आचार्य शिवमुनिजी की 85वीं जन्म जयंती पर धर्मसभा में जीवन और तप से प्रेरणा लेने का आह्वान*
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साधना और संयम से आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है
*आचार्य शिवमुनिजी की 85वीं जन्म जयंती पर धर्मसभा में जीवन और तप से प्रेरणा लेने का आह्वान*
“तपस्वियों का सम्मान कर जैन समाज ने किया अभिनंदन”
कांतिलाल मांडोत
गोगुंदा 20 सितम्बर 26
कस्बे के ब्रह्मपुरी स्थित स्थानकवासी जैन स्थानक में रविवार को आध्यात्मिक चातुर्मास के तहत विशेष धर्मसभा का आयोजन किया गया। धर्मसभा में आचार्य सम्राट शिवमुनिजी महाराज साहब की 85वीं जन्म जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई गई। इस अवसर पर साधु-साध्वियों ने आचार्य शिवमुनिजी के जीवन, तप, ज्ञान, साधना और आध्यात्मिक चिंतन पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं से उनके जीवन से प्रेरणा लेकर धर्म, संयम और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ने का आह्वान किया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए जिनेन्द्र मुनि मसा ने कहा कि आचार्य शिवमुनिजी महाराज साहब का जीवन आध्यात्म, तप और साधना की प्रेरणादायी मिसाल रहा है। उनका जीवन आत्मचिंतन, संयम और सतत साधना के माध्यम से आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में धर्म का वास्तविक महत्व तभी है, जब उसके आचरण में संयम, सदाचार, करुणा और आत्मअनुशासन दिखाई दे। धर्म केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन को संस्कारित और मर्यादित बनाने का माध्यम है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से चातुर्मास के दौरान धर्मसभा और प्रवचनों का लाभ लेकर अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि संयमित जीवन मनुष्य को आंतरिक शांति प्रदान करता है और साधना आत्मचिंतन का अवसर देती है। आचार्य शिवमुनिजी के जीवन से तप, त्याग और आध्यात्मिक अनुशासन की प्रेरणा लेकर प्रत्येक श्रावक-श्राविका को अपने जीवन में धर्म के सिद्धांतों को उतारने का प्रयास करना चाहिए।
धर्मसभा का शुभारंभ साध्वी राजश्रीजी ने भजन प्रस्तुति के साथ किया। उन्होंने आचार्य शिवमुनिजी के आध्यात्मिक जीवन और साधना के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका जीवन धर्म के प्रति समर्पण और निरंतर आत्मसाधना का संदेश देता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को बाहरी आडंबर से दूर रहकर आत्मचिंतन और सदाचार को जीवन का हिस्सा बनाने की प्रेरणा दी। साध्वी सुलक्षणा प्रभाज ने भी आचार्य शिवमुनि मसा की जीवनी और उनके आध्यात्मिक योगदान के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
धर्मसभा के दौरान तपस्या करने वाले श्रावक-श्राविकाओं का सम्मान भी किया गया। 13 की तपस्या करने वाली यशोदा सेठ तथा 9 की तपस्या करने वाली वनिता सेठ का जैन समाज की ओर से सम्मान किया गया। दोनों तपस्वियों और उनके परिवारजनों का शॉल एवं माला पहनाकर अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर तपस्या के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए समाजजनों ने तपस्वियों का उत्साह बढ़ाया। धर्मसभा में तप और संयम को आत्मशुद्धि का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए श्रद्धालुओं को नियमित रूप से धार्मिक साधना से जुड़ने की प्रेरणा दी गई।
धर्मसभा के संयोजक सुनील लोढ़ा ने बाहर से आए अतिथियों तथा बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं का स्वागत किया। उन्होंने चातुर्मास के दौरान आयोजित हो रही धार्मिक गतिविधियों और प्रवचन श्रृंखला में समाज की सहभागिता को महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम के अंत में जिनेन्द्र मुनि ने मंगल पाठ सुनाया और सभी के मंगल एवं कल्याण की कामना की।
धर्मसभा में जिनेन्द्र मुनि मसा ने बताया कि चातुर्मास के दौरान नियमित रूप से प्रवचन जारी हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म, संयम और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए अपने जीवन को आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ने का संदेश दिया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने उपस्थित होकर प्रवचन और धार्मिक कार्यक्रमों का लाभ लिया। पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण बना रहा।
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