पर्युषण के तप दिवस पर उमड़ी आस्था तपस्या से आत्मशुद्धि का दिया संदेश*
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*पर्युषण के तप दिवस पर उमड़ी आस्था तपस्या से आत्मशुद्धि का दिया संदेश*
“धर्मसभा में संतों ने बताया तप का महत्व,श्रावक-श्राविकाओं ने उपवास जप और साधना से की आराधना”
कांतिलाल मांडोत
गोगुंदा 10 सितंबर
जैन धर्मावलंबियों के प्रमुख आध्यात्मिक पर्व पर्युषण महापर्व के तीसरे दिन गुरुवार को श्वेतांबर जैन समाज की ओर से तप दिवस के रूप में आराधना की गई। स्थानक में आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लेकर उपवास, तप, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण, ध्यान और धार्मिक साधना के माध्यम से आत्मचिंतन किया। पर्युषण पर्व के अंतर्गत नवकार महामंत्र का अखंड जाप भी जारी रहा। पूरे दिन धार्मिक वातावरण बना रहा और श्रद्धालुओं ने संयम तथा आत्मशुद्धि के संकल्प के साथ साधना की।

धर्मसभा में जिनेंद्र मुनि मसा ने अपने प्रवचन की शुरुआत ‘तपस्या की आई बहार, तपस्या करें नर-नार, तपस्या गुणधारी है’ भजन से की। उन्होंने तप के आध्यात्मिक महत्व को समझाते हुए कहा कि मनुष्य जीवन पूर्व जन्मों में अर्जित कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होता है। मानव जीवन के साथ जैन धर्म और शास्त्रों को सुनने, समझने और उनके बताए मार्ग पर चलने का अवसर मिलना भी अत्यंत सौभाग्य की बात है। इस अवसर का सदुपयोग करते हुए मनुष्य को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि तपस्या केवल शरीर को कष्ट देने का माध्यम नहीं है, बल्कि आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त करने वाली साधना है। तप के माध्यम से कर्मों की निर्जरा होती है और आत्मा शुद्धि की ओर अग्रसर होती है। उन्होंने मोती का उदाहरण देते हुए समझाया कि मोती समुद्र के पानी में रहने के बावजूद अपनी पहचान बनाए रखता है, लेकिन हंस की चोंच में पहुंचने पर पानी बन जाता है। इसी प्रकार उचित साधना और तपस्या के माध्यम से भव-भव में संचित कर्मों का क्षय किया जा सकता है। संत ने कहा कि जीवन में किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए लक्ष्य निर्धारित करना जरूरी है। बिना लक्ष्य के जीवन की दिशा स्पष्ट नहीं हो पाती और व्यक्ति भ्रमित होता रहता है।
साध्वी राजश्रीजी ने अंतगढ़ सूत्र के वाचन के दौरान देवकी महारानी, श्रीकृष्ण वासुदेव और गज सुखमाल के जीवन प्रसंगों का वर्णन किया। साध्वी ने कहा कि कर्मों के बंधन को हल्का करने के लिए तपस्या आवश्यक है। जिस प्रकार कपड़ों पर लगे मैल को दूर करने के लिए उन्हें साफ करने की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मा पर चढ़े कर्म रूपी मैल को दूर करने के लिए तप जरूरी है। तपस्या मनुष्य को भीतर से निर्मल बनाने का कार्य करती है और उसे आत्मसंयम तथा सदाचार की ओर ले जाती है।

साध्वी सुलक्षणाप्रभा ने बाह्य एवं आध्यात्मिक तप के विभिन्न स्वरूपों की जानकारी देते हुए कहा कि तपस्या मनुष्य के जीवन में आने वाली अनेक समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त करती है। तप के माध्यम से व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना सीखता है। इससे त्याग, संयम और आत्मशुद्धि की भावना मजबूत होती है।
साध्वी ने श्रद्धालुओं से पर्युषण महापर्व के दौरान अधिक से अधिक समय धार्मिक साधना में लगाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के दौरान बाहर से आए मेहमानों का शॉल और माला पहनाकर स्वागत किया गया। चातुर्मास कार्यक्रम संयोजक सुंदरलाल मेहता ने समाजजनों से पर्युषण पर्व के दौरान समय पर स्थानक पहुंचने तथा व्याख्यान के समय प्रतिष्ठान और व्यवसाय बंद रखकर धार्मिक गतिविधियों में सहभागी बनने का आग्रह किया। उन्होंने अधिक से अधिक जप, तप और धार्मिक साधना करने की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम के समापन पर जिनेंद्र मुनि मसा ने मंगल पाठ सुनाया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति रही। जैन समाज के अनुसार पर्युषण आत्मचिंतन, संयम, तप, त्याग और आत्मशुद्धि का पर्व है। इस दौरान श्रद्धालु अपने जीवन का आत्मावलोकन करते हुए विकारों से दूर होने, कर्मों की निर्जरा करने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।
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