|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
स्वस्थ भोजन हर नागरिक का अधिकार
*महंगा पौष्टिक आहार और मिलावटी बाजार से बढ़ती चुनौती*
भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं बल्कि स्वस्थ जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जिस समाज के लोगों को संतुलित और पौष्टिक भोजन नहीं मिलता वहां बीमारियां बढ़ती हैं, बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है और देश की कार्यक्षमता भी कमजोर पड़ती है। संयुक्त राष्ट्र की स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड (एसओएफआई) 2026 रिपोर्ट ने एक गंभीर चिंता सामने रखी है कि भारत में लगभग 52 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनकी पहुंच आज भी नियमित रूप से पौष्टिक और संतुलित आहार तक नहीं है। यह स्थिति तब है जब देश ने पिछले वर्षों में कुपोषण कम करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। इसका अर्थ यह है कि समस्या केवल भोजन की उपलब्धता की नहीं बल्कि गुणवत्तापूर्ण भोजन की भी है।
आज बाजार में फल, सब्जियां, दूध, दालें, अंडे, मेवे और अन्य प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। सीमित आय वाले परिवारों के लिए रोजाना संतुलित भोजन जुटाना आसान नहीं रह गया है। कई परिवार पेट भरने के लिए सस्ता भोजन तो खरीद लेते हैं लेकिन उसमें आवश्यक पोषक तत्वों की कमी होती है। इसका असर सबसे पहले बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों पर दिखाई देता है। शरीर को पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन, खनिज और अन्य पोषक तत्व नहीं मिलते तो प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और कई बीमारियां घर कर लेती हैं।
यह सच है कि पहले की तुलना में देश में कुपोषण की स्थिति में काफी सुधार आया है। सरकारी योजनाओं, आंगनबाड़ी सेवाओं, मध्याह्न भोजन योजना और जनजागरूकता के कारण लाखों परिवारों तक बेहतर पोषण पहुंचा है। लेकिन चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई है। आज भी अनेक लोग आर्थिक मजबूरी के कारण पौष्टिक भोजन से दूर हैं। यही कारण है कि एक ओर कुपोषण की समस्या बनी हुई है तो दूसरी ओर मोटापा और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां भी तेजी से बढ़ रही हैं। इसका कारण यह है कि लोग सस्ता और तला-भुना या अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन अधिक खाने लगे हैं, जिसमें स्वाद तो होता है लेकिन पोषण कम होता है।
आज का सबसे बड़ा संकट केवल महंगाई नहीं बल्कि भोजन की गुणवत्ता भी है। बाजार में मिलावटी खाद्य पदार्थों की भरमार चिंता बढ़ाने वाली है। दूध में मिलावट, मसालों में नकली रंग, मिठाइयों में घटिया सामग्री, नकली घी, मिलावटी तेल, रसायनों से पकाए गए फल और सब्जियां तथा खराब गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थ लोगों के स्वास्थ्य के साथ खुला खिलवाड़ कर रहे हैं। उपभोक्ता पैसे खर्च करके भी शुद्ध भोजन नहीं खरीद पा रहा है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं कही जा सकती।
बाहर का भोजन भी लोगों की सेहत पर भारी पड़ रहा है। भागदौड़ भरी जिंदगी में फास्ट फूड और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का चलन तेजी से बढ़ा है। इन खाद्य पदार्थों में अधिक मात्रा में नमक, चीनी और वसा होती है। स्वाद के लिए लोग इन्हें पसंद तो करते हैं लेकिन धीरे-धीरे यही भोजन मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म देता है। विशेष रूप से युवाओं और बच्चों में यह प्रवृत्ति चिंता का विषय बनती जा रही है।
