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विपक्ष की राजनीति से ऊपर उठकर स्वास्थ्य बचाने का समय अनशन नहीं समाधान चाहिए वांगचुक को जीवन बचाकर लोकतांत्रिक संघर्ष का नया रास्ता चुनना चाहिए

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सोनम वांगचुक का लंबा अनशन अब जीवन पर भारी

*विपक्ष की राजनीति से ऊपर उठकर स्वास्थ्य बचाने का समय अनशन नहीं समाधान चाहिए वांगचुक को जीवन बचाकर लोकतांत्रिक संघर्ष का नया रास्ता चुनना चाहिए*

दिल्ली के जंतर मंतर पर शिक्षा व्यवस्था में सुधार और कथित परीक्षा अनियमितताओं के विरोध में सोनम वांगचुक का आमरण अनशन लगातार जारी है। अनशन के सत्रहवें दिन तक पहुंचते पहुंचते उनका स्वास्थ्य चिंताजनक स्थिति में बताया जा रहा है। खबरों के अनुसार उनका वजन लगभग साढ़े आठ किलोग्राम कम हो चुका है और लगातार कमजोरी बढ़ रही है। चिकित्सकीय दृष्टि से यह स्थिति किसी भी व्यक्ति के लिए गंभीर मानी जाती है। लंबे समय तक भोजन से दूर रहने का असर केवल शरीर के वजन पर ही नहीं पड़ता बल्कि हृदय गुर्दे मांसपेशियों और मस्तिष्क की कार्यक्षमता पर भी पड़ सकता है। ऐसे में सबसे बड़ी चिंता किसी राजनीतिक मांग से अधिक एक इंसान के जीवन की होनी चाहिए।
सोनम वांगचुक देश के जाने माने शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। शिक्षा पर्यावरण और लद्दाख जैसे संवेदनशील मुद्दों पर उन्होंने वर्षों तक काम किया है। ऐसे व्यक्ति की आवाज लोकतंत्र में महत्वपूर्ण मानी जाती है। किसी भी नागरिक को अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखने और सरकार से जवाब मांगने का अधिकार है। लेकिन जब विरोध का तरीका स्वयं के जीवन के लिए खतरा बनने लगे तब उस पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो जाता है।
अनशन भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा का एक पुराना और प्रभावी माध्यम रहा है। महात्मा गांधी से लेकर अनेक सामाजिक नेताओं ने इसका उपयोग नैतिक दबाव बनाने के लिए किया। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जब किसी अनशनकारी का स्वास्थ्य लगातार गिरने लगता है तब आंदोलन की दिशा बदलना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है। किसी भी आंदोलन का उद्देश्य जीवन की रक्षा करते हुए समाज और व्यवस्था में परिवर्तन लाना होता है न कि स्वयं को ऐसी स्थिति में पहुंचा देना जहां जीवन ही संकट में पड़ जाए।
वर्तमान समय में सोनम वांगचुक के समर्थन में कई विपक्षी नेताओं और फिल्मी हस्तियों ने बयान दिए हैं। उनसे अनशन समाप्त करने की अपील भी की गई है। दूसरी ओर सरकार पर संवेदनहीन होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। यह स्वाभाविक है कि लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष के बीच आरोप प्रत्यारोप चलते रहते हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में यह भी दिखाई देता है कि राजनीतिक दल अपने अपने दृष्टिकोण से इस मुद्दे को प्रस्तुत कर रहे हैं। सत्ता पक्ष अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहा है जबकि विपक्ष सरकार को घेरने का अवसर तलाश रहा है।
यही वह बिंदु है जहां सबसे अधिक सावधानी की आवश्यकता है। किसी भी राजनीतिक दल का प्राथमिक उद्देश्य राजनीतिक लाभ प्राप्त करना होता है। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि हर राजनीतिक बयान केवल अनशनकारी के स्वास्थ्य की चिंता से प्रेरित है। विपक्ष सरकार पर हमला कर रहा है और सरकार अपने स्तर पर जवाब दे रही है। लेकिन इस राजनीतिक संघर्ष के बीच सबसे बड़ा नुकसान यदि किसी का हो सकता है तो वह स्वयं सोनम वांगचुक का स्वास्थ्य है।
