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मीरा कन्या महाविद्यालय में प्राक् लोक मंथन संगोष्ठी में लोकपरंपरा के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप पर हुआ गंभीर विमर्श*

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गवरी साधना मेवाड़ की सांस्कृतिक आत्मा और लोकआस्था का जीवंत प्रतीक
*मीरा कन्या महाविद्यालय में प्राक् लोक मंथन संगोष्ठी में लोकपरंपरा के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप पर हुआ गंभीर विमर्श*
कांतिलाल मांडोत
उदयपुर 8 अक्टूबर 26

मेवाड़ की समृद्ध लोकसंस्कृति, जनआस्था और आध्यात्मिक चेतना में गवरी का विशिष्ट स्थान है। यह केवल लोकनाट्य या मनोरंजन की परंपरा नहीं, बल्कि जनजीवन, धार्मिक विश्वास, सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतिबिंब है। इसी महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर के विविध पक्षों को समझने और उसके संरक्षण की दिशा में विचार-विमर्श करने के उद्देश्य से अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ राजस्थान (उच्च शिक्षा) की राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय, उदयपुर इकाई की ओर से ‘मेवाड़ का सांस्कृतिक मानबिंदु : गवरी साधना’ विषय पर प्राक् लोक मंथन संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी में गवरी की लोकपरंपरा, आध्यात्मिक आधार, सांस्कृतिक चेतना तथा वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर सार्थक चर्चा हुई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. अंजना गौतम ने की। उन्होंने स्वागत उद्बोधन में कहा कि लोकपरंपराएं किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान की आधारभूमि होती हैं। इन परंपराओं में पीढ़ियों का अनुभव, समाज की मान्यताएं, जीवन मूल्य और ऐतिहासिक स्मृतियां समाहित रहती हैं। इसलिए लोकसंस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए केवल आयोजन करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि निरंतर संवाद, अध्ययन और शोध की भी आवश्यकता है। उन्होंने ऐसी संगोष्ठियों को सांस्कृतिक विरासत को समझने तथा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
संगोष्ठी की मुख्य वक्ता डॉ. रजनी पी. रावत ने गवरी को मेवाड़ की विशिष्ट लोक-सांस्कृतिक परंपरा बताते हुए इसके विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने गवरी के लोकजीवन से गहरे संबंध को रेखांकित करते हुए बताया कि इस परंपरा में क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना, धार्मिक आस्था और सामूहिक जीवन की झलक दिखाई देती है। गवरी जैसी लोकपरंपराएं समाज की सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखती हैं और स्थानीय समुदायों की विशिष्ट पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने इसके व्यापक स्वरूप को समझने और इसके सांस्कृतिक महत्व को समाज के सामने लाने की आवश्यकता पर बल दिया।


कार्यक्रम में विषय प्रवर्तन इकाई सचिव डॉ. प्रहलाद धाकड़ ने किया। उन्होंने गवरी की परंपरा, उसके सांस्कृतिक स्वरूप और लोकमानस में उसकी भूमिका की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि लोककलाओं का महत्व केवल उनके प्रदर्शन तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनके पीछे निहित सामाजिक अनुभव, आस्था और जीवन दृष्टि भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। गवरी का अध्ययन मेवाड़ के लोकजीवन और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. गणेश कुरिया ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे स्वयं गवरी नाटक में अभिनय करते हैं। उन्होंने अपनी आस्था व्यक्त करते हुए कहा, “गवरी माता की कृपा से ही मैं डॉक्टर बना हूं।” उनके इस कथन ने गवरी के प्रति कलाकारों और इससे जुड़े लोगों की श्रद्धा तथा भावनात्मक जुड़ाव को सामने रखा। उन्होंने गवरी में निहित सनातनी विचारधारा और सकारात्मक सोच को इसकी विशिष्ट पहचान बताया। उनके अनुसार, गवरी से जुड़ाव केवल कला तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आस्था, जीवन मूल्यों और व्यक्तिगत अनुभवों से भी जुड़ता है।


विशिष्ट अतिथि श्री लोकेश जी पालीवाल ने गवरी की व्यापकता पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह अपने आप में अत्यंत विस्तृत लोकपरंपरा है। इसे किसी एक क्षेत्र तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि यह व्यापक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में समाज को जोड़ने की क्षमता रखती है। उन्होंने गवरी की रचनात्मक शक्ति और उसकी प्रभावशीलता को रेखांकित करते हुए कहा, “गवरी से बड़ा पावरफुल कंटेंट दुनिया में नहीं है।” उनका यह वक्तव्य गवरी की सांस्कृतिक समृद्धि और लोककलाओं की प्रभावशाली अभिव्यक्ति क्षमता की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
संगोष्ठी के दौरान वक्ताओं के विचारों से यह संदेश उभरकर सामने आया कि मेवाड़ की लोकपरंपराओं का संरक्षण सामूहिक जिम्मेदारी है। आधुनिक समय में सांस्कृतिक बदलावों के बीच गवरी जैसी परंपराओं का अध्ययन, दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी तक उनका परिचय पहुंचाना आवश्यक है। शैक्षणिक संस्थानों में ऐसे आयोजनों से लोककला को अकादमिक विमर्श से जोड़ने और उसके महत्व को व्यापक स्तर पर समझने का अवसर मिलता है।
कार्यक्रम का संचालन इकाई सहसचिव डॉ. प्रीति भट्ट ने किया। अंत में इकाई सहसचिव श्री नरपत दान ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने मुख्य वक्ता, विशिष्ट अतिथियों, महाविद्यालय की प्राचार्य और उपस्थित संकाय सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया।
संगोष्ठी में संगठन के प्रदेश, विभाग और जिला स्तर के दायित्ववान कार्यकर्ताओं सहित 100 से अधिक संकाय सदस्य उपस्थित रहे। आयोजन ने मेवाड़ की सांस्कृतिक पहचान में गवरी के महत्व को रेखांकित करते हुए उसकी परंपरा, साधना, लोकआस्था और आध्यात्मिक चेतना पर गंभीर विमर्श का अवसर प्रदान किया।

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