आधुनिकता की चकाचौंध के बीच धर्म और गरबा बन रहे युवाओं की पहचान*
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गरबा के रंग में रंगा युवा भारत अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ रही नई पीढ़ी
*आधुनिकता की चकाचौंध के बीच धर्म और गरबा बन रहे युवाओं की पहचान*
कांतिलाल मांडोत
सूरत 19 अक्टूबर 26
भारत की सांस्कृतिक परंपराएं सदियों से समाज को जोड़ने और जीवन में उत्साह का संचार करने का माध्यम रही हैं। बदलते समय के साथ रहन-सहन, खानपान, पहनावे और विचारों में अनेक बदलाव आए हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति की जड़ें आज भी मजबूत बनी हुई हैं। इसका जीवंत उदाहरण नवरात्र के दौरान देशभर में दिखाई देने वाला गरबा है। विशेष रूप से गुजरात में गरबा केवल नृत्य नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन चुका है। आधुनिक जीवनशैली अपनाने वाली युवा पीढ़ी का गरबा और धार्मिक आयोजनों की ओर बढ़ता आकर्षण इस बात का संकेत है कि नई पीढ़ी विकास और आधुनिकता के साथ अपनी परंपराओं को भी संजोकर रखना चाहती है।
आज के युवा तकनीक, इंटरनेट, सामाजिक माध्यमों और वैश्विक संस्कृति से गहराई से जुड़े हुए हैं। उनके जीवन में आधुनिक शिक्षा, रोजगार, प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विशेष महत्व है। इसके बावजूद नवरात्र आते ही युवाओं में गरबा खेलने, पारंपरिक परिधान पहनने, माता की आराधना करने और सामूहिक उत्सवों में भाग लेने का उत्साह दिखाई देने लगता है। यह बदलाव केवल मनोरंजन की इच्छा तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को जानने, समझने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की भावना को भी प्रकट करता है।
गुजरात की पहचान उसके व्यापार, उद्योग, उद्यमशीलता और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी हुई है। यहां गरबा नवरात्र का प्रमुख आकर्षण है। मां दुर्गा की आराधना के साथ शुरू होने वाला यह उत्सव लोगों को भक्ति और उल्लास के एक सूत्र में बांधता है। पारंपरिक गीतों की मधुरता, ढोल की थाप, तालियों की गूंज और गोल घेरे में एक साथ नृत्य करते लोगों का दृश्य भारतीय संस्कृति की सामूहिकता को प्रदर्शित करता है। इसमें उम्र, भाषा, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति का अंतर पीछे छूट जाता है तथा सभी लोग उत्सव की भावना से जुड़ जाते हैं।
सूरत जैसे औद्योगिक और व्यापारिक शहर में गरबा का स्वरूप विशेष रूप से आकर्षक दिखाई देता है। देश के विभिन्न राज्यों से आकर बसे लोगों ने इस शहर को बहुरंगी सामाजिक पहचान दी है। यहां नवरात्र के दौरान गुजराती समाज के साथ अन्य प्रदेशों के लोग भी गरबा में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। पारंपरिक आयोजनों के साथ बड़े मैदानों, सामाजिक संस्थाओं और व्यावसायिक आयोजनों में भी गरबा की धूम रहती है। महिलाएं, युवतियां और युवा पारंपरिक परिधानों में सजकर गरबा का आनंद लेते हैं। अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोगों का एक साथ थिरकना सामाजिक समरसता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।
इसी सांस्कृतिक उत्साह की झलक सूरत के पूणा बॉम्बे मार्केट रोड स्थित जलवन्त टाउनशिप में आयोजित रात्रि गरबा में देखने को मिली, जहां युवक-युवतियां और महिलाएं गरबा की धुनों पर झूम उठे। पारंपरिक संगीत और उत्सवी माहौल के बीच प्रतिभागियों ने पूरे उत्साह के साथ गरबा में हिस्सा लिया। महिलाओं और युवक-युवतियों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई। गरबा की लय, तालियों की गूंज और रंग-बिरंगे परिधानों से वातावरण उत्सवमय हो गया। इस आयोजन ने एक बार फिर दर्शाया कि नवरात्र का पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परिवारों, युवाओं और समाज को आपस में जोड़ने का अवसर भी प्रदान करता है।
सूरत में गरबा की तैयारी कई सप्ताह पहले शुरू हो जाती है। चनिया-चोली, केडियू, रंग-बिरंगी चुनरियों, पारंपरिक आभूषणों और कढ़ाईदार परिधानों की खरीदारी बाजारों में रौनक बढ़ा देती है। युवा गरबा के नए कदम सीखते हैं और समूह बनाकर अभ्यास करते हैं। कई स्थानों पर प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जाती है। पारंपरिक नृत्य के साथ आधुनिक संगीत और नई प्रस्तुतियों का समावेश गरबा को नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बना रहा है। हालांकि इस बदलते स्वरूप में यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि आधुनिकता के नाम पर गरबा की मूल सांस्कृतिक भावना और धार्मिक महत्व कमजोर न पड़ें।
