बचपन किसी का मोहताज नहीं होता, वह तो अपनी ही धुन में जीता है*
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*बचपन किसी का मोहताज नहीं होता, वह तो अपनी ही धुन में जीता है*
कांतिलाल मांडोत
मुम्बई 6 सितम्बर
बचपन शायद जिंदगी का वह खूबसूरत हिस्सा है, जिसे जीते हुए किसी को यह अहसास ही नहीं होता कि वह जीवन के सबसे अनमोल दिनों से गुजर रहा है। बचपन न किसी की इजाजत मांगता है, न किसी की परवाह करता है। मन में जो आता है, वही करता है। जहां खेल दिखाई देता है, वहीं ठहर जाता है और जहां पानी की लहरें दिखाई देती हैं, वहां अपने छोटे-छोटे कदमों को रोक पाना उसके लिए आसान नहीं होता। माता-पिता कितनी ही बार समझाएं, कितनी ही बार रोकें-टोकें, लेकिन बालमन अपनी ही दुनिया में मग्न रहता है।
बचपन की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि उसमें बनावट नहीं होती। उसमें किसी बात को लेकर कोई गणित नहीं होता। न भविष्य की चिंता होती है और न बीते कल का बोझ। बस सामने का पल होता है और उस पल को पूरी तरह जी लेने की जिद होती है। खिलौना हो, मिट्टी हो, बारिश की बूंदें हों या पानी की लहरें, बच्चों के लिए हर चीज खेल का मैदान बन जाती है।
मुंबई के दरिया किनारे का एक दृश्य इसी मासूम बचपन की ऐसी ही तस्वीर सामने रखता है, जिसे देखकर कुछ पल के लिए हर किसी का मन ठहर जाता है। दो नन्हे बच्चे किसी की परवाह किए बिना मिट्टी और पानी के बीच खेलते नजर आते हैं। उनके लिए वह जगह कोई साधारण किनारा नहीं, बल्कि उनकी अपनी छोटी-सी दुनिया है। मिट्टी उनके लिए खिलौना है, पानी उनके लिए खेल का साथी है और बहती हुई लहरें उनके लिए किसी रोमांच से कम नहीं।
शायद उन्हें यह पता भी नहीं कि उनके आसपास खड़े लोग उन्हें किस नजर से देख रहे हैं। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं कि सूरज धीरे-धीरे ढल रहा है। उनके लिए तो अभी खेल खत्म नहीं हुआ। उनकी आंखों में अब भी वही चमक है, वही उत्साह है और वही मासूम जिद है कि थोड़ा और खेलना है।
बच्चों का पानी के पास बैठना, बहाव को महसूस करना और बार-बार उस अनुभव को दोहराना बचपन की उस सहज जिज्ञासा को दिखाता है, जो हर बच्चे के भीतर होती है। वे किसी अनुभव को केवल देखते नहीं, उसे महसूस करते हैं। पानी उनके पैरों से टकराता है तो वे उसे फिर महसूस करना चाहते हैं। मिट्टी हाथों में आती है तो उससे कुछ बनाने लगते हैं। लहर आती है तो उसका पीछा करते हैं। उनके लिए हर क्षण एक नई खोज है।
यही तो बचपन है।बड़े होने के बाद इंसान जिंदगी को समझने लगता है, लेकिन उसी के साथ जिंदगी को सहजता से जीने की कला कहीं पीछे छूट जाती है। बड़े लोग किसी जगह जाने से पहले सोचते हैं कि वहां क्या मिलेगा, कितना समय लगेगा और उसका क्या फायदा होगा। बच्चे इन सवालों से दूर होते हैं। उन्हें सिर्फ इतना मालूम होता है कि सामने कुछ अच्छा है और उन्हें उसे जी लेना है।
