यिक और राजनीतिक चिंतन की व्यापकता को सामने लाती हैं। उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम है, लेकिन केवल भावुकता नहीं। उनमें संघर्ष है, लेकिन निराशा नहीं। उनमें पीड़ा है, लेकिन उसके साथ आशा भी है।
किशोर अवस्था में लिखी गई उनकी कविता ‘हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय’ उनके प्रारंभिक वैचारिक संस्कारों की झलक देती है। वहीं ‘पंद्रह अगस्त का दिन कहता’ जैसी रचना स्वतंत्रता के उल्लास के साथ विभाजन, विस्थापन और अधूरे सपनों की पीड़ा को सामने लाती है। उनका कवि मन राष्ट्र के गौरव के साथ समाज के दुख को भी महसूस करता था।
उनकी कविता उनके लिए केवल साहित्य नहीं थी। वह संघर्ष का संकल्प थी। उनका मानना था कि कविता निराशा का स्वर नहीं, आत्मविश्वास का जयघोष होनी चाहिए। यही कारण है कि उनकी कविताएं आज भी कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।
ऐसा वक्ता जिसकी खामोशी भी सुनी जाती थी
अटल जी की वाणी उनकी सबसे बड़ी शक्तियों में से एक थी। वे शब्दों को केवल बोलते नहीं थे, उन्हें प्रभाव में बदल देते थे। उनके भाषणों में ठहराव था, हास्य था, व्यंग्य था और गंभीर चिंतन भी था। वे विरोधी पर प्रहार करते हुए भी भाषा की मर्यादा नहीं छोड़ते थे।
उनकी वाक्पटुता का प्रभाव ऐसा था कि राजनीतिक विरोधी भी उन्हें सुनने के लिए उत्सुक रहते थे। आपातकाल के बाद के दौर में उनके भाषणों ने जनता में नई ऊर्जा पैदा की। मंच पर आते ही वातावरण बदल जाता था। उनके भाषणों में हास्य की ऐसी सहजता थी कि गंभीर राजनीतिक प्रसंग भी सुनने वालों के लिए जीवंत हो उठते थे।
इंदिरा गांधी द्वारा उनके हाथ हिलाकर बोलने की शैली पर टिप्पणी किए जाने के प्रसंग में उनका हास्यपूर्ण प्रत्युत्तर आज भी उनके सहज विनोदबोध की याद दिलाता है। वे कटाक्ष करते थे, लेकिन कटुता नहीं पैदा करते थे। यही उनकी वाणी को दूसरों से अलग बनाता था।
अटल जी का लोकतंत्र पर विश्वास गहरा था। वे असहमति को लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति मानते थे। उनके लिए विरोधी राजनीतिक शत्रु नहीं था। यही कारण था कि विचारधारात्मक मतभेदों के बावजूद विभिन्न दलों के नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध सम्मान और संवाद पर आधारित रहे।
उनका प्रसिद्ध विचार था कि मित्र बदले जा सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं। इस छोटे से वाक्य में उनकी विदेश नीति की व्यावहारिकता छिपी हुई थी। वे पड़ोसियों के साथ शांति चाहते थे, लेकिन राष्ट्रीय हित और सुरक्षा के प्रश्न पर समझौता करने के पक्ष में नहीं थे।
उनके लिए राजनीति सत्ता प्राप्त करने की सीढ़ी नहीं, राष्ट्रसेवा का माध्यम थी। यही भावना उनके जीवन को विशिष्ट बनाती है। आजीवन अविवाहित रहकर उन्होंने अपना जीवन सार्वजनिक सेवा को समर्पित किया। उनके व्यक्तित्व में त्याग, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव लगातार दिखाई देता रहा।
अटल जी की अमर विरासत
2015 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री को नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, पत्रकारिता, साहित्य, वक्तृत्व और सार्वजनिक जीवन को समृद्ध करने वाले एक महान व्यक्तित्व को दिया गया सम्मान था।
16 अगस्त 2018 को उनके निधन के साथ भारतीय राजनीति ने एक युगपुरुष खो दिया। लेकिन अटल जी की मृत्यु उनके विचारों का अंत नहीं थी। उनकी कविताएं आज भी पढ़ी जाती हैं, उनके भाषण आज भी सुने जाते हैं और उनके राजनीतिक विचार आज भी चर्चा का विषय बनते हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि उनके भीतर अनेक व्यक्तित्व एक साथ जीवित थे। वे दृढ़ निर्णय लेने वाले प्रधानमंत्री थे तो संवेदनशील कवि भी थे। वे प्रखर राष्ट्रवादी थे तो लोकतांत्रिक संवाद के समर्थक भी। वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की शक्ति का प्रतिनिधित्व करते थे तो मानवता और विश्वबंधुत्व की बात भी करते थे।
उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह उस राजनीतिक आदर्श को याद करना है जिसमें राष्ट्रहित सर्वोपरि हो, लोकतंत्र में विश्वास अटूट हो, विरोध में भी मर्यादा बनी रहे और शक्ति के साथ संवेदना का संतुलन कायम रहे।
अटल जी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका अटल विश्वास हमारे साथ है। उनका जीवन बताता है कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, राष्ट्र निर्माण की साधना भी हो सकती है। उनकी कविता बताती है कि कठिनाइयों के बीच भी आशा जीवित रखी जा सकती है। उनकी वाणी बताती है कि शब्दों में इतनी शक्ति हो सकती है कि वे पीढ़ियों को दिशा दे दें। और उनका जीवन यह संदेश देता है कि व्यक्ति चला जाता है, लेकिन उसके विचार यदि राष्ट्र के मन में उतर जाएं तो वह हमेशा जीवित रहता है। अटल बिहारी वाजपेयी इसी अर्थ में आज भी अटल हैं।
*कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space






