*पंचायतीराज चुनाव में वादों से नहीं विकास कार्यों से हो उम्मीदवारों की पहचान*
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गांव का विकास ही देश की उन्नति का आधार है
*पंचायतीराज चुनाव में वादों से नहीं विकास कार्यों से हो उम्मीदवारों की पहचान*
राजस्थान में पंचायतीराज चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई हैं। पहले चरण का मतदान हो चुका है और राजनीतिक दलों के साथ प्रत्याशी भी चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। कहीं चुनावी सभाओं के माध्यम से मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास किया जा रहा है तो कहीं उम्मीदवार घर-घर पहुंचकर मतदान करने की अपील कर रहे हैं। गांव की गलियों में चुनावी चर्चाएं तेज हैं और हर प्रत्याशी अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। लोकतंत्र में चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह गांव के भविष्य की दिशा तय करने का अवसर भी है। ऐसे में मतदाताओं के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि अगले कार्यकाल में गांव के विकास की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए और किस आधार पर उम्मीदवार का मूल्यांकन किया जाए।
इस बार राजस्थान में पंचायतों के कार्यकाल से जुड़ी परिस्थितियां भी चर्चा का विषय बनी हैं। सात वर्षों के दौरान गांवों में कितना विकास हुआ, कौन से काम पूरे किए गए और कौन सी समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं, इन सभी सवालों का जवाब मतदाताओं को अपने विवेक से तलाशना चाहिए। चुनाव के समय हर प्रत्याशी विकास के बड़े-बड़े दावे करता है, लेकिन वास्तविकता का आकलन उसके पिछले कार्यों से ही किया जा सकता है। सरपंच और पंचायत सचिव की भूमिका गांव की विकास योजनाओं को जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण होती है। इसलिए मतदाताओं को यह देखना चाहिए कि पंचायत में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किस प्रकार हुआ और सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंद ग्रामीणों तक पहुंचा या नहीं।
गांव का विकास केवल चुनावी भाषणों में दिखाई देने वाली तस्वीर नहीं है। विकास का वास्तविक अर्थ है कि ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल मिले, गलियों में नालियों की उचित व्यवस्था हो, रास्ते सुरक्षित और सुगम हों, खराब हैंडपंपों की मरम्मत समय पर हो तथा प्रत्येक मोहल्ले को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों। गोगुंदा तहसील के अनेक गांवों में ऐसी समस्याओं को लेकर ग्रामीणों की शिकायतें सामने आती रही हैं। कहीं पेयजल संकट लोगों की परेशानी बढ़ाता है तो कहीं नालियों की अव्यवस्था और अधूरी सीसी सड़कें विकास की वास्तविक स्थिति बयां करती हैं। हैंडपंप खराब होने पर ग्रामीणों को लंबे समय तक परेशानी उठानी पड़ती है। यदि बार-बार आग्रह करने के बावजूद समस्याओं का समाधान नहीं होता तो यह पंचायत की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। चुनाव के समय इन मुद्दों पर चर्चा करना और पिछले कार्यकाल का हिसाब मांगना मतदाताओं का अधिकार है।
पंचायतीराज व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और उनसे सीधे सवाल भी कर सकती है। गांव का मतदाता अपने प्रतिनिधि को निकट से जानता है। उसे पता होता है कि किसने संकट के समय सहयोग किया, किसने ग्रामीणों की समस्याएं सुनीं और किसने केवल चुनाव के समय लोगों के दरवाजे पर दस्तक दी। इसलिए मतदाताओं को चुनावी नारों और क्षणिक आकर्षण से प्रभावित होने के बजाय उम्मीदवार के व्यवहार, कार्यशैली, ईमानदारी और जवाबदेही को समझना चाहिए। चुनाव के दिनों में घर-घर जाकर विनम्रता दिखाना आसान है, लेकिन वास्तविक जनसेवा वह है जो चुनाव समाप्त होने के बाद भी निरंतर जारी रहे।
गांवों में पार्टी आधारित राजनीति के कारण विकास कार्यों में भेदभाव की शिकायतें भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने चुनौती बनती हैं। यदि किसी मोहल्ले में किसी विशेष प्रत्याशी को समर्थन नहीं मिलता तो वहां सड़क, नाली या हैंडपंप की मरम्मत जैसे जरूरी कार्यों की उपेक्षा करना उचित नहीं है। पंचायत का धन और सरकारी योजनाएं किसी व्यक्ति या राजनीतिक गुट की निजी संपत्ति नहीं हैं। इनका उद्देश्य पूरे गांव को सुविधाएं उपलब्ध कराना है। जिस वार्ड में किसी उम्मीदवार को कम समर्थन मिला हो, वहां के नागरिक भी उसी पंचायत के बराबर अधिकार रखने वाले निवासी हैं। विकास का बंटवारा राजनीतिक पसंद-नापसंद के आधार पर नहीं, बल्कि आवश्यकता और जनहित के आधार पर होना चाहिए। किसी मोहल्ले की उपेक्षा करना अंततः पूरे गांव की एकता और विश्वास को कमजोर करता है।
