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लोकतंत्र की असली ताकत गांव की चौपाल से निकलती है योग्य पंच और सरपंच का चुनाव ही ग्रामीण विकास की पहली शर्त*

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*लोकतंत्र की असली ताकत गांव की चौपाल से निकलती है योग्य पंच और सरपंच का चुनाव ही ग्रामीण विकास की पहली शर्त*
राजस्थान की 3626 ग्राम पंचायतों में पंच और सरपंच पदों के लिए आज सुबह सात बजे से मतदान शुरू हो गया है। गांवों की सरकार चुनने के इस लोकतांत्रिक पर्व में बड़ी संख्या में मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। मतदान बैलेट पेपर के माध्यम से कराया जा रहा है। प्रदेश में लगभग 1.06 करोड़ मतदाता 3326 सरपंचों और 33804 वार्ड पंचों के निर्वाचन में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं। इसके लिए 799 मतदान केंद्र बनाए गए हैं। कोटपूतली-बहरोड़ सहित कई क्षेत्रों में बारिश के बीच भी मतदाता मतदान केंद्रों तक पहुंच रहे हैं। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद मतदाताओं का उत्साह लोकतंत्र के प्रति उनकी जागरूकता और जिम्मेदारी को दर्शाता है। शाम छह बजे मतदान समाप्त होने के बाद मतगणना शुरू होगी और देर रात तक चुनाव परिणाम सामने आने की संभावना है। पंचायत चुनाव केवल सरपंच और पंच चुनने की औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण समाज के भविष्य की दिशा तय करने का महत्वपूर्ण अवसर है। गांव की सरकार का सीधा संबंध आम नागरिक के जीवन से जुड़ा होता है। गांव की सड़क, पेयजल, नाली, स्वच्छता, बिजली, विद्यालय, स्वास्थ्य सुविधाएं और सरकारी योजनाओं का लाभ किसे और किस प्रकार मिलेगा, इन सभी विषयों पर पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसलिए मतदाता के सामने आज सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वह अपने मत का प्रयोग पूरी समझदारी और विवेक के साथ करे। चुनाव में उम्मीदवारों की भीड़ हो सकती है, राजनीतिक दलों के समर्थक अपने-अपने प्रत्याशियों के पक्ष में प्रचार कर सकते हैं और अनेक प्रकार के वादे भी किए जा सकते हैं, लेकिन मतदाता को इन सबके बीच अपनी बुद्धि और अनुभव के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

पंच और सरपंच का चुनाव करते समय जाति, समाज, रिश्तेदारी, व्यक्तिगत संपर्क, राजनीतिक दबाव अथवा किसी के बहकावे को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए। सबसे पहले उम्मीदवार की ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, कार्यक्षमता, सामाजिक व्यवहार और विकास के प्रति उसकी सोच को परखना चाहिए। जो व्यक्ति गांव के प्रत्येक परिवार को अपना परिवार समझता हो, जो बिना भेदभाव के सभी के लिए काम करने की भावना रखता हो और जो सार्वजनिक धन को जनता की अमानत मानता हो, वही पंचायत का नेतृत्व करने योग्य है। मतदाता को यह भी समझना होगा कि चुनाव के समय किए गए वादों और चुनाव जीतने के बाद किए जाने वाले कार्यों में अंतर होता है। कई बार उम्मीदवार चुनाव के दौरान बड़े-बड़े आश्वासन देते हैं, लेकिन निर्वाचित होने के बाद जनता की समस्याओं से दूरी बना लेते हैं। पांच वर्षों तक ग्रामीण अपनी छोटी-बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए पंचायत कार्यालय और जनप्रतिनिधियों के चक्कर लगाते रहते हैं।

