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टिकमनगर के बाल भगतसिंह उद्यान में श्रद्धा का उत्सव: राजस्थानी महिलाओं ने दशा माता की पूजा कर परिवार की सुख समृद्धि की कामना की

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*टिकमनगर के बाल भगतसिंह उद्यान में श्रद्धा का उत्सव: राजस्थानी महिलाओं ने दशा माता की पूजा कर परिवार की सुख समृद्धि की कामना की*

कांतिलाल मांडोत

सूरत 13 मार्च 2026

टिकमनगर स्थित बाल भगतसिंह उद्यान में राजस्थानी समाज की महिलाओं ने पारंपरिक उत्साह और श्रद्धा के साथ दशा माता की पूजा अर्चना की। भोर होते ही महिलाएं सजधज कर पारंपरिक वेशभूषा में उद्यान पहुंचीं और पीपल वृक्ष के समीप एकत्र होकर विधि विधान से दशा माता का पूजन किया। पूजा के दौरान महिलाओं ने विभिन्न पारंपरिक व्यंजन तैयार कर माता को भोग लगाया और परिवार की खुशहाली तथा समृद्धि की कामना की। इस अवसर पर महिलाओं ने दशा माता की कथा भी सुनी और धार्मिक वातावरण में भक्ति भाव के साथ पर्व मनाया।
गौतम कुमार रांका जो उधोगपति है उन्होंने बताया कि राजस्थानी समाज में दशा माता का पर्व विशेष महत्व रखता है।

चैत्र मास की दशमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा पूर्वक व्रत और पूजा करने से घर में सुख समृद्धि और धन धान्य की वृद्धि होती है। महिलाओं का विश्वास है कि दशा माता की कृपा से परिवार पर आने वाले संकट दूर होते हैं और जीवन में सकारात्मकता आती है। इसी आस्था के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में महिलाएं इस पर्व को पूरे उत्साह और परंपरा के साथ मनाती हैं

जब राजा नल ने रानी के गले में डोरा देखा तो उन्होंने इसके बारे में पूछा। रानी ने पूरी बात बताई लेकिन राजा को यह बात पसंद नहीं आई और उन्होंने डोरा तोड़कर फेंक दिया। इसके बाद राजा को कई दिनों तक लगातार एक सपना आने लगा जिसमें एक स्त्री कहती कि वह जा रही है और दूसरी कहती कि वह राजा के घर आ रही है। जब राजा ने दोनों से उनके नाम पूछे तो जाने वाली स्त्री ने अपना नाम लक्ष्मी बताया और आने वाली ने अपना नाम दरिद्रता बताया।

लक्ष्मी के जाने के बाद राजा नल और रानी दमयंती का वैभव समाप्त हो गया और उन्हें अपना राजपाट छोड़कर जंगल में भटकना पड़ा। अनेक कठिनाइयों और दुखों का सामना करते हुए वे जीवन बिताने लगे। अंततः रानी ने पुनः श्रद्धा के साथ माता की कथा सुनी और डोरा धारण किया। इसके बाद उनके जीवन में परिवर्तन आने लगा और धीरे धीरे उनका खोया हुआ वैभव लौट आया। कथा के अनुसार माता की कृपा से राजा को अपना राज्य और परिवार सब कुछ वापस मिल गया।

दशा माता की इस कथा को सुनने के बाद महिलाओं ने श्रद्धा के साथ पूजा संपन्न की और माता से अपने परिवार की रक्षा तथा समृद्धि की प्रार्थना की। आयोजन के दौरान पूरे उद्यान में धार्मिक वातावरण बना रहा और महिलाओं में उत्साह और आस्था स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
भगवती व्यास माता के उपासक है।वे हर वर्ष दशा माता और शीतला माता के व्रतधारी महिलाओ की मदद करना,जैसे नारियल फोड़ना और सामग्री आदि वस्तुओं को लाने में मदद कर रहे है।जिस कारण जैन समाज के पदाधिकारियों ने उनके कार्य की सराहना की गई।

राजस्थानी समाज की महिलाओं ने बताया कि यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आने वाली पीढ़ियों को भी इस धार्मिक परंपरा से जोड़ा जा रहा है ताकि संस्कृति और आस्था का यह सूत्र हमेशा जीवित रहे।

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