मतदाताओं को यह समझना होगा कि चुनावी प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए समाज में वैमनस्य पैदा करना लोकतांत्रिक भावना के अनुकूल नहीं है। गांवों में जाति, गुट, व्यक्तिगत संबंध और राजनीतिक विचारधारा के आधार पर मतभेद हो सकते हैं, मगर इन मतभेदों को स्थायी दुश्मनी में बदलने से बचना चाहिए। चुनाव समाप्त होने के बाद सभी ग्रामीणों को मिलकर रहना है। गांव की सड़क पर हर परिवार चलता है, पेयजल की जरूरत प्रत्येक घर को होती है और नालियों की उचित व्यवस्था पूरे मोहल्ले के लिए आवश्यक है। इसलिए विकास के सवाल पर किसी भी प्रकार का भेदभाव गांव के सामूहिक हित के विरुद्ध है। जनप्रतिनिधि का दायित्व सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करना और उनकी समस्याओं का निष्पक्ष समाधान करना है।
उम्मीदवारों को भी यह समझना चाहिए कि मतदाताओं का विश्वास केवल आश्वासन देकर लंबे समय तक कायम नहीं रखा जा सकता। जनता अब अपने प्रतिनिधियों से कामकाज का हिसाब मांगने लगी है। किस योजना के लिए कितनी राशि स्वीकृत हुई, कौन सा काम पूरा हुआ, कौन सा अधूरा है और देरी के क्या कारण हैं, इन विषयों पर पारदर्शिता आवश्यक है। पंचायत की बैठकों में ग्रामीणों की भागीदारी बढ़नी चाहिए तथा विकास कार्यों की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। इससे न केवल अनियमितताओं की आशंका कम होगी, बल्कि ग्रामीणों को यह भी पता चलेगा कि उनके गांव के लिए निर्धारित संसाधनों का उपयोग कहां और किस प्रकार किया जा रहा है। ईमानदारी, नैतिकता और जवाबदेही किसी भी जनप्रतिनिधि के महत्वपूर्ण गुण हैं।
मतदान करते समय ग्रामीणों को उम्मीदवार की योग्यता, पिछले कार्यों, सार्वजनिक व्यवहार और भविष्य की योजनाओं पर विचार करना चाहिए। केवल बड़े-बड़े वादे करना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि उम्मीदवार गांव की समस्याओं को समझता है या नहीं, पंचायत के नियमों और योजनाओं की जानकारी रखता है या नहीं तथा कठिन परिस्थितियों में सभी लोगों को साथ लेकर चलने की क्षमता रखता है या नहीं। यदि किसी प्रत्याशी के विरुद्ध गुंडागर्दी, धमकी या भ्रष्टाचार से संबंधित आरोप सामने आते हैं तो मतदाताओं को अफवाहों पर भरोसा करने के बजाय विश्वसनीय तथ्यों और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर विचार करना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को केवल व्यक्तिगत विरोध के कारण खारिज करना या बिना प्रमाण दोषी मान लेना उचित नहीं है। मतदान का निर्णय विवेकपूर्ण और स्वतंत्र होना चाहिए।
विकसित भारत की कल्पना तभी साकार हो सकती है, जब गांवों में विकास की लौ निरंतर जलती रहे। देश की उन्नति का रास्ता गांवों की प्रगति से होकर गुजरता है। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल, सड़क, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं मजबूत होंगी तो ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर होगी। पंचायतें इस परिवर्तन की आधारशिला हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब स्थानीय स्तर पर उनका क्रियान्वयन जिम्मेदारी और पारदर्शिता के साथ किया जाएगा। इसके लिए जनप्रतिनिधियों के साथ अधिकारियों और ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।
चुनाव के समय उम्मीदवारों की संख्या बढ़ जाती है और हर दरवाजे पर पहुंचकर समर्थन मांगने की होड़ दिखाई देती है। लेकिन मतदाताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनका एक वोट अगले कार्यकाल में गांव की दिशा और दशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए किसी दबाव, प्रलोभन, भय या भावनात्मक अपील में आए बिना मतदान करना चाहिए। उम्मीदवारों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि वे गांव की पेयजल समस्या, अधूरी सड़कों, नालियों, खराब हैंडपंपों और अन्य बुनियादी जरूरतों के समाधान के लिए क्या ठोस योजना रखते हैं। गांव के भविष्य से जुड़े इन सवालों के जवाब चुनावी वादों से अधिक महत्वपूर्ण हैं।
अंततः पंचायतीराज चुनाव केवल सरपंच या वार्ड पंच चुनने का अवसर नहीं, बल्कि गांव के विकास के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का समय है। मतदाता ऐसे प्रतिनिधियों को चुनने पर विचार करें जो जनहित को प्राथमिकता दें, सभी वार्डों के साथ समान व्यवहार करें, सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता रखें और जनता के प्रति जवाबदेह रहें। राजनीतिक विचारधारा अलग-अलग हो सकती है, लेकिन गांव के विकास, सामाजिक सद्भाव और देश की उन्नति का लक्ष्य साझा होना चाहिए। जब गांव में भेदभाव के स्थान पर समानता, वादों के स्थान पर काम और स्वार्थ के स्थान पर जनसेवा को महत्व मिलेगा, तभी विकसित गांव और विकसित भारत का सपना मजबूत आधार प्राप्त करेगा।
कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार
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