सद्गुरु का आलोक : अज्ञान से आत्मबोध तक जीवन को प्रकाशित करने वाली दिव्य चेतना*
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गुरु पूर्णिमा पर विशेष
*सद्गुरु का आलोक : अज्ञान से आत्मबोध तक जीवन को प्रकाशित करने वाली दिव्य चेतना*
भारतीय संस्कृति में गुरु को केवल शिक्षक नहीं माना गया, बल्कि जीवन का पथप्रदर्शक, आत्मा का जागरणकर्ता और सत्य का साक्षात् प्रकाश कहा गया है। संसार की जटिलताओं, मोह-माया और अज्ञान के अंधकार में भटकते हुए मनुष्य के लिए सद्गुरु वह दिव्य शक्ति हैं, जो ज्ञान की ज्योति जलाकर उसे सत्य, विवेक और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाते हैं। भौतिक विज्ञान संसार के अनेक रहस्यों को समझा सकता है, परंतु जीवन, चेतना, आत्मा और मोक्ष के रहस्य केवल सद्गुरु के अनुभव, कृपा और सत्संग से ही उद्घाटित होते हैं। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में चक्रवर्ती सम्राट भी सद्गुरु के चरणों में नतमस्तक होकर स्वयं को धन्य मानते रहे हैं।
सद्गुरु वही हैं जिन्होंने स्वयं अपने जीवन को ऐहिक इच्छाओं से मुक्त कर लिया हो और जो निरंतर अपने तथा समस्त प्राणियों के कल्याण में रत रहते हों। जो स्वयं मोह, माया और पाप के समुद्र से पार हो चुके हैं, वही दूसरों को पार उतरने का मार्ग दिखा सकते हैं। जो स्वयं सांसारिक आसक्तियों में उलझा है, वह किसी को मुक्ति का पथ नहीं दिखा सकता। इसीलिए कहा गया है कि सद्गुरु का सान्निध्य मनुष्य को पाशविक प्रवृत्तियों से मुक्त कर उसके भीतर मानवीय और आध्यात्मिक गुणों का विकास करता है। आज समाज में नैतिक पतन, हिंसा, स्वार्थ और मूल्यहीनता का जो वातावरण दिखाई देता है, उसका प्रमुख कारण सद्गुरुओं की संगति और सत्संग का अभाव भी माना गया है।
मनुष्य के जीवन की तुलना एक ऐसे यात्री से की गई है जो घने अंधकार में जंगल के बीच अपना मार्ग खोज रहा है। वह कभी चट्टानों से टकराता है, कभी गड्ढों में गिरता है, कभी भयभीत होता है और कभी भ्रमित होकर भटकता रहता है। ऐसे समय में यदि कोई सर्चलाइट लेकर उसके सामने आ जाए और कहे कि इस प्रकाश में चलो, मैं तुम्हें सही मार्ग तक पहुँचा दूँ, तो उसका भय समाप्त हो जाता है। यही कार्य सद्गुरु करते हैं। वे ज्ञान और धर्म की उज्ज्वल सर्चलाइट लेकर साधक के जीवन में प्रवेश करते हैं और उसे अज्ञान के अंधकार से निकालकर सत्य और आत्मबोध के प्रकाश में ले जाते हैं।
‘गुरु’ शब्द की व्याख्या भी इसी सत्य को स्पष्ट करती है। ‘गु’ का अर्थ अंधकार और ‘रु’ का अर्थ उसका नाश करने वाला बताया गया है। जो अज्ञान को समाप्त कर ज्ञान का प्रकाश फैलाए, वही गुरु है। वह निराश व्यक्ति में आशा जगाता है, भ्रमित को दिशा देता है और मोह-माया के कुहरे से निकालकर सम्यक् दृष्टि का मार्ग दिखाता है। गुरु केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि अपने अनुभवों से जीवन की उन गांठों को खोलते हैं जिन्हें केवल पुस्तकीय ज्ञान से सुलझाना संभव नहीं होता।
गुरु की महत्ता को समझाने के लिए अनेक सुंदर उपमाएँ दी गई हैं। जैसे बिजली घर में ऊर्जा भरपूर होती है, पर यदि बल्ब ही खराब हो तो प्रकाश नहीं होगा। उसी प्रकार यदि मनुष्य के भीतर विनय और विवेक का अभाव है, तो ज्ञान का प्रकाश भी उसके जीवन को प्रकाशित नहीं कर सकता। भगवान महावीर के समक्ष राजा, राजकुमार, सेठ और सामान्य जन सभी आए। जिनके भीतर विनय और ग्रहणशीलता थी, उनके जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैल गया, जबकि जिनका अंतःकरण तैयार नहीं था, वे अंधकार में ही भटकते रहे।
सद्गुरु को जीवन का महान कलाकार भी कहा गया है। जिस प्रकार शिल्पकार अनगढ़ पत्थर को तराशकर भव्य प्रतिमा बना देता है, कुम्हार मिट्टी को सुंदर घड़े का रूप देता है और माली छोटे से बीज को फूलों और फलों से लदे वृक्ष में बदल देता है, उसी प्रकार सद्गुरु असंस्कारी मनुष्य को संस्कारित व्यक्तित्व प्रदान करते हैं। वे केवल ज्ञान नहीं देते, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी दिव्यता को जागृत करते हैं। अनंत काल से सोई हुई आत्मा को जगाने का कार्य सद्गुरु ही करते हैं।
