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*स्क्रीन में सिमटती दुनिया और कमजोर होती बचपन की नजर*
कभी बेंगलूरू जैसे शहरों में सुबह की शुरुआत खुली हवा, पेड़ों की हरियाली और दूर तक फैले मैदानों को निहारते हुए होती थी। आंखें सहज रूप से दूर तक देख लेती थीं, नजरें बिना किसी दबाव के काम करती थीं। लेकिन बीते एक दशक में यह दृश्य तेजी से बदला है। अब बच्चों और किशोरों की दुनिया कुछ इंच की स्क्रीन में सिमट गई है। मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप ने ज्ञान, मनोरंजन और संवाद को बेहद आसान बना दिया है, लेकिन इसी सुविधा की कीमत हमारी आंखें चुका रही हैं। आंखें, जो प्रकृति के हिसाब से दूर देखने और खुले वातावरण में काम करने के लिए बनी हैं, अब लगातार पास की चीजों पर टिके रहने को मजबूर हैं। इसका असर यह हुआ है कि कम उम्र में ही नजर से जुड़ी समस्याएं, खासकर मायोपिया यानी निकट दृष्टि दोष, तेजी से बढ़ रहा है।
नेत्र रोग विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि एक उभरता हुआ सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। अत्यधिक स्क्रीन टाइम, शारीरिक सक्रियता की कमी और असंतुलित जीवनशैली ने मिलकर बच्चों की आंखों पर ऐसा दबाव डाला है, जिसकी भरपाई आगे चलकर बेहद मुश्किल हो सकती है। हाल के स्वास्थ्य कार्यक्रमों और अध्ययनों में लाखों बच्चों की जांच के दौरान यह सामने आया है कि दृष्टि संबंधी समस्याएं अब अपवाद नहीं रहीं, बल्कि सामान्य होती जा रही हैं। यह स्थिति इसलिए और चिंताजनक है क्योंकि बच्चों की आंखें अभी विकास की अवस्था में होती हैं और इस दौरान पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव जीवनभर साथ रह सकता है।
मायोपिया की समस्या को समझना जरूरी है। जब बच्चा लगातार पास की चीजों, जैसे मोबाइल स्क्रीन या किताब, पर ध्यान केंद्रित करता है तो आंखों की मांसपेशियां उसी स्थिति में ढलने लगती हैं। धीरे-धीरे आंख की संरचना में बदलाव आने लगता है और दूर की वस्तुएं धुंधली दिखाई देने लगती हैं। शुरुआत में यह समस्या हल्की होती है, लेकिन समय के साथ चश्मे का नंबर बढ़ता चला जाता है। कई मामलों में किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते बच्चों को मोटे लेंस लगाने पड़ते हैं। यह केवल देखने की समस्या नहीं है, बल्कि सिरदर्द, आंखों में जलन, थकान और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई जैसी परेशानियां भी साथ आती हैं।
स्क्रीन की लत का एक और गंभीर पहलू ड्राई आई सिंड्रोम है, जो पहले वयस्कों में ज्यादा देखा जाता था, लेकिन अब बच्चों में भी आम हो रहा है। जब हम स्क्रीन देखते हैं तो सामान्य से कम पलक झपकाते हैं। इससे आंखों की सतह सूखने लगती है, जलन और लालिमा बढ़ती है। लंबे समय तक ऐसा रहने पर आंखों की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली कमजोर पड़ सकती है। इसके अलावा, नीली रोशनी का अत्यधिक संपर्क आंखों की रेटिना पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है, जिससे भविष्य में गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
इस पूरी तस्वीर में सबसे ज्यादा चिंता की बात शिशुओं और छोटे बच्चों को मोबाइल और टीवी दिखाने की बढ़ती प्रवृत्ति है। कई अभिभावक बच्चे को शांत रखने या व्यस्त रखने के लिए स्क्रीन का सहारा लेते हैं। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यह आदत बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और दृष्टि विकास तीनों पर नकारात्मक असर डाल सकती है। शुरुआती वर्षों में बच्चे की आंखें और मस्तिष्क तेजी से विकसित होते हैं। इस दौरान स्क्रीन पर निर्भरता उनके प्राकृतिक सीखने की प्रक्रिया को बाधित करती है। आंखें गहराई, दूरी और गति को पहचानने का अभ्यास नहीं कर पातीं, जो आगे चलकर देखने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