दरिया किनारे खेलते ये दो बच्चे भी शायद इसी दर्शन को अपने तरीके से जी रहे हैं। उनके लिए पानी का बहाव किसी वैज्ञानिक तथ्य का विषय नहीं है। वह तो बस पैरों को छूता हुआ एक सुंदर अनुभव है। मिट्टी कोई गंदगी नहीं है। वह तो हाथों से खेलने और कल्पना की दुनिया बनाने का साधन है। ढलता हुआ सूरज शाम का संकेत नहीं, बल्कि खेलते रहने की एक खूबसूरत पृष्ठभूमि है।
माता-पिता अक्सर बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें बार-बार रोकते हैं। उनकी चिंता स्वाभाविक है। लेकिन बचपन को पूरी तरह बांध देना भी संभव नहीं। बच्चे जब तक कुछ चीजों को अपनी आंखों से नहीं देखेंगे, अपने हाथों से नहीं छुएंगे और अपने अनुभव से नहीं समझेंगे, तब तक उनके भीतर की जिज्ञासा कैसे पूरी होगी। बचपन सवाल पूछता है और जवाब तलाशने के लिए दुनिया को छूना चाहता है।
आज जब बच्चों की दुनिया धीरे-धीरे मोबाइल की स्क्रीन में सिमटती जा रही है, ऐसे दृश्य और भी ज्यादा महत्वपूर्ण लगते हैं। मिट्टी में खेलते बच्चे हमें याद दिलाते हैं कि असली बचपन किसी चमकती स्क्रीन में नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे है। पानी की लहरों में है, मिट्टी की खुशबू में है, दोस्तों के साथ हंसी में है और उस आजादी में है जिसमें बच्चा कुछ देर के लिए दुनिया की सारी चिंताओं से दूर हो जाता है।
शायद इन बच्चों को यह मालूम नहीं कि सूरज ढल चुका है। उन्हें यह भी नहीं पता कि शाम होने वाली है और घर लौटने का समय हो रहा है। वे तो बस पानी के उन खूबसूरत नजारों में खोए हुए हैं। उनकी दुनिया में अभी शाम नहीं हुई है, क्योंकि उनका खेल अभी बाकी है।
उनकी मासूम आंखें जैसे कह रही हों—हमें अभी और खेलना है।यही दो शब्द बचपन की पूरी कहानी कह देते हैं।
बचपन वास्तव में भगवान का दिया हुआ ऐसा तोहफा है, जिसकी कीमत बच्चे खुद नहीं समझते। वे उसे बस जीते हैं। उन्हें नहीं मालूम कि कुछ साल बाद यही मिट्टी, यही पानी, यही शाम और यही बेफिक्र पल उनकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत याद बन जाएंगे। बड़े होने के बाद शायद वे किसी दिन पीछे मुड़कर देखेंगे और सोचेंगे कि काश वह शाम फिर लौट आती, काश पानी के किनारे बैठकर यूं ही घंटों खेल पाते और काश जिंदगी फिर से इतनी सरल हो जाती।
लेकिन बचपन लौटकर नहीं आता।
इसलिए दरिया किनारे खेलते उन दो मासूम चेहरों को देखकर शायद हमें भी अपने भीतर छिपे उस बच्चे की याद आती है, जो कहीं जिम्मेदारियों, चिंताओं और समय की दौड़ के बीच पीछे छूट गया है। वे बच्चे हमें बिना कुछ कहे यह सिखा रहे हैं कि जिंदगी का सबसे सुंदर हिस्सा हमेशा बड़ी उपलब्धियों में नहीं होता। कई बार वह मिट्टी से सने हाथों, पानी में डूबे पैरों, खिलखिलाती हंसी और ढलते सूरज के नीचे बिताए कुछ बेफिक्र पलों में छिपा होता है।
बचपन किसी का मोहताज नहीं होता। वह अपनी ही धुन में चलता है, अपनी ही दुनिया बनाता है और हर छोटे से छोटे पल में खुशियां तलाश लेता है। शायद यही बचपन की सबसे बड़ी दौलत है—जिसे बच्चे महसूस तो करते हैं, लेकिन उसकी कीमत उन्हें तब समझ आती है, जब वह उनके हाथ से निकल चुका होता है।
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