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आज फिर चला पूजा का दौर,शहर में महिलाओ ने परोसे शीतला माता को व्यंजन*

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*आज फिर चला पूजा का दौर,शहर में महिलाओ ने परोसे शीतला माता को व्यंजन*

एक तिथि एक आस्था भारतीय पर्व परंपरा की एकरूपता का समय
कांतिलाल मांडोत
सूरत 11 मार्च 2026
भारत की सांस्कृतिक पहचान उसके पर्व और त्योहारों से निर्मित होती है। यहाँ हर उत्सव केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि समाज को जोड़ने वाली भावनात्मक और सांस्कृतिक कड़ी भी है। होली, दीपावली, नवरात्र, गणगौर, शीतला सप्तमी जैसे पर्व भारतीय जनजीवन में आस्था, उल्लास और परंपरा का सुंदर संगम प्रस्तुत करते हैं। इन पर्वों के माध्यम से पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएँ और संस्कार जीवित रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नई प्रवृत्ति दिखाई देने लगी है, जिसमें कई पर्व दो या तीन दिनों तक मनाए जाने लगे हैं। यह स्थिति धीरे-धीरे समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रही है और पर्वों की पारंपरिक गरिमा पर भी प्रश्न खड़े कर रही है।
हाल ही में शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी के अवसर पर सूरत सहित देश के अनेक क्षेत्रों में महिलाओं ने बड़ी श्रद्धा के साथ शीतला माता की पूजा की। राजस्थानी परंपरा से जुड़े परिवारों में यह पर्व विशेष उत्साह से मनाया जाता है। महिलाएँ एक दिन पहले ही विविध प्रकार के शीतल व्यंजन तैयार करती हैं और अगले दिन माता को उनका भोग लगाकर पूजा-अर्चना करती हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं बल्कि स्वास्थ्य और प्रकृति के संतुलन से भी जुड़ी हुई मानी जाती है। शीतला माता को शीतल भोजन अर्पित करने की मान्यता प्राचीन काल से चली आ रही है और इसमें लोकजीवन की गहरी आस्था दिखाई देती है।किन्तु इस बार एक विशेष स्थिति यह रही कि शीतला माता का पूजन कई स्थानों पर तीन दिनों तक चलता रहा। कहीं इसे सप्तमी को मनाया गया, कहीं अष्टमी को और कहीं दोनों दिनों के साथ तीसरे दिन भी पूजा का आयोजन हुआ। इससे आम श्रद्धालुओं के बीच यह प्रश्न उठने लगा कि वास्तविक तिथि कौन सी है और पर्व कब मनाना अधिक उचित होगा। धार्मिक आस्था रखने वाले लोग प्रायः पंचांग और ज्योतिषीय गणना पर भरोसा करते हैं। इसलिए जब अलग-अलग तिथियों की घोषणा होती है तो समाज में असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
भारतीय पंचांग की परंपरा अत्यंत प्राचीन और वैज्ञानिक मानी जाती है। सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों की गति के आधार पर तिथियों की गणना की जाती है। इसी गणना के आधार पर हर पर्व का निश्चित समय निर्धारित होता है। यद्यपि खगोलीय गणनाओं में कभी-कभी तिथि का क्षय या वृद्धि होना स्वाभाविक है, फिर भी परंपरा यह रही है कि किसी भी पर्व को एक ही प्रमुख तिथि पर मनाया जाए ताकि समाज में एकरूपता बनी रहे। जब एक ही पर्व अलग-अलग दिनों में मनाया जाने लगता है तो उसका सामूहिक स्वरूप कमजोर पड़ने लगता है।

पर्वों की सबसे बड़ी विशेषता उनका सामूहिक उत्साह होता है। जब पूरा समाज एक साथ किसी उत्सव को मनाता है तो उसमें जो आनंद और ऊर्जा उत्पन्न होती है, वह अद्भुत होती है। मंदिरों में भीड़, घरों में सजावट, गीत-संगीत और सामूहिक पूजा का वातावरण समाज को जोड़ने का कार्य करता है। लेकिन जब तिथियों को लेकर भ्रम की स्थिति बन जाती है तो यह सामूहिकता प्रभावित होती है। कुछ लोग एक दिन पूजा करते हैं तो कुछ दूसरे दिन, जिससे उत्सव की एकजुटता में कमी दिखाई देती है।
यह स्थिति केवल शीतला सप्तमी तक सीमित नहीं है। होली और दीपावली जैसे बड़े त्योहारों के साथ भी कई बार ऐसी परिस्थितियाँ सामने आती हैं। कहीं होली एक दिन मनाई जाती है तो कहीं दूसरे दिन, इसी तरह दीपावली की तिथियों को लेकर भी मतभेद देखने को मिलते हैं। जबकि भारतीय समाज की भावना यह रही है कि प्रमुख पर्व पूरे देश में एक ही दिन मनाए जाएँ ताकि उनका सांस्कृतिक प्रभाव और सामाजिक उत्साह समान रूप से दिखाई दे।
ज्योतिषाचार्यों और पंचांग निर्माताओं की इस विषय में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे शास्त्रों और खगोलीय गणनाओं के आधार पर तिथियों का निर्धारण करते हैं। इसलिए समाज की अपेक्षा रहती है कि वे ऐसी व्यवस्था करें जिससे पर्वों की तिथियों को लेकर अधिक स्पष्टता और एकरूपता बनी रहे। यदि विभिन्न पंचांगों के बीच समन्वय स्थापित किया जाए तो यह समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है। इससे श्रद्धालुओं के मन में भी विश्वास बना रहेगा और पर्वों की गरिमा भी अक्षुण्ण रहेगी।

भारतीय संस्कृति की सुंदरता उसकी परंपराओं की निरंतरता में है। पर्व और त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक हैं। इन्हें मनाने का उद्देश्य समाज में प्रेम, सद्भाव और सामूहिकता की भावना को मजबूत करना है। इसलिए आवश्यक है कि इन पर्वों की तिथियों को लेकर स्पष्टता और एकरूपता बनी रहे। जब पूरा समाज एक साथ किसी उत्सव को मनाता है तो उसकी गरिमा और आनंद कई गुना बढ़ जाता है।

समय आ गया है कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए और ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे पर्वों की तिथियों को लेकर भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके। यदि ज्योतिषाचार्य, धर्माचार्य और पंचांग विशेषज्ञ मिलकर एक समान तिथि निर्धारण की दिशा में प्रयास करें तो निश्चित रूप से भारतीय पर्व परंपरा की गरिमा और भी अधिक सुदृढ़ होगी। तब हर उत्सव उसी उल्लास और एकजुटता के साथ मनाया जाएगा जो सदियों से भारतीय संस्कृति की पहचान रही है।

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