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“कांग्रेस के बिखराव पर भाजपा का माइक्रो मैनेजमेंट भारी पड़ा”

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कांग्रेस के बिखराव पर भाजपा का माइक्रो मैनेजमेंट भारी पड़ा”
मेयर चुनाव के नतीजों ने विधानसभा की सियासत के भी संकेत दिए’

राजस्थान के निकाय चुनावों में मेयर और निकाय प्रमुखों के चुनाव ने एक बार फिर प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच संगठनात्मक अंतर को सामने ला दिया है। वार्डों में मिले वोटों का अंतर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन निकाय प्रमुखों के पदों पर भाजपा ने जिस तरह अपनी बढ़त को निर्णायक जीत में बदला, उससे स्पष्ट है कि चुनाव केवल जनसमर्थन से नहीं बल्कि संगठन, रणनीति और चुनाव के बाद की राजनीतिक सक्रियता से भी जीते जाते हैं। भाजपा ने जहां अपने पार्षदों को एकजुट रखा, वहीं निर्दलीयों और असंतुष्ट खेमों से संवाद कायम कर कई जगह ऐसे समीकरण बनाए जिनकी कल्पना चुनाव परिणाम आने के समय आसान नहीं थी।
इसे चाणक्य की चर्चित राजनीतिक अवधारणा साम, दाम, दंड और भेद के संदर्भ में देखा जा सकता है। हालांकि लोकतांत्रिक राजनीति में इन शब्दों का अर्थ परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकता है, लेकिन राजस्थान के निकाय चुनाव में भाजपा की रणनीति में संवाद, राजनीतिक समीकरण, अनुशासन और विरोधी खेमे की कमजोरी को पहचानने जैसे सभी तत्व दिखाई दिए। जहां समर्थन की जरूरत थी वहां संवाद हुआ, जहां समीकरण बदलने की संभावना थी वहां निर्दलीयों से संपर्क साधा गया और जहां अपने संगठन को टूटने से बचाना था वहां अनुशासन को प्राथमिकता दी गई। यही कारण रहा कि कई निकायों में भाजपा ने अपने मूल आंकड़े से कहीं अधिक समर्थन जुटाया।
अजमेर इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। वहां कांग्रेस के 37 पार्षद और भाजपा के 32 पार्षद चुने गए थे, जबकि 11 निर्दलीय पार्षदों ने पूरे समीकरण को खुला रखा था। मेयर चुनाव में भाजपा की अनामिका शर्मा को 43 वोट मिले और कांग्रेस प्रत्याशी को 37 वोट मिले। यानी चुनाव से पहले संख्या बल कांग्रेस के पक्ष में दिखाई दे रहा था, लेकिन चुनाव के बाद राजनीतिक प्रबंधन ने पूरा समीकरण बदल दिया। पाली में भी कांग्रेस के 29 पार्षद होने के बावजूद उसके प्रत्याशी को केवल 3 वोट मिले, जबकि भाजपा की नमिता बुबकिया 33 वोट लेकर मेयर बनीं। यह अंतर केवल आंकड़ों का नहीं बल्कि संगठनात्मक एकजुटता और चुनावी प्रबंधन का भी संकेत है।
डूंडलोद नगर पालिका का परिणाम तो इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। यहां भाजपा के केवल दो पार्षद जीते, कांग्रेस के आठ और निर्दलीयों के दस पार्षद थे। इसके बावजूद भाजपा समर्थित सचिन सैनी अध्यक्ष बन गए और उन्हें 11 वोट मिले। इसका सीधा अर्थ है कि भाजपा ने चुनाव को केवल अपने जीते हुए पार्षदों की संख्या के आधार पर नहीं देखा, बल्कि चुनाव के बाद बनने वाले व्यापक राजनीतिक समीकरणों को भी साधा।
यही भाजपा की चुनावी कार्यशैली की बड़ी विशेषता दिखाई देती है। विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा, पंचायत हो या निकाय, पार्टी चुनाव खत्म होने के बाद संगठन को निष्क्रिय नहीं छोड़ती। निकाय चुनाव में भी पार्षदों की बाड़ाबंदी से लेकर नेतृत्व के स्तर पर लगातार संपर्क तक पार्टी ने अपने संगठनात्मक ढांचे का इस्तेमाल किया। भाजपा के लिए चुनाव केवल मतदान के दिन की गतिविधि नहीं बल्कि उससे पहले और उसके बाद तक चलने वाली सतत प्रक्रिया बन गया है।
निकाय चुनाव के उपलब्ध आंकड़े भी इसी अंतर को सामने रखते हैं। 309 शहरी निकायों में भाजपा ने 10,235 वार्डों में से 4,179 वार्ड जीते, जबकि कांग्रेस को 3,613 वार्ड मिले। भाजपा का मत प्रतिशत 35.18 रहा और कांग्रेस का 34.24 प्रतिशत। दोनों दलों के बीच केवल 0.94 प्रतिशत मतों का अंतर रहा, लेकिन निकाय प्रमुखों के पदों में यह अंतर बहुत बड़ा हो गया। भाजपा ने करीब 65 प्रतिशत निकाय प्रमुख पदों पर कब्जा जमाया, जबकि कांग्रेस का हिस्सा करीब 32 प्रतिशत रहा। यानी मामूली मतांतर को भाजपा ने राजनीतिक बढ़त में बदल दिया।
उदयपुर में पारस सिंघवी को 55 वोट मिले और कांग्रेस प्रत्याशी को 25 वोटों पर संतोष करना पड़ा। अलवर में सुमनलता अग्रवाल को 42 वोट मिले, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी को 23 वोट मिले। भरतपुर और भीलवाड़ा में भाजपा समर्थित उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। वहीं बीकानेर में कांग्रेस अपना मेयर बनाने में सफल रही। इन परिणामों से यह भी स्पष्ट होता है कि कांग्रेस पूरी तरह राजनीतिक मुकाबले से बाहर नहीं है, लेकिन अनेक स्थानों पर वह अपने ही जीते हुए पार्षदों को एकजुट रखने और उनके बीच सहमति बनाने में पिछड़ गई।
