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*दीपावली सुचिता का महापर्व है*

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    *दीपावली सुचिता का महापर्व है*
“दीपावली केवल दीप जलाने का पर्व नहीं बल्कि आत्मजागृति संयम और सदाचार का महापर्व है”
दीपावली महापर्व है। यह विश्व का महापर्व है। दीपावली भारतीय संस्कृति का ऐसा महान पर्व है, जो जीवन में अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या की सघन अंधेरी रात में जब घरों, मंदिरों, बाजारों और गलियों में दीपों की पंक्तियां जगमगाने लगती हैं, तब वातावरण में उल्लास और उमंग का संचार होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने घर और प्रतिष्ठान को स्वच्छ एवं सुंदर बनाने में जुट जाता है। दीपों की रोशनी के बीच लक्ष्मी पूजन होता है और लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देकर खुशियां बांटते हैं। लेकिन दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल बाहरी प्रकाश और उत्सव तक सीमित नहीं है। इसका गहरा संदेश मनुष्य के भीतर ज्ञान, विवेक, प्रेम, करुणा और सदाचार का प्रकाश जगाना है।
दीपावली का संबंध जैन परंपरा में अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर के निर्वाण से भी जुड़ा हुआ है। मान्यता के अनुसार कार्तिक अमावस्या की अर्धरात्रि में भगवान राम ओर मा सीता के वनवास से लौटने पर लोगो ने घी के दिये जलाए ओर दूसरी मान्यता जैन के 24वे तीर्थंकर महावीर ने पावापुरी में समस्त कर्मों का क्षय कर निर्वाण प्राप्त किया था। उस समय उपस्थित राजाओं और श्रद्धालुओं ने अनुभव किया कि संसार को ज्ञान का प्रकाश देने वाले महावीर अब उनके बीच नहीं रहे। उनके इस भाव को व्यक्त करते हुए उन्होंने निर्णय लिया कि जब ज्ञान का दीप बुझ गया है तो बाहरी दीप जलाकर उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाया जाए। इस प्रकार दीप प्रज्वलित कर भगवान महावीर के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा प्रारंभ हुई। जैन धर्म में यह पर्व ज्ञान, वैराग्य, संयम और आत्मकल्याण की प्रेरणा देने वाला पावन अवसर है। इसी दिन भगवान महावीर के प्रमुख गणधर गौतम स्वामी को केवलज्ञान प्राप्त होने की मान्यता भी इस पर्व को विशेष आध्यात्मिक महत्त्व प्रदान करती है।
भारतीय संस्कृति में दीपावली के साथ अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक प्रसंग जुड़े हुए हैं। मान्यता है कि भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर पूरे नगर को प्रकाश से भर दिया था। इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने नरक चतुर्दशी के दिन नरकासुर के अत्याचारों से लोगों को मुक्ति दिलाई थी। महात्मा बुद्ध का संदेश ‘अप्प दीपो भव’ अर्थात स्वयं अपने दीप बनो, भी मनुष्य को आत्मनिर्भरता और आत्मजागृति का मार्ग दिखाता है। इन सभी प्रसंगों का मूल भाव यही है कि बुराई पर अच्छाई, अज्ञान पर ज्ञान और अन्याय पर न्याय की विजय होनी चाहिए।
मनुष्य दीपावली से पहले अपने घर, दुकान और प्रतिष्ठान की सफाई करता है। दीवारों को सजाता है, पुराने सामान को व्यवस्थित करता है और हर कोने में प्रकाश पहुंचाने का प्रयास करता है। यह अच्छी परंपरा है, लेकिन हमें स्वयं से यह प्रश्न भी करना चाहिए कि जिस प्रकार हम घर की गंदगी दूर करते हैं, क्या उसी प्रकार मन में जमा ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, छल, कपट और स्वार्थ को भी दूर करते हैं? बाहरी स्वच्छता के साथ आंतरिक स्वच्छता भी आवश्यक है। अज्ञान और मिथ्यात्व मनुष्य के वास्तविक शत्रु हैं। जब तक ज्ञान और विवेक की ज्योति प्रज्ज्वलित नहीं होती, तब तक व्यक्ति सही और गलत के बीच अंतर नहीं समझ पाता। इसलिए दीपावली पर मिट्टी के दीपक जलाने के साथ अपने भीतर भी ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप, सेवा और समर्पण के दीप जलाने का संकल्प लेना चाहिए।
