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अहिंसा के अभाव में जीवन और जगत की कल्पना भी नही की जा सकती-जिनेन्द्रमुनि मसा*

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*अहिंसा के अभाव में जीवन और जगत की कल्पना भी नही की जा सकती-जिनेन्द्रमुनि मसा*
कांतिलाल मांडोत
गोगुन्दा 26 अक्टूबर
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ उमरणा के भवन में जिनेन्द्रमुनि मसा ने फरमाया कि अहिंसा का महत्व असन्दिग्ध है।अहीसा को अपनाने में जीवन मे समग्रता आती है और उसमें दिव्यता का समावेश होता है।अहिंसा जीवन की महक है।अहिंसा में अपूर्वता है।अंश अंश जीवन की संपूर्ति से एक समय संपूर्णता की स्थिति आ जाती है।यह तो निर्विवाद सत्य है कि धर्म के बिना जीवन व्यर्थ हैऔर सबसे बड़ी बात यह है कि यदि अहिंसा नही तो धर्म भी नही है।दूसरे शब्दों में धर्म का अस्तित्व अहिंसा पर ही टिका है।अहिंसा को मैं जीवन जगत का प्राणतत्त्व कहता हूं।मुनि ने कहा अहिंसा के अभाव में जीवन जगत के अस्तित्व की कल्पना ही नही की जा सकती ।अहिंसा है तो जीवन और जगत का अस्तित्व है।यदि अहिंसा नही है तो समाज,मानव और मानवता का सारा तंत्र ही गड़बड़ा जाता है।संत ने कहा अहिंसा से जुड़ा हुआ है,वह धर्म को पा लेता है।भगवान महावीर ने उसी धर्म को धर्म कहा है,जिसमे अहिंसा,संयम और तप का समावेश है।मुनि ने कहा कि तप को अहिंसा के बाद का स्थान दिया गया है।अहिंसा है तो संयम और तप भी है।साधु के पांच महाव्रतों में प्रथम महाव्रत अहिंसा का है।जैनधर्म की तरह हर धर्म सम्प्रदाय ने अहिंसा को प्राथमिकता दी है।जैन मुनि ने कहा विश्वभर में आज जो स्थितियां निर्मित हुई है,वे मूलभाव की अपेक्षा के कारण है।आज जिस तरह से हिंसा को गौरव दिया जा रहा है।वह हमारी संस्कृति पर कुठाराघात है।स्पष्ट रूप से अभिशाप है।जो यह मान रहे है कि विश्व की सारी समस्या का समाधान हिंसा में है,वे भूल कर रहे है।मुनि ने कहा कि हिंसाओ को पुष्ट करना बुद्धिमता नही है।अक्रूर बुद्धि के बिना सारी साधना निष्प्राण है।प्रवीण मुनि ने कहा आज चारो और ईर्ष्या का अलाव जल रहा है।मनुष्य को मनुष्य पर ही विश्वास नही है।एक पड़ोसी दूसरे को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता है।धर्म के नाम पर ईर्ष्या,द्वेष और कलह का वातावरण बनाया जा रहा है।धर्म मे इन बातों का कही भी कोई स्थान नही है।रितेश मुनि ने कहा कि कुल मिलाकर तथ्य यह है कि अविवेक अर्थात असावधानी विविध समस्याओं का कारण है।पग पग पर सावधानी मनुष्य जीवन का अभिन्न अंग है।मुनि ने कहा यदि लक्ष्य को पाना है तो विवेकपूर्वक,असवधानिपूर्वक चलना या बढ़ना आवश्यक है।प्रभातमुनि ने कहा जिनेश्वर भगवान की वाणी के प्रति अनुरक्त बनकर,जो इसे अपने जीवन मे आत्मसात करता है,वे मल और क्लेश रहित बनकर जन्म,जरा और मृत्यु के दुःख से परिपूर्ण इस संसार सागर को पार कर लेते है।हम केवल जिनवाणी के गौरव का से संज्ञान ही न करे,अपितु इसे जीवन जीने का पुरुषार्थ भी करे।

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