धर्मसभा में संतों ने कहा- तप और त्याग से होती है आत्मशुद्धि, सेवा से सार्थक बनता है मानव जीवन*
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पर्युषण में आत्मचिंतन और संयम का संदेश, दान को बताया जीवन की सच्ची सजावट
*धर्मसभा में संतों ने कहा- तप और त्याग से होती है आत्मशुद्धि, सेवा से सार्थक बनता है मानव जीवन*
कांतिलाल मांडोत
गोगुंदा 9 सितम्बर 26
पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन गोगुंदा का श्वेतांबर जैन समाज धार्मिक साधना और आत्मचिंतन में लीन रहा। स्थानक में आयोजित धर्मसभा में श्रावक-श्राविकाओं ने उत्साह के साथ भाग लिया। दिनभर जप, तप, स्वाध्याय, ध्यान, प्रतिक्रमण और उपवास जैसी धार्मिक गतिविधियों के माध्यम से समाजजनों ने आत्मशुद्धि और संयम की साधना की। धर्मसभा में संतों ने पर्युषण पर्व की आध्यात्मिक उपयोगिता बताते हुए जीवन में त्याग, तप, दान और सेवा को अपनाने का संदेश दिया।
धर्मसभा में जिनेंद्र मुनि मसा ने कहा कि जीवन केवल प्राप्त करने का नाम नहीं है, बल्कि दूसरों के लिए कुछ त्याग करने और देने की भावना भी इसमें आवश्यक है। उन्होंने 18 पाप और 9 पुण्य के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को अपने आचरण पर निरंतर विचार करना चाहिए। आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर मौजूद कमियों को पहचान सकता है और उन्हें दूर करने का प्रयास कर सकता है। उन्होंने कहा कि दान, शील और तप ऐसे साधन हैं, जो मनुष्य के जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं।
धर्म और ध्यान से समय को बनाएं सार्थक
मुनि ने कहा कि मानव जीवन अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। इसे केवल सांसारिक गतिविधियों में व्यतीत करने के बजाय धर्म, ध्यान और आत्मसाधना में लगाना चाहिए। पर्युषण का समय व्यक्ति को स्वयं के भीतर झांकने और जीवन की दिशा पर विचार करने का अवसर देता है। उन्होंने समाजजनों से आग्रह किया कि पर्व के दौरान धार्मिक गतिविधियों में अधिक से अधिक समय देकर अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करें।
प्रवीण मुनि मसा ने आगम साहित्य के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन धर्म में आगम ज्ञान का प्रमुख आधार हैं। पर्युषण पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और आत्मा की ओर लौटने का अवसर है। उन्होंने कहा कि इन दिनों व्यक्ति को बाहरी गतिविधियों से ध्यान हटाकर अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों का निरीक्षण करना चाहिए। आत्मचिंतन से ही आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
साध्वी राजश्रीजी ने अंतगढ़ सूत्र का वाचन करते हुए दान की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दान केवल धन देने तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरत के समय किसी के काम आना भी दान और सेवा की भावना का हिस्सा है। मनुष्य अपने घर और आसपास की बाहरी सजावट पर काफी ध्यान देता है, लेकिन जीवन की वास्तविक सुंदरता उसके अच्छे कर्मों और सेवा भाव से बढ़ती है।
उन्होंने कहा कि भूखे व्यक्ति को भोजन उपलब्ध कराना, प्यासे को पानी पिलाना और किसी दुखी व्यक्ति की पीड़ा को समझकर उसके आंसू पोंछने का प्रयास करना मानवता का वास्तविक स्वरूप है। सेवा और परोपकार की भावना मनुष्य के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाती है। पर्युषण पर्व इसी भावना को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है।
चातुर्मास कार्यक्रम संयोजक सुंदरलाल मेहता ने समाजजनों से पर्युषण पर्व की धार्मिक मर्यादाओं का पालन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि श्रावक-श्राविकाएं समय पर स्थानक पहुंचकर धर्मसभा में सहभागी बनें। व्याख्यान और धार्मिक कार्यक्रमों के समय प्रतिष्ठान एवं व्यवसाय बंद रखकर धर्मसाधना के लिए समय निकालने का प्रयास किया जाए। उन्होंने अधिक से अधिक जप, तप, स्वाध्याय और अन्य धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने की अपील की।
धर्मसभा के समापन पर जिनेंद्र मुनि मसा ने मंगल पाठ कराया। इसके साथ ही उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने धार्मिक वातावरण में साधना का संकल्प लिया। स्थानक में पूरे कार्यक्रम के दौरान श्रद्धा और आध्यात्मिकता का वातावरण बना रहा।
जैन समाज के अनुसार पर्युषण महापर्व मनुष्य को अपने कर्मों का मूल्यांकन करने, गलतियों पर विचार करने, संयम अपनाने और आत्मशुद्धि की दिशा में बढ़ने की प्रेरणा देता है। तप, त्याग, दान, सेवा और आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को अधिक अनुशासित और सार्थक बनाने का प्रयास करता है। यही पर्युषण पर्व की मूल भावना है।
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