लाल किले से मोदी का संदेश: विकसित भारत के संकल्प के साथ आत्मनिर्भरता, युवा शक्ति और सामाजिक एकता पर जोर*
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*लाल किले से मोदी का संदेश: विकसित भारत के संकल्प के साथ आत्मनिर्भरता, युवा शक्ति और सामाजिक एकता पर जोर*
“दिमागी नक्सलियों’ से सावधान रहने की अपील, महिला आरक्षण पर दलगत राजनीति छोड़ने का आग्रह और युवाओं को नई तकनीक से जोड़ने का संकल्प”
देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए विकसित भारत के निर्माण का अपना संकल्प एक बार फिर सामने रखा। करीब 76 मिनट के संबोधन में प्रधानमंत्री का जोर केवल उपलब्धियों के उल्लेख तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने आने वाले वर्षों के लिए भारत की दिशा और प्राथमिकताओं का खाका भी प्रस्तुत किया। उनके भाषण में आत्मनिर्भरता, युवा शक्ति, महिला सशक्तीकरण, तकनीकी क्षमता, विनिर्माण, रक्षा उत्पादन, कृषि, आपदा से निपटने की क्षमता और भारत की सांस्कृतिक शक्ति जैसे विषय प्रमुख रहे। इस बार उनके संबोधन में सामाजिक और वैचारिक चुनौतियों को लेकर भी तीखी चिंता दिखाई दी।
प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि हथियारबंद नक्सलवाद काफी हद तक समाप्त हो चुका है, लेकिन समाज को भटकाने वाली वैचारिक प्रवृत्तियों से सावधान रहने की आवश्यकता है। उन्होंने इन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहते हुए कहा कि ऐसे लोग हिंसा और अराजकता के रास्ते तलाशते हैं तथा युवाओं को गलत दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से ऐसी प्रवृत्तियों को पहचानने और उनसे दूरी बनाने का आग्रह किया। उनके इस बयान का मूल संदेश यही था कि देश के विकास की यात्रा केवल आर्थिक प्रगति से पूरी नहीं होगी, बल्कि सामाजिक स्थिरता, सकारात्मक सोच और युवा पीढ़ी की रचनात्मक भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है।
प्रधानमंत्री के भाषण का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिला सशक्तीकरण रहा। उन्होंने संसद में पारित महिला आरक्षण कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिलना समय की मांग है। उन्होंने राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि महिला आरक्षण को राजनीति का विषय न बनाया जाए और इसके क्रियान्वयन में सभी दल सहयोग करें। प्रधानमंत्री ने कहा कि महिलाओं को उनका अधिकार मिलना चाहिए और राजनीतिक दल इस कार्य का श्रेय लेने की होड़ के बजाय महिलाओं के सम्मान और भागीदारी को प्राथमिकता दें। यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के लोकतंत्र में महिलाओं की संख्या और भागीदारी लगातार बढ़ रही है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अभी भी व्यापक विस्तार की आवश्यकता है।
मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को अपने संबोधन के केंद्र में रखा। उन्होंने कहा कि आजादी के सौ वर्ष पूरे होने तक भारत को विकसित देश बनाना है और देश इस लक्ष्य को हासिल करके रहेगा। उनके अनुसार केवल लक्ष्य तय करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि काम करने की गति और कार्य संस्कृति में भी बदलाव आवश्यक है। प्रधानमंत्री ने कहा कि जिन कार्यों को पूरा करने में पिछले पांच से सात दशक लग गए, उन्हें आने वाले पांच से सात वर्षों में पूरा करने का प्रयास होना चाहिए। यह बात उनके उस विकास दृष्टिकोण को सामने रखती है जिसमें तेजी से निर्णय, तेजी से क्रियान्वयन और परिणाम आधारित शासन को महत्व दिया गया है।
आत्मनिर्भर भारत प्रधानमंत्री के भाषण का एक और प्रमुख आधार रहा। उन्होंने कहा कि दुनिया में कई वस्तुएं सस्ती, आसानी से और तेजी से उपलब्ध हो सकती हैं, लेकिन केवल आयात पर निर्भर रहने से देश की अपनी क्षमता विकसित नहीं होती। मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कई देश अपने संसाधनों और आपूर्ति व्यवस्था का इस्तेमाल दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं। पेट्रोलियम, खाद और दवाइयों जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी वैश्विक राजनीति से प्रभावित हो सकती है। ऐसे समय में भारत के लिए आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित और सुरक्षा का विषय भी है।
प्रधानमंत्री ने सेमीकंडक्टर निर्माण को इसी आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि चिप के बिना आधुनिक दुनिया की कल्पना मुश्किल है और भारत ने इस क्षेत्र में अपनी क्षमता विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। उन्होंने आने वाले वर्षों में नए सेमीकंडक्टर संयंत्र शुरू होने की बात कही। इससे स्पष्ट है कि सरकार भारत को केवल उपभोक्ता बाजार के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक उत्पादन और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहती है।
