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आत्मचिंतन से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त दूसरों की निंदा नहीं, आत्मदर्शन से होगा आत्मकल्याण : जिनेंद्र मुनि मसा

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आत्मचिंतन से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त
दूसरों की निंदा नहीं, आत्मदर्शन से होगा आत्मकल्याण : जिनेंद्र मुनि मसा
भीतर के दोषों को पहचानकर सुधारना ही सच्ची साधना
कांतिलाल मांडोत
गोगुंदा 30 सितम्बर 26
कस्बे के ब्रह्मपुरी स्थित स्थानकवासी जैन स्थानक में बुधवार को आध्यात्मिक चातुर्मास के अंतर्गत धर्मसभा का आयोजन हुआ। धर्मसभा में साधु-साध्वियों ने आत्मचिंतन, आत्मदर्शन, संयम और आध्यात्मिक मूल्यों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को जीवन में धर्म के सिद्धांतों को अपनाने का संदेश दिया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे और संतों के प्रवचनों का श्रवण कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
जिनेंद्र मुनि मसा ने प्रवचन में कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में दूसरों की कमियां और दोष देखने के बजाय स्वयं के भीतर झांकना चाहिए। दूसरों की निंदा करने से आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता। इसके लिए व्यक्ति को अपने आचरण, विचार और व्यवहार का निरंतर निरीक्षण करना आवश्यक है। आत्मदर्शन और स्वदर्शन के माध्यम से ही व्यक्ति अपनी वास्तविक स्थिति को समझ सकता है तथा अपने भीतर मौजूद कमियों को दूर करने का प्रयास कर सकता है।
संत ने कहा कि यदि मनुष्य अरिहंत बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है तो उसे अरिहंत के गुणों का चिंतन करना होगा। केवल बाहरी रूप से प्रभु का दर्शन कर लेने से आत्मिक परिवर्तन संभव नहीं होता। जब तक व्यक्ति स्वयं के भीतर स्थित गुणों और दोषों को पहचानने का प्रयास नहीं करता, तब तक प्रभु के वास्तविक स्वरूप को समझना भी कठिन है। धर्म का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में आत्मजागरण और सद्गुणों का विकास करना भी है।
मुनि ने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य बाहरी प्रदर्शन की दौड़ में लगातार आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। समाज में अपनी छवि बनाने और दूसरों को प्रभावित करने की इच्छा बढ़ती जा रही है, लेकिन वास्तविक आवश्यकता स्वयं को पहचानने की है। व्यक्ति यदि कुछ समय अपने भीतर झांककर आत्मचिंतन करे तो उसे अपने जीवन की अनेक कमियों का पता चल सकता है। आत्मनिरीक्षण से प्राप्त यह बोध जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकता है। प्रवचन के दौरान उन्होंने चार कथाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, आत्मदर्शन और आध्यात्मिक जीवन के महत्व को सरल ढंग से समझाया।
परम विदुषी साध्वी डॉ. राजश्रीजी म.सा. ने कहा कि आत्मनिंदा का अर्थ स्वयं को नीचा दिखाना या स्वयं को कमजोर समझना नहीं है। आत्मनिंदा का वास्तविक आशय अपने भीतर मौजूद दोषों को पहचानना और उन्हें दूर करने के लिए निरंतर प्रयास करना है। जब व्यक्ति अपनी कमियों को स्वीकार करता है, तभी उनमें सुधार की शुरुआत होती है। उन्होंने कहा कि संसार सागर से पार उतरने के लिए बाहरी दिखावे से अधिक जरूरी अपने अंतर की ओर देखना है।
साध्वीजी ने कहा कि मनुष्य अक्सर दूसरों के दोषों को बहुत आसानी से देख लेता है, लेकिन स्वयं की कमियों को स्वीकार करने में संकोच करता है। आध्यात्मिक साधना व्यक्ति को इसी प्रवृत्ति से बाहर निकालती है। आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति अपने क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह और अन्य विकारों को पहचानकर उनसे दूर होने का प्रयास कर सकता है। यही प्रक्रिया आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
धर्मसभा में कमोल, तरपाल, मुंबई और उदयपुर सहित विभिन्न स्थानों से समाजजन पहुंचे। बाहर से आए श्रद्धालुओं तथा साधु-साध्वियों का समाजजनों की ओर से स्वागत किया गया। चातुर्मास के दौरान आयोजित हो रही धर्मसभाओं से श्रद्धालुओं को नियमित रूप से आध्यात्मिक चिंतन और धर्मोपदेश सुनने का अवसर मिल रहा है।
कार्यक्रम के समापन पर महाश्रमण जिनेंद्र मुनि म.सा. ने मंगल पाठ सुनाया। कार्यक्रम का संचालन संयोजक सुंदरलाल मेहता ने किया। धर्मसभा में जैन समाज के बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। पूरे आयोजन में आत्मचिंतन, आत्मदर्शन और अपने जीवन के दोषों को पहचानकर उनमें सुधार करने का संदेश प्रमुख रूप से सामने आया।

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