पर्युषण के साथ जैन समाज में शुरू हुई आत्मसाधना, तप-जप में जुटे श्रावक-श्राविकाएं*
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*पर्युषण के साथ जैन समाज में शुरू हुई आत्मसाधना, तप-जप में जुटे श्रावक-श्राविकाएं*
धर्मसभा में संतों ने समझाया आत्मशुद्धि का मार्ग, संयम और सदाचार को जीवन में उतारने का आह्वान
कांतिलाल मांडोत
गोगुंदा 8 सितम्बर 26
जैन समाज के प्रमुख आध्यात्मिक पर्व पर्युषण महापर्व का मंगलवार से धार्मिक उल्लास और श्रद्धा के साथ आगाज हुआ। आठ दिनों तक चलने वाले इस पर्व को लेकर समाज के श्रावक-श्राविकाओं में विशेष उत्साह नजर आया। पहले दिन से ही लोगों ने दैनिक जीवन की व्यस्तताओं से समय निकालकर तप, जप, ध्यान, स्वाध्याय और प्रतिक्रमण जैसी धार्मिक गतिविधियों में सहभागिता शुरू कर दी। स्थानक में आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजजन पहुंचे और संतों से पर्व के आध्यात्मिक संदेश को समझा।
धर्मसभा में जिनेंद्र मुनि मसा ने भजन के माध्यम से पर्युषण पर्व का शुभारंभ कराया। उन्होंने कहा कि यह पर्व व्यक्ति को बाहरी दुनिया से कुछ समय के लिए विराम लेकर अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देता है। मनुष्य के जीवन में धर्म का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मा को अज्ञान और मोह के प्रभाव से मुक्त कर सही दिशा में आगे बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि जीवन में ज्ञान का प्रकाश तभी फैल सकता है, जब व्यक्ति अपने विचारों और आचरण को बेहतर बनाने का प्रयास करे।
मुनि ने आत्मिक जागरूकता की आवश्यकता पर जोर देते हुए मोहनिद्रा और भावनिद्रा का अंतर समझाया। संत ने कहा कि व्यक्ति को केवल शारीरिक रूप से जागृत रहना पर्याप्त नहीं, बल्कि अपने भीतर मौजूद मोह, अज्ञान और गलत प्रवृत्तियों के प्रति भी सजग होना चाहिए। पर्युषण का समय इसी आत्मजागरण के लिए महत्वपूर्ण है। मुनि ने श्रावक श्राविकाओं से पर्व के दौरान अधिक समय धार्मिक साधना में लगाने, अनावश्यक बातचीत से बचने और वाणी पर नियंत्रण रखने की प्रेरणा दी। उनके अनुसार संयमित शब्द और संतुलित व्यवहार व्यक्ति के जीवन को अधिक सार्थक बना सकते हैं।
प्रवीण मुनि मसा ने आगम ग्रंथों की उपयोगिता बताते हुए कहा कि पर्युषण आत्मा की उन्नति का अवसर है। मनुष्य के कर्म उसके जीवन की दिशा को प्रभावित करते हैं, इसलिए आत्मकल्याण के लिए संयम, त्याग और साधना को जीवन का हिस्सा बनाना आवश्यक है। उन्होंने जैन परंपरा में जमीकंद के त्याग की भावना पर भी प्रकाश डाला। संत ने बताया कि जमीकंद में अनेक जीवों की मान्यता होने के कारण इसका त्याग अहिंसा और जीवदया की भावना को मजबूत करता है।
धर्मसभा में साध्वी राजश्री ने अंतगढ़ सूत्र का वाचन किया। उन्होंने सूत्र में वर्णित महान आत्माओं के विभिन्न आदर्शों और उनके जीवन से मिलने वाली प्रेरणा के बारे में समाजजनों को बताया। साध्वी सुलक्षणा प्रभा ने कहा कि पर्युषण व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास की यात्रा है। महापुरुषों के जीवन प्रसंग सुनने का वास्तविक लाभ तभी है, जब उनके सद्गुणों को अपने व्यवहार में अपनाया जाए। उन्होंने सामायिक की महत्ता समझाते हुए आत्मचिंतन, एकाग्रता और संयम को जीवन में स्थान देने की प्रेरणा दी।
चातुर्मास कार्यक्रम संयोजक सुंदरलाल मेहता ने समाजजनों से पर्व के दौरान नियमित रूप से स्थानक पहुंचकर धर्मसभा में भाग लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि व्याख्यान के समय व्यवसाय और प्रतिष्ठान बंद रखकर धार्मिक गतिविधियों के लिए समय देना चाहिए। उन्होंने समाज के लोगों से अपनी क्षमता के अनुसार तप, जप, स्वाध्याय और अन्य धार्मिक साधनाओं में सहभागी बनने का आग्रह किया।
धर्मसभा के अंत में जिनेंद्र मुनि मसा ने मंगल पाठ कराया। इसके साथ प्रथम दिवस का धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हुआ। पूरे आयोजन के दौरान स्थानक में श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति ने पर्व के प्रति समाज की आस्था को दर्शाया।
पर्युषण महापर्व जैन समाज में आत्मनिरीक्षण और आत्मशुद्धि का विशेष अवसर माना जाता है। इन दिनों व्यक्ति अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों पर चिंतन करते हुए जीवन में संयम, त्याग और सदाचार को बढ़ाने का प्रयास करता है। पर्व का संदेश यही है कि मनुष्य बाहरी उपलब्धियों के साथ अपने अंतर्मन को भी निर्मल बनाने की दिशा में आगे बढ़े। इसी भावना के साथ गोगुंदा में जैन समाज ने पर्युषण की साधना का शुभारंभ किया।
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