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पुस्तके लेखकों का अमर कीर्ति स्तंभ है, जीवन-विकास में पुस्तक की अहम भूमिका*

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*पुस्तके लेखकों का अमर कीर्ति स्तंभ है, जीवन-विकास में पुस्तक की अहम भूमिका*

ज्ञानार्जन या ज्ञानोपलब्धि के लिए स्वाध्याय और पुस्तकों का सम्बन्ध अन्न और जल तथा सुई और धागे की तरह एक-दूसरे का पोषक एवं पूरक है। स्वाध्याय के साथ पुस्तकों और पुस्तकालयों का महत्त्व और उनकी उपयोगिता पर भी चिन्तन करना अपेक्षित है। देव पूजन में जितना महत्त्व देवी- देवों का है, उतना ही महत्त्व देवालयों का है। यदि देव मन्दिर अथवा देवालय नहीं होंगे तो देव-विग्रह की प्रतिष्ठा कहाँ होगी ?
हम सभी जानते हैं, पुस्तक स्वयं में ज्ञान नहीं हैं। वह निर्जीव कागजों का एक संपुट है, परन्तु ज्ञान का वह एक महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं, जिसकी उपयोगिता सर्वमान्य है।
पुस्तकें देखने में अजीब अथवा जड़ दिखाई देती हैं। एक दृष्टि से पुस्तकें जड़ या अजीब ही हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि उनमें लेखकों, रचयिताओं की आत्मा बसी रहती है। इसलिए भावात्मक दृष्टि से उस ज्ञान के साधन को ज्ञान मानकर प्रतिष्ठित किया गया है। शास्त्र, ग्रंथ की पूजा के पीछे यही भाव दृष्टि रहती है। पुस्तकें सच्चे मित्र की तरह पाठकों को ‘कुपथ निवारि सुपंथ चलावा’-के अनुसार कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर चलाती हैं। वे परामर्श भी देती हैं। श्रेष्ठ मंत्र के रूप में हमारे कष्टों का निवारण भी करती हैं। पुस्तकें दुष्टों, दुर्जनों अथवा शत्रुओं की तरह अपने पाठकों को पथभ्रष्ट भी करती है। पुस्तकें यदि अमृतमयी हैं तो विष से भरी भी होती हैं। पुस्तकें मशाल हैं। वे उजाला भी हैं और आग भी लगाती हैं।संत असंत, सज्जन- दुर्जन, मित्र-शत्रु की तरह जैसे मानव का वर्गीकरण है, उसी तरह पुस्तकें भी दो तरह की होती हैं। पुस्तकों और मनुष्यों में गुण-दोषों का वर्गीकरण होता है।

 

सृष्टि के अंत तक
धर्मग्रंथ को शास्त्र इसलिए कहा जाता है कि वह हमारे चित्त पर शासन करता है। राग-द्वेष से उद्धत हुए मन को अनुशासित करता है। इसलिए सम्पर्क अनुशासन करने में समर्थ होने के कारण इसे शास्त्र कहा जाता है।
शास्त्र सबकी आँख है। सूर्य संसार का नेत्र है इसलिए उसे जगच्चतु कहा है। किन्तु ज्ञानियों को ‘अनंत चक्षु’ कहा जाता है। क्योंकि वे अपने ज्ञान से अनन्त, अपार संसार को देख लेते हैं। अंधा भी शास्त्र की आँख से देख लेता है। प्रसिद्ध विचारक लिंटन ने कहा है- ग्रंथों में आत्मा होती है। सद्ग्रंथों का कभी नाश नहीं होता।” लिंटन के इन शब्दों में यह स् ध्वनित है कि पुस्तकें जीवित भी हैं और उनका आयुष्य भी होता है।
*पुस्तकें ज्ञानियों की समाधि*
पुस्तकों के लक्षण और उनके गुणों के बारे में एक विचारक ने कितना सटीक कहा है- “पुस्तकें ज्ञानियों की समाधि हैं। किसी में ऋषभदेवएवं महावीर है तो किसी में राम कृष्ण और बुद्ध किसी में वाल्मीकि, सूरदास तुलसीदास एवं कबीर है तो किसी में ईसा मुसा और हजरत मुहम्मद । उन्हें खोलते ही वे महापुरुष हमारे सामने बोलने लग जाते हैं।”
कार्लाइल ने कहा है- ‘मनुष्य ने जो कुछ किया, सोचा और पाया, वह सब पुस्तकों के जादू भरे पृष्ठों में अंकित है।
यदि कही देखना है तो पुस्तकों में देखें। रूपसकोरोट के शब्दों मैं- ही एक मात्र अमर है।” राम कृष्ण महावीर आज यदि हैं और आगे भी रहेंगे तो पुस्तकों के अमरत्व के कारण। जिसकी पुस्तकें विद्यमान हैं वह व्यक्ति मरकर भी सदा अमर रहता है। पुस्तकें लेखकों का अमर कीर्ति स्तंभ है। रणभूमि में जैसे अस्त्र-शस्त्रों की आवश्यकता होती है, उसी तरह बर्नार्ड शा के शब्दों में विचारों के युद्ध में पुस्तकें ही अस्त्र हैं।”
महात्मा तिलक ने पुस्तकों में उस क्षमता-सामर्थ्य का अनुभव किया है, जो नरक को भी स्वर्ग बना देता है। वे कहते हैं- मैं नरक में पुस्तकों का स्वागत करूंगा, क्योंकि उनमें वह शक्ति है कि जहाँ वे रहेंगी, वहाँ अपने आप स्वर्ग बन जाएगा।”
जीवन सौरभ’ में बड़ा अच्छा परामर्श यह दिया गया है कि “तुम्हारे पास दो रुपये हों तो एक की रोटी खरीदो और दूसरे से अच्छी पुस्तक । रोटी जीवन देती है और अच्छी जीवन कला सिखाती है।
जैसे आत्मा निराकार है, वैसे ही विचार भी निराकार हैं। आत्मा ज्योतिर्मय है। विचार भी ज्योतिर्मय है। आत्मा के अस्तित्त्व की अनुभूति जड़ शरीर के माध्यम से होती है। ठीक इसी प्रकार महापुरुषों, चिन्तकों, तीर्थकरों के विचारों का साकारीकरण जड़ कागज, भोजपत्र, ताडपत्र के माध्यम से होता है। आत्मा शरीर के में साकार कैसे हुई, इसकी कल्पना कई तरह से की गई है। लेकिन विचारों ने अथवा अनुभूत ज्ञान ने पुस्तक का रूप कैसे धारण किया, यह तथ्य कल्पना पर आधारित नहीं है। इसका तो जीता-जागता एक इतिहास है। पुस्तक के प्रणयन की भी एक सच्ची आत्मकथा है।
स्थाली पुलाक न्याय के अनुसार पतीली का एक चावल देखने से ही चावलों के पकने की स्थिति मालूम पड़ जाती है। एक-एक करके सभी चावल नही देखे जाते है।
 

                               *कांतिलाल मांडोत*

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