वडोदरा में गरबा की परंपरा अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। यहां बड़े मैदानों में हजारों लोग एक साथ पारंपरिक धुनों और गायकों की प्रस्तुतियों पर गरबा करते हैं। विशाल घेरे में लयबद्ध तरीके से घूमते प्रतिभागियों का दृश्य सामूहिक अनुशासन और सांस्कृतिक एकता को दर्शाता है। अहमदाबाद में पारंपरिक आयोजनों के साथ आधुनिक संगीत और मिश्रित शैली के गरबा का आकर्षण भी बढ़ा है। मुंबई में बड़े कलाकारों के संगीत कार्यक्रमों और डांडिया आयोजनों ने गरबा को व्यापक लोकप्रियता दी है। यहां गुजराती समुदाय के साथ दूसरे राज्यों के लोग भी इस उत्सव में शामिल होते हैं।
इन शहरों में गरबा के अलग-अलग स्वरूप होने के बावजूद इसकी मूल भावना एक ही है। मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा, जीवन में सकारात्मकता, सामूहिक सहभागिता और संस्कृति के प्रति सम्मान ही इस उत्सव की वास्तविक शक्ति है। गरबा के माध्यम से युवाओं को अपनी परंपराओं से परिचित होने का अवसर मिलता है। वे लोकगीतों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों, वेशभूषा और धार्मिक मान्यताओं के बारे में सीखते हैं। इस तरह मनोरंजन के साथ सांस्कृतिक शिक्षा भी सहज रूप से प्राप्त होती है।
युवाओं का धर्म और संस्कृति की ओर झुकाव सकारात्मक दृष्टि से देखा जाना चाहिए, बशर्ते इसमें विवेक, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों का समावेश हो। धार्मिक आस्था व्यक्ति को संयम, सेवा, करुणा और जिम्मेदारी की प्रेरणा दे सकती है। भारतीय संस्कृति की विशेषता विविधता का सम्मान करना है। गरबा का उत्सव भी तभी सार्थक बनता है, जब उसमें सभी के प्रति आदर, महिलाओं की सुरक्षा, अनुशासन और सामाजिक सद्भाव को प्राथमिकता दी जाए।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में युवा पढ़ाई, रोजगार और भविष्य की चुनौतियों के कारण मानसिक दबाव का सामना करते हैं। ऐसे में सांस्कृतिक उत्सव उन्हें परिवार, मित्रों और समाज के साथ समय बिताने का अवसर देते हैं। सामूहिक नृत्य, संगीत और धार्मिक वातावरण से उन्हें प्रसन्नता तथा अपनेपन का अनुभव होता है। सकारात्मक सामाजिक गतिविधियां जीवन में उत्साह और संतुलन बनाए रखने में सहायक बन सकती हैं।
गरबा का बढ़ता आकर्षण स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति देता है। कपड़ा बाजार, आभूषण विक्रेता, दर्जी, कारीगर, संगीत कलाकार और आयोजन से जुड़े अनेक लोगों को रोजगार मिलता है। पारंपरिक कढ़ाई तथा हस्तशिल्प को प्रोत्साहन मिलता है। यदि आयोजनों में स्थानीय कलाकारों और कारीगरों को पर्याप्त अवसर दिए जाएं, तो यह उत्सव सांस्कृतिक संरक्षण के साथ आर्थिक विकास का माध्यम भी बन सकता है।

आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी गरबा को केवल दिखावे, महंगे परिधानों या प्रतियोगिता तक सीमित न रखे। उसकी वास्तविक पहचान भक्ति, परंपरा, अनुशासन और सामूहिक आनंद में है। अभिभावकों और समाज के वरिष्ठ लोगों को भी युवाओं को संस्कृति से जोड़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संगठनों के माध्यम से लोकगीतों, पारंपरिक नृत्य और भारतीय मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।
आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। युवा तकनीक का उपयोग करते हुए भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रख सकते हैं। सूरत के जीवन्त टाउनशिप में आयोजित रात्रि गरबा जैसे आयोजन इसी सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करते हैं। जब नई पीढ़ी आधुनिक विचारों के साथ अपनी जड़ों को पहचानती है, तब संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं रहती, बल्कि वर्तमान की जीवंत शक्ति बन जाती है। यही भारतीय समाज की वास्तविक ताकत है और यही गरबा की सांस्कृतिक पहचान है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को जोड़ती रहेगी।
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