दरअसल, स्वस्थ रहने के लिए महंगे भोजन की नहीं बल्कि संतुलित भोजन की आवश्यकता होती है। दालें, मौसमी सब्जियां, मोटे अनाज, दूध, दही, अंकुरित अनाज और स्थानीय फल अपेक्षाकृत कम खर्च में भी अच्छा पोषण दे सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि लोग खानपान के प्रति जागरूक हों और जितनी क्षमता हो, उसके अनुसार पौष्टिक भोजन को प्राथमिकता दें। कम मात्रा में सही भोजन लेना, अधिक मात्रा में अस्वस्थ भोजन खाने से कहीं बेहतर है।
सरकार की जिम्मेदारी है कि गरीब और मध्यम वर्ग तक पौष्टिक भोजन सुलभ कीमत पर पहुंचे। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को और मजबूत बनाने, पोषण योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन करने, खाद्य पदार्थों की कीमतों पर नियंत्रण रखने और किसानों को उचित समर्थन देने की आवश्यकता है। यदि उत्पादन बढ़ेगा और आपूर्ति व्यवस्था मजबूत होगी तो कीमतों पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा।
लेकिन केवल सरकार से अपेक्षा करना पर्याप्त नहीं है। समाज, उद्योग और बाजार की भी बड़ी जिम्मेदारी है। खाद्य व्यापार से जुड़े लोगों को यह समझना होगा कि भोजन केवल व्यापार की वस्तु नहीं बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है। कुछ अतिरिक्त मुनाफे के लिए मिलावट करना, नकली सामग्री बेचना या घटिया गुणवत्ता का सामान बाजार में उतारना केवल कानून का उल्लंघन नहीं बल्कि मानवता के साथ विश्वासघात है। जिस भोजन से लोगों का शरीर बनता है, उसी में जहर घोलना सबसे बड़ा अपराध माना जाना चाहिए।
बाजार को आत्मचिंतन करना होगा। व्यापार का उद्देश्य लाभ कमाना अवश्य है, लेकिन लाभ का अर्थ लोगों के स्वास्थ्य से समझौता करना नहीं हो सकता। खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियां, डेयरी उद्योग, मिठाई विक्रेता, होटल, रेस्तरां और किराना व्यापारी सभी को गुणवत्ता और शुद्धता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। यदि उपभोक्ता का विश्वास टूट गया तो बाजार की विश्वसनीयता भी समाप्त हो जाएगी। इसलिए ईमानदारी से शुद्ध और सुरक्षित खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना प्रत्येक व्यापारी का नैतिक दायित्व है।
उपभोक्ताओं को भी सजग रहना होगा। बिना जांचे-परखे सस्ते उत्पाद खरीदने के बजाय गुणवत्ता को महत्व देना चाहिए। घर का ताजा भोजन, मौसमी फल-सब्जियां और संतुलित आहार अपनाने की आदत स्वास्थ्य की सबसे बड़ी सुरक्षा है। बच्चों में भी बचपन से पौष्टिक भोजन की आदत विकसित करनी होगी ताकि आने वाली पीढ़ी स्वस्थ और सक्षम बन सके।
भारत ने कुपोषण कम करने की दिशा में निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। यह सकारात्मक संकेत है कि पहले जैसी भयावह स्थिति अब नहीं रही। लेकिन जब तक देश का प्रत्येक नागरिक पौष्टिक, सुरक्षित और शुद्ध भोजन प्राप्त करने में सक्षम नहीं होगा, तब तक विकास की यात्रा अधूरी रहेगी। स्वस्थ नागरिक ही मजबूत राष्ट्र की नींव होते हैं।
समय की मांग है कि सरकार, समाज, किसान, उद्योग और बाजार सभी मिलकर यह संकल्प लें कि किसी भी नागरिक की थाली केवल भरी हुई ही नहीं बल्कि पोषण से भरपूर भी हो। बाजार को भी समझना होगा कि कुछ रुपये का अतिरिक्त मुनाफा किसी की जिंदगी से बड़ा नहीं हो सकता। शुद्ध भोजन उपलब्ध कराना केवल व्यवसाय नहीं बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व है। यदि व्यापार ईमानदारी, गुणवत्ता और मानवता के मूल्यों के साथ किया जाएगा तो देश स्वस्थ होगा, समाज सशक्त बनेगा और आने वाली पीढ़ियां एक सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ सकेंगी। आखिर स्वस्थ भोजन पर हर व्यक्ति का समान अधिकार है और इस अधिकार की रक्षा करना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।
*कांतिलाल मांडोत*
कांतिलाल मांडोत
L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार-स्तम्भकार
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space
आणखी कथा





