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सदन की मर्यादा बनाम राजनीतिक सनसनी अप्रकाशित किताबों के हवाले और कांग्रेस की जिम्मेदारी*

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*सदन की मर्यादा बनाम राजनीतिक सनसनी अप्रकाशित किताबों के हवाले और कांग्रेस की जिम्मेदारी*

लोकसभा लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है, जहां शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं होते, बल्कि राष्ट्रीय भरोसे, संस्थागत मर्यादा और संवैधानिक जिम्मेदारी के प्रतीक भी होते हैं। ऐसे में अगर इस मंच पर ऐसे संदर्भ लाए जाएं, जिनका न तो आधिकारिक अस्तित्व हो और न ही सार्वजनिक सत्यापन, तो स्वाभाविक है कि सवाल केवल कथन पर नहीं, कथन करने की मंशा पर भी उठते हैं। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे की कथित अप्रकाशित किताब के हवाले से डोकलाम को लेकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का बयान इसी श्रेणी में आता है, जिसने संसद में हंगामा खड़ा कर दिया और देश के सामने एक गंभीर प्रश्न रख दिया। क्या राजनीतिक लाभ के लिए सदन की नियम-परंपरा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों को दांव पर लगाया जा सकता है?
राहुल गांधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान जिस मैगजीन लेख का हवाला दिया, वह स्वयं एक अप्रकाशित मेमॉयर पर आधारित बताया गया। जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कहा कि जिस किताब का जिक्र किया जा रहा है, वह प्रकाशित ही नहीं हुई है, तो इस तर्क को खारिज करना मुश्किल हो जाता है। संसदीय परंपरा साफ कहती है कि सदन में वही तथ्य उद्धृत किए जा सकते हैं, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध, प्रकाशित और सत्यापन योग्य हों। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी इसी नियम की याद दिलाई। इसके बावजूद, नियमों की अवहेलना कर बार-बार वही संदर्भ दोहराया गया, जिससे बहस का स्तर मुद्दे से हटकर टकराव तक पहुंच गया।
यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी, ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर ऐसे बयान दिए हों, जिन्हें बाद में या तो आधा-अधूरा बताया गया या तथ्यहीन। डोकलाम जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बोलते समय अतिरिक्त सावधानी अपेक्षित होती है, क्योंकि यहां केवल सरकार की आलोचना नहीं होती, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से सेना की रणनीति, क्षमता और निर्णयों पर भी सवाल खड़े होते हैं। स्वयं स्पीकर ने यह टिप्पणी की कि राष्ट्रीय हित के विषय पर सेना की आलोचना उचित नहीं है। यह टिप्पणी किसी दल विशेष के पक्ष में नहीं, बल्कि संस्था की रक्षा में दी गई चेतावनी थी।
राहुल गांधी का यह कहना कि “
“किताब को प्रकाशित नहीं करने दिया गया”भी बिना किसी ठोस प्रमाण के एक गंभीर आरोप है। अगर ऐसा है, तो सवाल उठता है कि कांग्रेस के पास इसके समर्थन में आधिकारिक दस्तावेज, लेखक का सार्वजनिक बयान या प्रकाशक की पुष्टि क्यों नहीं है? संसद में संदेह, कयास और ‘कहा जाता है’ जैसे शब्दों के आधार पर देश की सुरक्षा नीति पर बहस नहीं की जा सकती। यह न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करने वाला भी है।
कांग्रेस अक्सर यह आरोप लगाती रही है कि सरकार असहज सवालों से डरती है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में डर नहीं, बल्कि प्रक्रिया और नियमों पर जोर दिखा। अगर राहुल गांधी किसी प्रकाशित लेख या आधिकारिक बयान का हवाला देते, तो सरकार के पास उसका जवाब देने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। समस्या सवाल में नहीं, सवाल पूछने के तरीके में है। संसद बहस का मंच है, अफवाहों का नहीं। यही कारण है कि गृह मंत्री अमित शाह का यह कहना कि “मैगजीन तो कुछ भी लिख सकती है” केवल एक राजनीतिक तंज नहीं, बल्कि तथ्यात्मक चेतावनी भी है।
कांग्रेस की रणनीति पर नजर डालें तो यह साफ दिखता है कि वह सदन के भीतर और बाहर लगातार ऐसे मुद्दे उठाना चाहती है, जिनसे सरकार को राष्ट्रवाद और सुरक्षा के मोर्चे पर घेरा जा सके। लेकिन जब ऐसे प्रयास ठोस तथ्यों के बजाय अपुष्ट संदर्भों पर आधारित हों, तो वे खुद कांग्रेस की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाते हैं। जनता अब केवल आरोप नहीं, प्रमाण भी चाहती है। सोशल मीडिया और सूचना के इस दौर में आधे सच ज्यादा देर तक टिकते नहीं।
यह भी उल्लेखनीय है कि पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे ने स्वयं सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा है कि डोकलाम में चीनी टैंक भारतीय सीमा के भीतर 100 मीटर तक आ गए थे, जैसा दावा किया गया। अगर ऐसा कोई गंभीर तथ्य होता, तो वह किसी न किसी आधिकारिक माध्यम से सामने आता। सेना और सरकार के बीच संवाद कोई छिपी हुई प्रक्रिया नहीं है, खासकर जब बात सीमा सुरक्षा की हो। ऐसे में अप्रकाशित किताब के हवाले से सनसनी फैलाना न तो जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका है और न ही परिपक्व राजनीति की पहचान।
सदन की कार्यवाही का बार-बार स्थगित होना भी किसी के हित में नहीं है। विपक्ष का काम सवाल पूछना है, लेकिन नियमों के भीतर रहकर। सरकार का काम जवाब देना है, लेकिन तथ्य और मर्यादा के साथ। जब दोनों में से कोई एक भी इस संतुलन को तोड़ता है, तो नुकसान लोकतंत्र का होता है। इस पूरे घटनाक्रम में सरकार ने नियमों का हवाला दिया, जबकि कांग्रेस ने भावनात्मक और आरोपात्मक राजनीति को तरजीह दी। यही अंतर आज की राजनीति की दिशा तय कर रहा है।
अंततः, यह बहस किसी एक किताब या एक बयान तक सीमित नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि हम संसद को किस रूप में देखना चाहते हैं।एक गंभीर नीति-निर्माण मंच या राजनीतिक सुर्खियों का अखाड़ा। कांग्रेस और राहुल गांधी को आत्ममंथन करना होगा कि क्या बार-बार बेबुनियाद आरोप लगाकर वे वास्तव में राष्ट्रीय हित की सेवा कर रहे हैं, या केवल तात्कालिक राजनीतिक लाभ की तलाश में हैं। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण है उसकी जिम्मेदारी। बिना प्रमाण के आरोप न केवल सरकार को, बल्कि पूरे देश को कमजोर करते हैं।

      *कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*

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