*गांवों की चौपाल से देश के विकास तक पहुंचती प्रधानमंत्री की आवाज*
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मन की बात ने रेडियो को फिर बनाया जनसंवाद का सशक्त माध्यम
*गांवों की चौपाल से देश के विकास तक पहुंचती प्रधानमंत्री की आवाज*
डिजिटल युग में जब समाचार और विचारों के लिए मोबाइल फोन तथा इंटरनेट सबसे तेज माध्यम बन चुके हैं, तब रेडियो पर प्रसारित होने वाला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘मन की बात’ कार्यक्रम अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। महीने के अंतिम रविवार को प्रसारित होने वाले इस कार्यक्रम का इंतजार देश के अनेक हिस्सों में लोग पहले से करते हैं। कहीं परिवार साथ बैठकर इसे सुनता है तो कहीं गांव की चौपाल, पंचायत भवन या सार्वजनिक स्थान पर लोग रेडियो अथवा टेलीविजन के माध्यम से सामूहिक रूप से कार्यक्रम सुनते हैं। यही सामूहिक श्रवण ‘मन की बात’ को केवल प्रधानमंत्री का संबोधन नहीं रहने देता, बल्कि इसे समाज और देश के बीच संवाद का माध्यम बनाता है।
‘मन की बात’ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें केवल सरकार की योजनाओं या उपलब्धियों की चर्चा नहीं होती, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में सामान्य नागरिकों द्वारा किए जा रहे उल्लेखनीय कार्यों को भी सामने लाया जाता है। प्रधानमंत्री अक्सर ऐसे लोगों का उल्लेख करते हैं जिन्होंने अपने छोटे से प्रयास को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। किसी ने पर्यावरण संरक्षण का बीड़ा उठाया, किसी ने स्थानीय कला और परंपरा को बचाने का प्रयास किया, किसी ने स्वच्छता को अभियान बनाया तो किसी ने युवाओं को सामाजिक कार्यों से जोड़ने की पहल की। इस तरह कार्यक्रम में देश के उन लोगों को राष्ट्रीय मंच मिलता है, जिनका काम सामान्य परिस्थितियों में स्थानीय सीमा से आगे नहीं पहुंच पाता।
27 सितंबर 2026 को प्रसारित 138वें एपिसोड में भी राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर जनगणना, स्वच्छता, नशामुक्ति, सांस्कृतिक परंपराओं और वन्यजीव संरक्षण जैसे विभिन्न विषयों को जोड़ा गया। प्रधानमंत्री ने सर्जिकल स्ट्राइक की दसवीं वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति का जिक्र किया। साथ ही 2008 के दिल्ली सीरियल ब्लास्ट, मुंबई के 26/11 हमले और अमेरिका में 11 सितंबर के आतंकी हमले को याद करते हुए पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त की। इससे कार्यक्रम में राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक जिम्मेदारी दोनों पहलू सामने आए।
जनगणना को लेकर भी प्रधानमंत्री ने नागरिकों से सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया। वर्ष 2027 की जनगणना के लिए डिजिटल व्यवस्था और स्व-गणना की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। केंद्र सरकार के अनुसार जनगणना दो चरणों में होगी और इसके लिए बड़ी संख्या में मैदानी कर्मचारी लगाए जा रहे हैं। ऐसे में नागरिकों की भागीदारी को राष्ट्रीय दायित्व के रूप में सामने रखना कार्यक्रम का महत्वपूर्ण संदेश रहा।
स्वच्छता का विषय भी ‘मन की बात’ में लगातार सामाजिक अभियान के रूप में सामने आता रहा है। महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर स्वच्छता के महत्व को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया पर सामने आ रहे स्वच्छता संबंधी प्रयासों का उल्लेख किया। इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि स्वच्छता केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। सड़क, मोहल्ले, विद्यालय, बाजार और सार्वजनिक स्थलों को स्वच्छ रखने में नागरिकों की भागीदारी ही किसी अभियान को स्थायी रूप दे सकती है।
युवाओं से जुड़े विषयों को भी कार्यक्रम में विशेष स्थान मिलता है। नशामुक्ति के लिए देशभर में चलाए जा रहे जागरूकता प्रयासों, प्रतियोगिताओं और जनभागीदारी का उल्लेख करते हुए युवाओं को सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ने का संदेश दिया गया। हाल के दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं के स्वास्थ्य और नशामुक्ति जागरूकता से जुड़े कार्यक्रमों में बड़ी भागीदारी दर्ज हुई है।
‘मन की बात’ का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भारत की सांस्कृतिक विविधता है। 138वें एपिसोड में भगवान गणेश की थाईलैंड में लोकप्रियता और वहां उनसे जुड़ी परंपराओं का उल्लेख किया गया। इससे यह संदेश भी सामने आता है कि भारतीय संस्कृति की अनेक परंपराएं देश की सीमाओं से बाहर भी लोगों को आकर्षित करती हैं। इसी तरह असम में पिग्मी हॉग के संरक्षण और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास की बहाली जैसे विषय यह बताते हैं कि पर्यावरण संरक्षण का काम सरकारी प्रयासों के साथ समाज की भागीदारी से भी आगे बढ़ता है।
‘मन की बात’ की यात्रा को देखें तो इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि संवाद की निरंतरता है। वर्ष 2014 में शुरू हुआ यह मासिक कार्यक्रम अब 138वें एपिसोड तक पहुंच चुका है। आधिकारिक विवरण में भी इसे जमीनी नवाचारों, सामाजिक पहलों, सांस्कृतिक परंपराओं और नागरिक नेतृत्व वाले कार्यों को सामने लाने वाला मंच बताया गया है।
आज भी गांवों में कार्यक्रम के समय टीवी या रेडियो के आसपास लोगों का बैठना यह बताता है कि तकनीक बदलने के बावजूद सामूहिक संवाद की जरूरत खत्म नहीं हुई है। पंचायत और तहसील स्तर पर लोग इसे सुनकर उसमें उठाए गए विषयों पर चर्चा करते हैं। किसी गांव में स्वच्छता की बात प्रेरणा बनती है, किसी जगह पर्यावरण संरक्षण का संदेश, तो कहीं युवा नशामुक्ति जैसे अभियान से जुड़ने की पहल करते हैं।
‘मन की बात’ का यही पक्ष इसे सामान्य राजनीतिक भाषण से अलग स्वरूप देता है। इसमें देश की बड़ी घटनाओं के साथ छोटे लेकिन प्रभावशाली सामाजिक प्रयासों को भी जगह मिलती है। प्रधानमंत्री का संदेश तभी व्यापक अर्थ ग्रहण करता है जब वह नागरिकों के दैनिक जीवन से जुड़ता है। रेडियो की आवाज से शुरू होकर चौपाल की चर्चा और फिर समाज की भागीदारी तक पहुंचने वाली यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक संवाद की उस परंपरा को मजबूत करती है, जिसमें सरकार और नागरिक केवल योजनाओं के लाभार्थी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सहभागी भी होते हैं।
*कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*
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