युवाओं के लिए प्रधानमंत्री ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। उन्होंने कहा कि अगले एक वर्ष में एक करोड़ युवाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई की ट्रेनिंग देने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं के लिए कई प्रतियोगी परीक्षाओं की निशुल्क ऑनलाइन कोचिंग की व्यवस्था शुरू करने की बात कही गई। खेल प्रतिभाओं की पहचान के लिए पांच से पंद्रह वर्ष की उम्र के बच्चों को प्रशिक्षण देने की योजना का भी उल्लेख किया गया। इन घोषणाओं से प्रधानमंत्री के संबोधन में युवा शक्ति के महत्व को समझा जा सकता है। भारत की बड़ी युवा आबादी को यदि आधुनिक कौशल, शिक्षा, तकनीक और खेल के अवसर मिलते हैं तो वह विकसित भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है।
प्रधानमंत्री ने भारत की आर्थिक प्रगति का उल्लेख करते हुए पिछले वर्षों में रक्षा उत्पादन, खादी और ग्रामोद्योग, इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण, रेलवे कोच निर्माण, मोबाइल फोन उत्पादन और डिजिटल लेनदेन में हुई वृद्धि का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि देश ने पिछले वर्षों में विकास की गति तेज की है। उनका दावा था कि बड़ी संख्या में लोग गरीबी से बाहर आए हैं और भारत दुनिया की प्रमुख तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ है। इन आंकड़ों के माध्यम से प्रधानमंत्री ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि भारत की विकास यात्रा अब केवल योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्पादन और तकनीकी क्षमता के विस्तार के रूप में भी दिखाई दे रही है।
मोदी ने कृषि और किसानों को भी विकसित भारत की बुनियाद बताया। उनका कहना था कि खाद्य सुरक्षा के साथ किसानों की आय और कृषि क्षेत्र की क्षमता बढ़ाना जरूरी है। उन्होंने बदलती वैश्विक परिस्थितियों में खाद, ऊर्जा और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता को राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता से जोड़ते हुए कहा कि देश को अपनी जरूरतों के लिए दूसरों पर अत्यधिक निर्भर नहीं रहना चाहिए।
भाषण में भारत की सांस्कृतिक शक्ति को भी विशेष स्थान मिला। प्रधानमंत्री ने योग, आयुर्वेद, भारतीय संस्कृति, हस्तशिल्प, फिल्म, गेमिंग, एनीमेशन, वीएफएक्स और डिजिटल सामग्री को भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ के रूप में विकसित करने की बात कही। उनका मानना है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक रचनात्मक उद्योग दुनिया में देश की पहचान को और मजबूत कर सकते हैं। योग ने जिस प्रकार दुनिया के विभिन्न देशों को भारत से जोड़ा है, उसी तरह संस्कृति और रचनात्मक क्षेत्र भविष्य में आर्थिक अवसरों का माध्यम भी बन सकते हैं।
प्रधानमंत्री ने आपदाओं और वैश्विक संकटों के बीच भारत की क्षमता का भी उल्लेख किया। कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे संकटों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में भी देश ने आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास किया। उनका संदेश था कि संकटों से घबराने के बजाय देश को अपनी क्षमता बढ़ाकर उनका सामना करना चाहिए। यही आत्मविश्वास विकसित भारत की यात्रा का आधार बनेगा।
लाल किले से प्रधानमंत्री का इस वर्ष का संबोधन मूल रूप से आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और तेज विकास की त्रयी पर केंद्रित दिखाई दिया। उन्होंने देश को बड़े सपने देखने और बड़े संकल्प लेने का आह्वान किया। उनके भाषण में एक ओर आर्थिक और तकनीकी शक्ति बनने की आकांक्षा थी तो दूसरी ओर सामाजिक एकता और युवाओं को भटकाने वाली प्रवृत्तियों से बचाने की चिंता भी थी। महिला आरक्षण पर राजनीतिक दलों से सहयोग की अपील लोकतंत्र में व्यापक भागीदारी का संदेश देती है, जबकि एआई प्रशिक्षण और तकनीकी आत्मनिर्भरता भविष्य की अर्थव्यवस्था की तैयारी का संकेत देती है।
स्वतंत्रता दिवस का अवसर केवल अतीत की उपलब्धियों को याद करने का नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का भी अवसर होता है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन के माध्यम से 2047 के विकसित भारत की तस्वीर सामने रखते हुए यही संदेश दिया कि आने वाले वर्ष निर्णायक होंगे। अब चुनौती यह है कि आत्मनिर्भरता, तकनीकी विकास, महिला भागीदारी, युवा शक्ति और सामाजिक समरसता से जुड़े इन संकल्पों को धरातल पर कितनी प्रभावी गति मिलती है। यदि विकास के साथ अवसरों का समान विस्तार और समाज में विश्वास कायम रखने पर भी उतना ही जोर दिया जाए, तो स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक विकसित भारत का लक्ष्य देश के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय संकल्प का रूप ले सकता है।
*कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार
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