गुरु की भूमिका एक अनुभवी चिकित्सक के समान भी है। शरीर के रोगों का उपचार चिकित्सक करता है, पर मन, आत्मा और संस्कारों के रोगों का निदान सद्गुरु ही कर सकते हैं। शास्त्रों में वर्णित शेषनाग और अश्विनीकुमार की कथा इसी तथ्य को स्पष्ट करती है कि अनुभवहीन ज्ञान कई बार पर्याप्त नहीं होता। जब अनुभवी गुरु का मार्गदर्शन मिलता है, तभी सही समाधान प्राप्त होता है। जीवन में भी अनेक ऐसी समस्याएँ आती हैं जिनका उत्तर केवल पुस्तकों में नहीं मिलता, बल्कि गुरु के अनुभव और कृपा से मिलता है।
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान भगवान से भी पहले माना गया है। संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा इसी सत्य को प्रकट करता है कि यदि गुरु और गोविंद दोनों सामने खड़े हों तो पहले गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए, क्योंकि भगवान तक पहुँचने का मार्ग भी गुरु ही दिखाते हैं। इसी भावना को संस्कृत वचन में व्यक्त किया गया है कि ज्ञान का मूल गुरु हैं, पूजा का आधार गुरु के चरण हैं और मोक्ष का मूल गुरु की कृपा है। जैन, वैदिक और सिख—तीनों परंपराओं में गुरु की महिमा सर्वोच्च मानी गई है। गुरु ग्रंथ साहिब में भी गुरु को भगवान का स्वरूप बताया गया है।
गुरु केवल ज्ञानदाता नहीं, बल्कि दाता भी हैं। वे अपने भीतर संचित आध्यात्मिक अनुभव, ओज, तेज और विवेक को शिष्य के जीवन में प्रवाहित करते हैं। जैसे एक दीपक हजारों दीपकों को प्रकाशित कर देता है और स्वयं का प्रकाश कम नहीं होता, वैसे ही गुरु अपने ज्ञान को बाँटते हुए भी निरंतर प्रकाशित रहते हैं। वे शिष्य के व्यक्तित्व को नया आकार देते हैं और उसे जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने योग्य बनाते हैं।
गुरु को दर्पण और गुरु को चक्षु भी कहा गया है। दर्पण मनुष्य को उसका बाहरी स्वरूप दिखाता है, जबकि गुरु उसके भीतर के वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराते हैं। वे शिष्य को आत्मकल्याण का मार्ग बताते हैं, जीवन जीने की श्रेष्ठ शैली सिखाते हैं और उसे ऐसा विवेक प्रदान करते हैं जिससे वह विपरीत परिस्थितियों में भी संतुलित रह सके। साधना के मार्ग में जब कोई बाधा आती है, तब गुरु का एक अनुभवपूर्ण संकेत जीवन की दिशा बदल देता है। जैसे अनुभवी इंजीनियर केवल एक उचित स्थान पर हथौड़ी की चोट करके बंद मशीन को चालू कर देता है, वैसे ही सद्गुरु शिष्य के जीवन की उलझनों को सहजता से सुलझा देते हैं।
गुरु पूर्णिमा का पर्व इसी गुरु-परंपरा के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व है। यह केवल औपचारिक पूजा का अवसर नहीं, बल्कि गुरु की आज्ञा, अनुशासन और बताए हुए मार्ग पर चलने का संकल्प है। गुरु पूजा का वास्तविक अर्थ है विनम्रता, श्रद्धा और जीवन में उनके उपदेशों का पालन। जैन साहित्य में भी गुरु के प्रति विनय, भक्ति और सम्मान को ज्ञान, यश, समृद्धि तथा अंततः मोक्ष का आधार बताया गया है।
वास्तव में सद्गुरु मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं। वे अज्ञान को ज्ञान में, निराशा को आशा में, असंस्कार को संस्कार में और भटकाव को लक्ष्य में परिवर्तित कर देते हैं। उनका सान्निध्य मनुष्य को केवल सफल नहीं, बल्कि सार्थक बनाता है। इसलिए भारतीय मनीषा ने गुरु की महिमा का सार इन शब्दों में व्यक्त किया है—”गुरु-माँझी से ही मिले भवसागर का कूल, गुरु-वाणी है मंत्र-सम, कृपा मोक्ष का मूल।” यही संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था।
*कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*
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