लक्ष्मी पूजन दीपावली का प्रमुख अंग है। धन और समृद्धि जीवन की आवश्यकताएं हैं, लेकिन धन की प्राप्ति से अधिक महत्त्व उसके अर्जन और उपयोग के तरीकों का है। जैन दर्शन धन का विरोध नहीं करता, बल्कि अन्याय और अनीति से कमाए गए धन तथा उसके प्रति अत्यधिक मोह का विरोध करता है। सदाचार, परिश्रम और न्यायपूर्ण तरीके से अर्जित धन व्यक्ति, परिवार और समाज के कल्याण का माध्यम बनता है। इसके विपरीत शोषण, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और अनैतिक साधनों से प्राप्त संपत्ति मानसिक अशांति और अनेक समस्याओं का कारण बन सकती है। इसलिए लक्ष्मी के साथ सद्बुद्धि और विवेक का होना भी आवश्यक है। संभवतः इसी विचार को ध्यान में रखते हुए भारतीय परंपरा में लक्ष्मी के साथ गणेश पूजन का विधान किया गया है। लक्ष्मी समृद्धि की प्रतीक हैं और गणेश बुद्धि, विवेक तथा मंगल के प्रतीक हैं। धन तभी सार्थक है जब उसका उपयोग उचित कार्यों में हो।
लक्ष्मी के निवास के संबंध में एक सुंदर विचार प्रस्तुत किया गया है कि जहां गुरुजनों का सम्मान होता है, जहां वाणी मधुर होती है और जहां आपसी प्रेम बना रहता है, वहां सुख-समृद्धि का वातावरण स्थायी होता है। वास्तव में धन केवल तिजोरी में रखने से जीवन समृद्ध नहीं होता। उसका सदुपयोग शिक्षा, सेवा, जरूरतमंदों की सहायता और सामाजिक कल्याण में होना चाहिए। कमल कीचड़ में रहकर भी अपनी सुंदरता और पवित्रता बनाए रखता है। इसी प्रकार मनुष्य को धन-संपत्ति प्राप्त होने के बाद भी अहंकार, लालच और स्वार्थ से दूर रहना चाहिए। धन का स्वामी बनना चाहिए, उसका दास नहीं।
दीपावली के उत्सव में आतिशबाजी और अनावश्यक दिखावे से बचने की आवश्यकता भी है। पटाखों से वायु और ध्वनि प्रदूषण बढ़ता है तथा पशु-पक्षियों और पर्यावरण को भी परेशानी होती है। दीपावली प्रकाश और प्रसन्नता का पर्व है, इसलिए इसे किसी जीव को कष्ट पहुंचाने का माध्यम नहीं बनाना चाहिए। इसी प्रकार जब हम स्वयं मिठाइयों और पकवानों का आनंद ले रहे हों, तब हमारे आसपास कोई जरूरतमंद भूखा रहे, यह हमारी सामाजिक संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न है। किसी को भोजन कराकर स्वयं भोजन करना, जरूरतमंदों की सहायता करना और समाज में प्रेम तथा सहयोग बढ़ाना ही पर्व की वास्तविक भावना है।
दीपावली हमें यह भी सिखाती है कि हमारी वाणी में मिठास, व्यवहार में विनम्रता और विचारों में पवित्रता होनी चाहिए। रिश्तों में आई दूरियां मिटें, पुराने मनमुटाव समाप्त हों और समाज में पारस्परिक सद्भाव मजबूत बने। त्योहार का आनंद तभी पूर्ण होता है जब हमारी खुशियों में दूसरों की खुशियां भी शामिल हों। सेवा, दान, संयम और परोपकार से जीवन में जो संतोष मिलता है, वह केवल भौतिक संपत्ति से प्राप्त नहीं हो सकता।
आज आवश्यकता है कि दीपावली को केवल खरीदारी, सजावट और उत्सव का अवसर न मानकर आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का पर्व बनाया जाए। भगवान महावीर के अहिंसा, अपरिग्रह और संयम के संदेश को जीवन में उतारें। महात्मा बुद्ध के आत्मदीप बनने के संदेश को समझें और भारतीय संस्कृति के शाश्वत मंत्र ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, को अपने जीवन का आधार बनाएं।
आइए, इस दीपावली पर संकल्प लें कि अज्ञान के अंधकार में अब और नहीं भटकेंगे। अपने भीतर ज्ञान, विवेक, सदाचार और मानवता का प्रकाश जगाएंगे। दूसरों के जीवन में भी आशा और प्रसन्नता का दीप प्रज्वलित करेंगे। क्योंकि मिट्टी का दीप कुछ समय तक प्रकाश देता है, लेकिन ज्ञान और सद्भाव का दीप पीढ़ियों तक समाज को सही दिशा दिखाता है। यही भगवान महावीर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और दीपावली पर्व की वास्तविक सार्थकता है।अंधकार में बहुत भटक लिए, अब प्रकाश की ओर बढ़ें और अपने जीवन को सद्गुणों से आलोकित करें।

         कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार

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