जीवन जीने की कला समझकर करें सद्विचार, सद्वाणी और सदाचार का अनुसरण : जिनेन्द्र मुनि मसा*
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*जीवन जीने की कला समझकर करें सद्विचार, सद्वाणी और सदाचार का अनुसरण : जिनेन्द्र मुनि मसा*
कांतिलाल मांडोत
गोगुंदा 22 अगस्त
कस्बे के ब्रह्मपुरी स्थित वर्धमान स्थानकवासी जैन स्थानक में बुधवार को आध्यात्मिक चातुर्मास के तहत धर्मसभा का आयोजन हुआ। धर्मसभा में साधु-साध्वियों ने धार्मिक एवं आध्यात्मिक जीवन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को संयम, सदाचार और आत्मानुशासन के साथ जीवन जीने का संदेश दिया। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने धर्मसभा में भाग लेकर संतों के प्रवचनों का लाभ लिया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए महाश्रमण जिनेन्द्र मुनि काव्यतीर्थ ने कहा कि मनुष्य यदि जीवन जीने की सही कला को समझ ले तो वह अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। जीवन केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसा आदर्श जीवन जीने का प्रयास होना चाहिए, जिससे इस लोक के साथ परलोक भी सुधर सके। संत ने कहा कि मनुष्य के विचार, वाणी और आचरण उसके जीवन की दिशा तय करते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में सद्विचार, सद्वाणी और सदाचार को स्थान देना चाहिए।
मुनि ने कहा कि पुण्यवाणी का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर गहरा पड़ता है। वाणी जितनी पवित्र और प्रभावशाली होगी, उसके अनुरूप ही जीवन में सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे। उन्होंने श्रद्धालुओं को अपनी वाणी पर संयम रखने की सीख देते हुए कहा कि किसी के प्रति कटु या अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने के बजाय मधुर, हितकारी और सत्य वचन बोलने का प्रयास करना चाहिए। अच्छे विचारों और श्रेष्ठ आचरण के माध्यम से ही व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
साध्वी राजश्रीजी ने आगम वाणी के संदर्भ में वेग, संवेग और आवेग की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने कहा कि संवेग व्यक्ति को धर्म के मार्ग की ओर प्रेरित करता है, जबकि आवेग मनुष्य को बंधन की ओर ले जा सकता है। जीवन में आने वाली परिस्थितियों में व्यक्ति को जल्दबाजी और भावावेश से निर्णय लेने के बजाय विवेक और संयम से काम लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि गुरु के वचनों को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि गुरु वचनों में जीवन सुधार का गहरा रहस्य छिपा होता है।
साध्वी राजश्रीजी ने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि व्यक्ति को कर्म करते रहना चाहिए, लेकिन कर्म के अहंकार से बचना चाहिए। उन्होंने कहा, “कार्य करो, पर कर्ता मत बनो।” मनुष्य का व्यवहार और आचरण ही उसके धार्मिक जीवन की वास्तविक पहचान है। केवल धार्मिक क्रियाएं करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके माध्यम से जीवन में संयम, विनम्रता, करुणा और सद्भाव का विकास होना चाहिए।
धर्मसभा के दौरान चातुर्मास के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने कहा कि चातुर्मास आत्मचिंतन, धर्म आराधना और जीवन में सुधार का महत्वपूर्ण अवसर है। इस अवधि में श्रद्धालुओं को अधिक से अधिक समय धार्मिक गतिविधियों में लगाकर अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करना चाहिए।
धर्मसभा के संयोजक सुंदरलाल मेहता ने बाहर से आए अतिथियों एवं धर्मप्रेमियों का स्वागत किया। उन्होंने चातुर्मास के दौरान आयोजित होने वाले विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए बताया कि नियमित प्रवचन, नवकार महामंत्र जाप सहित अनेक धार्मिक आयोजन होंगे। उन्होंने धर्मप्रेमियों से अधिक से अधिक संख्या में कार्यक्रमों में शामिल होकर धर्म आराधना में सहभागिता निभाने का आह्वान किया।
धर्मसभा में तेरापंथ सभा के पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं ने शांतिपूर्वक संतों के विचार सुने और धर्ममय जीवन जीने का संकल्प लिया। समापन अवसर पर जिनेन्द्र मुनि ने मंगल पाठ सुनाया। उन्होंने श्रद्धालुओं को संयम, सदाचार और आत्मचिंतन को जीवन का आधार बनाने का संदेश दिया।
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