आत्मा की साक्षी सेअपने एक एक पल को याद करना ही क्षमायाचना है*

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आत्म-ज्योति का पर्व संवत्सरी
*आत्मा की साक्षी सेअपने एक एक पल को याद करना ही क्षमायाचना है*
आज का यह संवत्सरी पर्व धार्मिक पर्व होते हुए भी सबसे भिन्नता लिए हुए है। यह पर्व आडम्बर का नाहीं, बल्कि आत्म-ज्योति जगाने का पर्व है। अन्तर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने का पर्व है। यह त्याग और तप की भावना को जाग्रत करने का पर्व है। अधिकांश पर्व एक, दो या तीन दिन तक चलकर इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन यही एक पर्य ऐसा है, जो लगातार आठ दिन तक तप साधनापूर्वक मनाया जाता है। हमारे मन में जो बुराइया हैं, एक-एक करके उनका अन्त करते जायें तो जिस प्रकार सोने को अग्नि में तपाने पर वह और अधिक चमकीला व तेजयुक्त बन जाता है, उसी प्रकार यह संवत्सरी पर्व भी मानव-जीवन में नई चमक उत्पन्न कर देता है। कुछ भाई-बहिन तो आठ दिनों तक उपवास करते हैं, कुछ आज ही करते हैं। धार्मिक दृष्टि के साथ-साथ प्राकृतिक दृष्टि से भी तपस्या की यह भावना शारीर के लिए हितकारी है। बड़े बुजुर्गों की भाँति नन्हे-मुझे बालक भी ताप, त्याग और उपवास करने के लिए छटपटाते हैं। माता-पिता बालकों से कहते हैं कि आभी तुम छोटे हो, तुम्हारी उम्र उपवास करने की नहीं है। लेकिन पर्व को महत्ता का अधिक ज्ञान ना रखते हुए भी वे व्रत एवं उपवास करने में पीछे नहीं रहते।
माता-पिता को यह डर रहता है कि बालक भूखा रहेगा तो कमजोर हो जायेगा, लेकिन पश्चिम के एक आहार-विशेषज्ञ ने अपनीशोध में यह सिद्ध किया है कि आहार हमारी आदत है, आवश्यकता नहीं है। हमने एक आदत बना ली है कि सवेरे नाश्ता करेंगे, फिर भोजन होगा, बाद में चाय-कल लेंगे और शाम को फिर भोजन किया जायेगा। सुबह-शाम नियमित भोजन एवं नाश्ता करने की हमारी आदत हो गई है। इसलिए आदत के अनुसार सवेरे दस-ग्यारह बजे हमें अनुभव होता है कि भूख लग गई है। शाम को पाँच-छह बजे फिर हम खाने की सोचने लगते हैं। लेकिन जिस दिन हम यह नियम ले लेते हैं कि आज उपवास करेंगे तो उस दिन हमको न नाश्ते की इच्छा होगी न भोजन की। दुनियाँ में आज भी कई ऐसे लोग हैं, जो मात्र हवा और पानी के सहारे जीवित हैं और पूर्ण स्वस्थ हैं। कुछ तो मात्र एक गिलास दूध पीकर जीवन जी रहे हैं तो कुछ फलों के आधार पर जीवन का बहुत बड़ा भाग व्यतीत कर चुके हैं। अपने जीवन को स्वर्णिम चमक से युक्त बनाना है तो तप, त्याग एवं व्रत-उपवास का सहारा लेना होगा। यह संवत्सरी पर्व इसी बात का सन्देश देने आया है।
*आत्म-शत्रुओं से युद्ध की विजय का पर्व*
यह पर्व एक तरह से आठ दिन तक चलने वाले युद्ध के बाद आने वाला विजय-पर्व है, परन्तु कोई यह न सोच ले कि हम किसी दूसरे पर विजय प्राप्त करेंगे, क्योंकि यह तो अपने आपको जीतने का पर्व है। दूसरों पर तो शक्ति के बल पर विजय प्राप्त करना आसान है, मगर स्वयं पर विजय प्राप्त करना अति कठिन है। मन और इन्द्रियों पर विजय पाना सहज नहीं होता, पर यदि प्रयास करें तो जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है। यह पर्व मानव को यही कहने आता है कि बाहरी विजय से कुछ भला होने वाला नहीं है। सच्ची शान्ति तो मन को जीतने पर ही मिलेगी। राग-द्वेष, ईर्ष्या का अन्त होने पर ही खुशियों की सरगम