प्राकृतिक रोशनी की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई अध्ययनों में यह साफ तौर पर सामने आया है कि जो बच्चे रोजाना पर्याप्त समय बाहर धूप में बिताते हैं, उनमें मायोपिया का जोखिम कम होता है। धूप में रहने से शरीर में विटामिन-डी का स्तर बेहतर होता है और आंखों में डोपामाइन का स्राव बढ़ता है, जो आंख की लंबाई को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसके विपरीत, बंद कमरों में सीमित रहना और ज्यादातर समय स्क्रीन के सामने बिताना आंखों को उनके प्राकृतिक वातावरण से दूर कर देता है।
आज का शहरी जीवन बच्चों को खुले में खेलने से भी वंचित कर रहा है। पढ़ाई का दबाव, सुरक्षा की चिंता और डिजिटल मनोरंजन की उपलब्धता ने खेल के मैदानों को खाली कर दिया है। नतीजा यह है कि बच्चे न सिर्फ शारीरिक रूप से कम सक्रिय हो रहे हैं, बल्कि उनकी आंखों को भी वह राहत नहीं मिल पा रही, जिसकी उन्हें जरूरत है। आंखों के लिए दूर तक देखना एक तरह का व्यायाम है, जो उन्हें स्वस्थ रखता है। जब यह अभ्यास बंद हो जाता है तो आंखें कमजोर पड़ने लगती हैं।
दूरगामी परिणामों की बात करें तो यह समस्या केवल चश्मे तक सीमित नहीं रहती। उच्च स्तर का मायोपिया भविष्य में रेटिना डिटैचमेंट, ग्लूकोमा और मैक्युलर डिजनरेशन जैसी गंभीर आंखों की बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। इसका मतलब है कि जो समस्या बचपन में शुरू होती है, वह वयस्कता में अंधेपन तक का कारण बन सकती है। इसके अलावा, कमजोर नजर का असर बच्चे के आत्मविश्वास, पढ़ाई और सामाजिक व्यवहार पर भी पड़ता है। बार-बार आंखों की थकान और सिरदर्द से जूझता बच्चा पढ़ाई में पिछड़ सकता है और खेलकूद से दूर हो सकता है।
अभिभावकों की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में बेहद अहम है। बच्चों को पूरी तरह तकनीक से दूर रखना संभव नहीं है और न ही यह व्यावहारिक है। लेकिन संतुलन बनाना जरूरी है। स्क्रीन टाइम को सीमित करना, बीच-बीच में आंखों को आराम देना और बच्चों को बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करना छोटे लेकिन प्रभावी कदम हो सकते हैं। भोजन में हरी सब्जियां, फल और पोषक तत्व शामिल करना भी आंखों की सेहत के लिए जरूरी है। साथ ही, समय-समय पर आंखों की जांच करवाना समस्याओं को शुरुआती चरण में पकड़ने में मदद करता है।
समाज और शिक्षा व्यवस्था को भी इस दिशा में सोचने की जरूरत है। स्कूलों में लंबे समय तक डिजिटल पढ़ाई के बजाय मिश्रित तरीकों को अपनाया जाना चाहिए, जहां स्क्रीन और किताब दोनों का संतुलित उपयोग हो। बच्चों को आंखों की देखभाल के बारे में जागरूक करना और खुले में गतिविधियों के लिए समय निर्धारित करना भविष्य की पीढ़ी की दृष्टि बचाने की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।
यह समझना जरूरी है कि तकनीक अपने आप में बुरी नहीं है, लेकिन उसका अनियंत्रित उपयोग हमारी सबसे कीमती इंद्रियों में से एक, आंखों, को नुकसान पहुंचा रहा है। अगर आज हमने इस पर ध्यान नहीं दिया, तो आने वाले वर्षों में एक ऐसी पीढ़ी सामने होगी, जो बचपन से ही कमजोर नजर के साथ जीने को मजबूर होगी। खुला आसमान, दूर तक फैला मैदान और धूप में खेलते बच्चे केवल यादें न बन जाएं, इसके लिए अभी से सचेत होना होगा। बच्चों की आंखों की सुरक्षा केवल स्वास्थ्य का सवाल नहीं, बल्कि उनके पूरे भविष्य से जुड़ा हुआ मुद्दा है।
*कांतिलाल मांडोत*
कांतिलाल मांडोतल
L103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार,साहित्यकार,स्तम्भकार
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