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*भक्ति और उल्लास के संग झूम उठा जलवन्त टाऊनशिप, युवतियों ने मनाया गणगौर उत्सव*
सूरत 18 मार्च 2026
सूरत के पूणा बॉम्बे मार्केट रोड स्थित जलवन्त टाऊनशिप में इस वर्ष गणगौर उत्सव बड़े ही उत्साह, श्रद्धा और पारंपरिक रंगों के साथ मनाया गया। इस आयोजन में विशेष रूप से युवतियों और महिलाओं की भागीदारी ने पूरे माहौल को जीवंत बना दिया। सुबह से ही सोसायटी परिसर में पूजा-अर्चना की तैयारियां शुरू हो गई थीं, जहां महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार गणगौर माता की स्थापना कर विधिवत पूजा की।
कार्यक्रम में शामिल युवतियों ने राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत करते हुए पारंपरिक वेशभूषा धारण की। रंग-बिरंगे लहंगे, चूड़ियां, बिंदियां और सोलह श्रृंगार से सजी महिलाएं आकर्षण का केंद्र बनी रहीं। हाथों में रची मेहंदी और चेहरे पर उत्साह की चमक इस पर्व की महत्ता को दर्शा रही थी। पूजा के दौरान महिलाओं ने लोकगीत गाकर वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया, जिससे पूरा परिसर भक्ति रस में सराबोर हो गया।
पूजा-अर्चना के पश्चात सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें युवतियों ने विभिन्न पारंपरिक गीतों पर मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किए। डीजे की धुन पर भी महिलाएं और युवतियां थिरकती नजर आईं, जिससे उत्सव में आधुनिकता और परंपरा का सुंदर संगम देखने को मिला। विभिन्न टास्क और प्रतियोगिताओं के माध्यम से प्रतिभागियों ने अपनी कला और उत्साह का प्रदर्शन किया, जिससे आयोजन और भी रोचक बन गया।
इस आयोजन को देखने के लिए सोसायटी के अनेक पुरुष, महिलाएं और बच्चे भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। दर्शकों ने तालियों की गूंज के साथ प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया। पूरे कार्यक्रम के दौरान अनुशासन और सामूहिक सहभागिता की भावना स्पष्ट रूप से नजर आई। लोगों ने इस अवसर को आपसी मेलजोल और सांस्कृतिक जुड़ाव का माध्यम भी बनाया।
राजस्थान की परंपरा से जुड़े इस पर्व में महिलाओं की विशेष भूमिका होती है, और जलवन्त टाऊनशिप में भी यह बात साफ नजर आई। महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लेते हुए इस आयोजन को सफल बनाया और अपनी संस्कृति के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया। कार्यक्रम के अंत में सभी ने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं और इस तरह के आयोजनों को आगे भी जारी रखने का संकल्प लिया।
इस तरह जलवन्त टाऊनशिप में मनाया गया गणगौर उत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक सशक्त माध्यम भी साबित हुआ।
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