राजस्थान की राजनीति के लिए इन परिणामों का महत्व केवल नगर निगमों तक सीमित नहीं माना जा सकता। पंचायतीराज और निकाय चुनाव अक्सर प्रदेश के राजनीतिक वातावरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। इन्हें विधानसभा चुनाव का सीधा परिणाम मानना सही नहीं होगा, क्योंकि स्थानीय चुनावों में स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, व्यक्तिगत संबंध और स्थानीय मुद्दों की भूमिका बहुत अधिक होती है। फिर भी संगठन की सक्रियता, मतदाताओं का रुझान और दोनों प्रमुख दलों की चुनावी क्षमता के बारे में इन चुनावों से महत्वपूर्ण संकेत जरूर मिलते हैं।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही दिखाई देती है कि उसे केवल भाजपा की आलोचना से आगे बढ़कर अपने संगठन को मजबूत करना होगा। चुनाव के दौरान कांग्रेस का पारंपरिक स्थानीय नेतृत्व कई स्थानों पर सक्रिय रहा, लेकिन भाजपा ने स्थानीय चुनाव को भी बड़े चुनाव की तरह प्रबंधित किया। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय नेताओं तक का प्रचार में उतरना और चुनाव परिणाम आने के बाद प्रत्येक पार्षद के स्तर तक राजनीतिक संपर्क बनाए रखना भाजपा की रणनीति का हिस्सा रहा। कांग्रेस के नेताओं की ओर से स्वयं यह स्वीकार किया गया कि यदि सभी नेता मिलकर अधिक आक्रामक तरीके से प्रचार करते तो परिणाम बेहतर हो सकते थे। यह स्वीकारोक्ति संगठनात्मक कमजोरी की ओर संकेत करती है।
भाजपा के पक्ष में एक और महत्वपूर्ण बात जनता के बीच सरकार के कामकाज और विकास की राजनीति को स्थानीय चुनावों से जोड़ने की उसकी कोशिश रही। ट्रिपल इंजन सरकार के माध्यम से केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों में एक ही राजनीतिक दल के होने से विकास कार्यों को गति देने का संदेश भाजपा ने मतदाताओं के सामने रखा। स्थानीय स्तर पर यह संदेश कितना प्रभावी रहा, यह हर क्षेत्र में अलग-अलग रहा होगा, लेकिन भाजपा ने इसे एक संगठित चुनावी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल किया।
इसके विपरीत कांग्रेस के सामने वैचारिक और संगठनात्मक दोनों स्तरों पर चुनौती है। भाजपा लंबे समय से हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और विकास को अपनी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनाकर चुनाव मैदान में उतरती रही है। कांग्रेस की ओर से हिंदू और हिंदुत्व जैसे विषयों पर दिए जाने वाले बयानों को भाजपा राजनीतिक रूप से अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश करती है। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह अपनी राजनीतिक भाषा और जनसंपर्क की ऐसी शैली विकसित करे जिसमें उसके आर्थिक, सामाजिक और जनकल्याण के मुद्दे स्पष्ट रूप से जनता तक पहुंचें और उसकी बात भाजपा के राजनीतिक विमर्श में दब न जाए।
राहुल गांधी के सामने भी यही चुनौती है कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति के साथ राजस्थान जैसे राज्यों में संगठन को बूथ और वार्ड स्तर तक मजबूत करने की जिम्मेदारी पार्टी के भीतर स्पष्ट रूप से तय हो। केवल बड़े नेताओं के भाषण और चुनावी सभाएं संगठन का विकल्प नहीं बन सकतीं। निकाय चुनावों ने दिखाया है कि मतदान के बाद पार्षदों को साथ रखना, स्थानीय नेतृत्व में तालमेल बनाना और निर्दलीयों से संवाद करना भी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा है।
भाजपा की इस जीत को केवल साम, दाम, दंड और भेद की नीति का परिणाम कहना भी अधूरा होगा। इसके पीछे संगठन की निरंतर सक्रियता, चुनावी तैयारी, नेतृत्व का समन्वय, स्थानीय समीकरणों की समझ और अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों पर नियंत्रण जैसे अनेक कारण दिखाई देते हैं। भाजपा कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरियों को पहचानने और उनका चुनावी लाभ उठाने में सफल रही है। कांग्रेस के लिए संदेश साफ है कि केवल भाजपा विरोध पर्याप्त नहीं होगा। उसे अपने संगठन, नेतृत्व, कार्यकर्ताओं और स्थानीय राजनीतिक प्रबंधन को नए सिरे से मजबूत करना होगा।
राजस्थान की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला अभी लंबा है। निकाय चुनाव ने भाजपा को राजनीतिक बढ़त जरूर दी है, लेकिन विधानसभा की राजनीति का अंतिम फैसला केवल नगर निकायों के परिणामों से नहीं होता। फिर भी इन चुनावों ने इतना जरूर दिखा दिया है कि भाजपा चुनावी मैदान में केवल मतों की लड़ाई नहीं लड़ती, बल्कि पूरे राजनीतिक समीकरण को अपने पक्ष में करने की कोशिश करती है। कांग्रेस यदि इस अंतर को नहीं समझती और अपने बिखराव को दूर नहीं करती तो आने वाले चुनावों में उसके सामने चुनौती और बड़ी हो सकती है।

    *कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*

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