गूंजेगी। यह विकारों को क्षय करने का पर्व है। आत्मा को जाग्रत करके उसके दिव्य गुणों की पूजा करने का पर्व है, संवत्सरी। आत्मा में परमात्मा की परम ज्योति प्रकट करने का यही उत्तम समय है। दुर्गुणों को नष्ट करके सद्गुणों को प्रकटाने का इससे अच्छा अवसर हमें फिर वर्ष भर नहीं मिलेगा। सद्गुण की महत्ता तो सब जगह है। जैन धर्म तो गुणपूजक धर्म है। यहाँ व्यक्ति की नहीं, अपितु उसके गुणों की पूजा होती आई है। यहाँ अगर किसी व्यक्ति को सम्मान मिला है, सन्त-सतियों को आदर मिला है तो उनके कुल, व्यक्तित्व के कारण नहीं, बल्कि उनके गुण और कृतित्व को आदर मिला है।
भगवान महावीर राजपुरुष थे मगर राजमहल का परित्याग करके जब उन्होंने त्याग का परिचय दिया और तप से जीवन को तपाया तो आज करोड़ों लोग उन्हें अपने मन में धारण किये हुए हैं। उनके श्रद्धालु भी त्याग-तप के द्वारा उनके पथगामी बन रहे हैं। जितने भी तीर्थंकर हुए हैं, वे सभी राजपुत्र थे। बड़े-बड़े राज्यों के स्वामी थे। वैभव और ऐश्वर्य का उनके पास पूर्ण प्राचुर्य था। इन सबके बावजूद भी वे कुछ और चाहते थे। राज्य का विस्तार उन्हें शान्ति नहीं दे पाया। धन-सम्पत्ति की लूट उन्हें शान्ति नहीं दे पाई। अतः उन्होंने अन्तरसाम्राज्य का विस्तार किया, राग-द्वेष, मोह-मायायदि आज भी हम अपने में चमक नाहीं ला पाये तो सारी साधना ही निरर्थक चाली जायेगी। आज सारी कटुता को भूल जाने का दिन है। मन की गाँठों को खोलने का दिन है आज। मानवीय गुणों के अभाव से हटकर पुनः अपने स्वभाव में आने का दिन है। अभाव का अन्त कर अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य का प्रभाव प्रकट करने का दिन है। विद्वेष का त्याग करके जिनवाणी का सन्देश घर-घर तक पहुँचाने का दिन है। युद्ध की लाल पताका नहीं, बल्कि शान्ति की श्वेत ध्वजा फहराने का दिन है। यह केवल थोथे प्रचार का नहीं, बल्कि सच्चे आचार-विचार का दिन है। अन्तर के अन्धकार को भगाकर विवेक की ज्योति जलाने का दिन है। अब यह हमको सोचना है कि हम अपने उद्देश्य में कहाँ तक सफल हुए हैं। कहीं हमारी स्थिति उस कोल्हू के बैल की तरह तो नहीं है, जो पूरे दिन चलकर भी वहीं-का-वहीं रहता है। यह पर्व मानव-जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाने को आता है। यदि यह जानकर भी मानव अधोगामी बना रहता है तो यह उसकी मूढ़ता है। हमें अपने मन के खाली कागज पर प्रेम, दया, सहानुभूति करुणा व क्षमा के सुन्दर चित्रलेते है।
अब यह हमे विचार करना है कि जीवन की परीक्षा में हम शून्य प्राप्त करते हैं या उत्तीर्ण होने के अंक प्राप्त करते हैं। जीवन के चुनाव में विजय वह प्राप्त करता है जो इक्यावन वोट प्राप्त करता है उन्चास वोट प्राप्त करके भी प्रत्याशी को हार का ही मुख देखना पड़ता है।हम सदैव इक्यावन बनें, उन्चास नहीं, यही हमारी सफलता है।
आज का दिन बाह्याडम्बर व प्रदर्शन का दिन नहीं है। उपवास करके उसका प्रदर्शन नहीं करना है। प्रदर्शन एवं आडम्बर का धर्म में कोई स्थान नहीं है। यदि मात्र प्रदर्शन के लिए हम पर्व मानते हैं तो उससे आत्म-शुद्धि कभी नहीं होगी। इससे पर्व की महत्ता घट जाती है। हर क्षण स्वयं में सात्त्विक भाव जगाकर मन को निर्मल बनायें, तभी जीवन में पर्व मनाने की सार्थकता सिद्ध होगा
कांतिलाल मांडोत वरीष्ठ पत्रकार

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