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हमारे विचार परम्पराएं ओर बुजुर्गों के अनुभवो का लाभ उठाकर नई पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण का व्रत लेना चाहिए-जिनेन्द्रमुनि*

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*हमारे विचार परम्पराएं ओर बुजुर्गों के अनुभवो का लाभ उठाकर नई पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण का व्रत लेना चाहिए-जिनेन्द्रमुनि*
कांतिलाल मांडोत
गोगुन्दा 20 सितंबर
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावकसंघ महावीर जैन गौशाला उमरणा के स्थानक भवन में जिनेन्द्रमुनि मसा ने कहा कि व्यक्ति भूभाग शासक और संविधान ये चारों राज्य के मूलभूत अंग होते है।भारत ने अपनी आजादी अहिंसा और सत्यग्रह से प्राप्त की थी।आज देश मे लाखो करोड़ों लोग है जो महावीर बुद्ध की अहिंसा के कायल है।देश की सत्ता पर चाहे किसी भी दल का शासन हो,परन्तु सभी की भावना राष्ट्र सेवा जन सेवा की रहनी चाहिए।आज कोई राष्ट्र निर्माण की बात करता है तो उसके पीछे लोगो के षड्यंत्र की बू आती है।गरीबो के उत्थान की ,नारी के सम्मान की कोई बात करता है तो उसको वेवकुफ समझा जाता है।देश भौतिक रूप से सम्पन्न हो गया है।लेकिन देश मे ऐसे भी लोग है जिसको देश का विकास नही भा रहा है।मुनि ने कहा कि बालको को गुरुजन समयानुसार शिक्षा प्रदान कर उनका सर्वांगीण विकास करने का प्रयास भी करते है,मगर समाज मे आकर उनका दूसरा रूप ही प्रकट होता है।बालक को सिखाया कुछ जाता है ओर सीखता कुछ ओर है।आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी में अनुशासन प्रेम भाईचारा एवं राष्ट्र भक्ति पैदा की जाए।मनुष्य ही नही ,बल्कि पशु पक्षियों के प्रति भी उनमें प्रेम हो।संत ने कहा कि बालक का मस्तिष्क तो गीली मिट्टी का लौंदा होता है।उसे लौंदे को जैसा आकार दोगे, वह वैसा ही रूप धारण करेगा।आज व्यसन और फैशन ने नई पीढ़ी को नियम एवम नीति से परे धकेल दिया है।आज के विद्यार्थी को राष्ट्र सेवा की बात सोचने की जरूरत है।यह देश तो वह देश है,जहाँ तक्षशिला और नालन्दा जैसे विश्वविद्यालय थे।दुनियाभर में ज्ञानार्जन हेतु जहाँ विद्यार्थी आते थे।जहाँ पर ज्ञान के साथ नैतिकता की शिक्षा दी जाती थी।विद्यार्थियों को स्वावलंबन की भावना पैदा की जाती थी।जीवन व्यवहार शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग था।अपने धर्म व दर्शन के प्रति निष्ठावान बनने की प्रेरणा दी जाती थी।सभी भाषाओं से प्रेम व आदर रखने की प्रेरणा दी जाती थी।आज फिर उसी परम्परा को पुनर्जीवित करने की जरूरत है।आज नवयुवकों में राष्ट्र भक्ति की भावना पैदा करने की महती आवश्यकता है।हमे विश्व मे आदर्श प्रस्तुत करना है।प्रवीण मुनि ने कहा मानव को धर्म की साधना कर लेनी चाहिए।मुनि ने कहा हमारा आहार शुद्ध होगा तो हमारा स्वास्थ्य भी उत्तम और स्वाभाविक अवस्था मे स्थिर रहेगा।विश्व मे बढ़ रही अशांति का मूल कारण आहार में आया परिवर्तन है।रितेश मुनि ने कहा कि भारतीय जीवन पद्धति की महिमा जानकर अनेकों देशों में अहिंसा की महिमा बखानते नही थकते है।प्रभातमुनि ने कर्म पर जोर दिया और कहा कि नीच कर्म से स्वयं को अलग रखने में ही जीवन का हित है।जो दूसरों को रुलाने की सोचता है,एक दिन उसे भी रोना पड़ता है।

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