इसलिए इस बार मतदान करते समय केवल उम्मीदवार की बातों पर नहीं, बल्कि उसके पिछले कार्यों, व्यवहार और सार्वजनिक जीवन की विश्वसनीयता पर भी ध्यान देना आवश्यक है। भ्रष्टाचार से दूर रहने वाला, सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता रखने वाला और गांव के विकास के लिए अधिकारियों के सामने मजबूती से अपनी बात रखने वाला प्रतिनिधि ही पंचायत को सही दिशा दे सकता है। पंचायत का पद व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, आर्थिक लाभ अथवा राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का माध्यम नहीं होना चाहिए। यह जनसेवा और जवाबदेही का पद है। जिस व्यक्ति को जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है, उससे अपेक्षा रहती है कि वह गांव के विकास के लिए दिन-रात प्रयास करे। उसे यह समझना होगा कि पंचायत में आने वाला प्रत्येक रुपया जनता की मेहनत और सरकार के संसाधनों से जुड़ा है।

उसका उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थ के बजाय सार्वजनिक हित में होना चाहिए। गांव में विकास कार्य करवाते समय किसी एक मोहल्ले, परिवार, जाति या राजनीतिक विचारधारा को प्राथमिकता देना उचित नहीं है। विकास का अधिकार प्रत्येक ग्रामीण को समान रूप से मिलना चाहिए। जहां सड़क की आवश्यकता है, वहां सड़क बने, जहां पेयजल का संकट है, वहां पानी की व्यवस्था हो और जहां बरसात में आवागमन बाधित होता है, वहां पुलिया तथा नालियों का निर्माण प्राथमिकता से किया जाए। पंचायत प्रतिनिधि को गांव की वास्तविक आवश्यकताओं को समझकर विकास की योजनाएं तैयार करनी चाहिए। मतदाताओं को भी यह देखना चाहिए कि उम्मीदवार के पास गांव के विकास का कोई स्पष्ट दृष्टिकोण है या वह केवल चुनाव जीतने के लिए मैदान में उतरा है। लोकतंत्र में मतदान केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक बड़ी नैतिक जिम्मेदारी भी है।

एक गलत निर्णय का प्रभाव केवल एक व्यक्ति या परिवार पर नहीं, बल्कि पूरे गांव पर पड़ सकता है। पांच वर्षों का कार्यकाल लंबा होता है और इस दौरान पंचायत के विकास की गति काफी हद तक चुने गए प्रतिनिधियों की सोच तथा कार्यशैली पर निर्भर करती है। इसलिए मतदान के दिन किसी के दबाव में आना या क्षणिक प्रलोभन में अपना मत देना भविष्य के साथ समझौता करने जैसा है। मतदाता को अपने बच्चों की शिक्षा, गांव की सड़कों, स्वच्छ पेयजल, किसानों की सुविधाओं, युवाओं के अवसरों और बुजुर्गों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए। गांव विकसित होगा तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और लोगों का जीवन स्तर सुधरेगा।

गांवों का विकास ही प्रदेश और देश की प्रगति का आधार है। आज देश विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इस संकल्प की सफलता तभी संभव है जब गांवों में भी विकास, पारदर्शिता, सुशासन और जनभागीदारी की मजबूत व्यवस्था स्थापित हो। ग्राम पंचायत लोकतंत्र की सबसे निचली, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। यहां चुना गया ईमानदार और कर्मठ प्रतिनिधि सरकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसलिए प्रत्येक मतदाता को अपने मत की कीमत समझनी होगी। किसी के बहकावे में आए बिना निष्पक्ष होकर मतदान करना चाहिए। मतदाता की असली परीक्षा आज है। उसे यह तय करना है कि वह अगले पांच वर्षों के लिए गांव का भविष्य किसके हाथों में सौंप रहा है। योग्य, ईमानदार, सत्यनिष्ठ और विकास के प्रति समर्पित उम्मीदवार को चुनना ही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है। मतदान के समय यह संकल्प होना चाहिए कि हमारा मत किसी व्यक्ति विशेष के स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि गांव, समाज, प्रदेश और देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए है। याद रखना होगा कि मजबूत गांव से ही मजबूत प्रदेश और समृद्ध भारत का निर्माण होगा।

 

    कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार

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