वास्तविकता यह है कि यदि उनकी तबीयत और अधिक बिगड़ती है तो सबसे बड़ी कीमत उन्हें और उनके परिवार को चुकानी पड़ेगी। राजनीतिक दल अपने अपने एजेंडे के साथ आगे बढ़ जाएंगे लेकिन एक सामाजिक कार्यकर्ता का स्वास्थ्य और जीवन वापस नहीं लौटाया जा सकता। इसलिए यह समय भावनात्मक निर्णयों से अधिक व्यावहारिक सोच का है।
लंबे समय तक भूखे रहने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता तेजी से कम होती है। मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। रक्तचाप और शुगर का संतुलन बिगड़ सकता है। हृदय की धड़कन पर भी असर पड़ सकता है। यदि समय रहते चिकित्सा और पोषण नहीं मिले तो स्थिति गंभीर रूप ले सकती है। इसलिए डॉक्टर भी आमतौर पर लंबे आमरण अनशन को स्वास्थ्य के लिए अत्यंत जोखिमपूर्ण मानते हैं।
सोनम वांगचुक यदि अपनी मांगों को लेकर संघर्ष जारी रखना चाहते हैं तो उसके अनेक लोकतांत्रिक विकल्प उपलब्ध हैं। जनसभाएं की जा सकती हैं। देशव्यापी जनजागरण अभियान चलाया जा सकता है। अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। विशेषज्ञों के साथ संवाद स्थापित किया जा सकता है। संसद सदस्यों और विभिन्न सामाजिक संगठनों का समर्थन जुटाया जा सकता है। मीडिया और सामाजिक मंचों के माध्यम से भी व्यापक जनमत तैयार किया जा सकता है। इन सभी तरीकों से आंदोलन जीवित रहेगा और नेतृत्व भी सुरक्षित रहेगा।
इस पूरे मामले में यदि कॉकरोच जनता पार्टी और आंदोलन से जुड़े अन्य लोग वास्तव में वांगचुक के शुभचिंतक हैं तो उन्हें भी हस्तक्षेप करना चाहिए। किसी भी आंदोलन का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति का जीवन सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि आंदोलन का चेहरा ही गंभीर बीमारी का शिकार हो जाए तो आंदोलन की दिशा भी प्रभावित होती है। इसलिए पार्टी और सहयोगियों को उन्हें सम्मानपूर्वक अनशन समाप्त करने के लिए तैयार करना चाहिए और संघर्ष की नई रणनीति बनानी चाहिए।
सरकार की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद हमेशा टकराव से बेहतर विकल्प होता है। यदि किसी मुद्दे पर व्यापक असंतोष दिखाई दे रहा है तो सरकार को बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने का प्रयास करना चाहिए। इससे तनाव कम होगा और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
आज सबसे बड़ी आवश्यकता राजनीति से ऊपर उठकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की है। किसी भी विचारधारा से मतभेद हो सकते हैं लेकिन किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवन पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। सोनम वांगचुक का संघर्ष अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकता है लेकिन उनका जीवन उससे कहीं अधिक मूल्यवान है।
इसलिए समय की मांग यही है कि सोनम वांगचुक अपना आमरण अनशन समाप्त करें और लोकतांत्रिक संघर्ष का कोई दूसरा प्रभावी मार्ग चुनें। इससे उनकी बात भी मजबूत होगी और उनका स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहेगा। आंदोलन तभी सफल माना जाएगा जब उसका नेतृत्व स्वस्थ रहकर समाज के लिए आगे भी काम करता रहे। जीवन रहेगा तभी संघर्ष भी जारी रहेगा और बदलाव की संभावना भी बनी रहेगी।

      *कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*

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