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सुशासन की निर्णायक जीत और महागठबंधन की करारी हार, बिहार के जनादेश का संदेश*

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*सुशासन की निर्णायक जीत और महागठबंधन की करारी हार, बिहार के जनादेश का संदेश*
बिहार की राजनीति लंबे समय से दो विरोधी धुरों के बीच झूलती रही है।एक ओर सुशासन, विकास, स्थिरता और कानून-व्यवस्था की राजनीति,और दूसरी ओर अव्यवस्था, कट्टा संस्कृति, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और पुराने ‘जंगलराज’ की यादें।हालिया चुनावों ने इन दोनों धाराओं के बीच चल रही जंग पर निर्णायक मुहर लगा दी है।जनता ने जिस स्पष्टता और मजबूती से अपना संदेश दिया है, उसने राजनीति के कई भ्रम तोड़ दिए और यह साफ कर दिया कि वह सिर्फ नारों से नहीं, बल्कि व्यवहारिक शासन, स्थिर नेतृत्व और विकास की ठोस दिशा को प्राथमिकता देती है।महागठबंधन ने चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कई तीखे और विवादित आरोप लगाए। वोटचोर,गद्दी चोरएसआईआर (SIR) मुद्दे पर झूठे और मनगढ़ंत आरोप से कांग्रेस की स्थिति बिगड़ी है।लेकिन जनता ने इन आरोपों को खारिज करते हुए यह जाहिर कर दिया कि नकारात्मक राजनीति अब असरदार हथियार नहीं रही।
मतदाता अब काम कानून व्यवस्था, जनसेवा और विश्वसनीयता को प्राथमिकता देता है।इस चुनावी नतीजे ने यह स्थापित कर दिया कि बिहार की राजनीति नए युग में प्रवेश कर चुकी है, जहां भावनाओं के बजाय सुशासन की ठोस जमीन पर नेतृत्व का मूल्यांकन हो रहा है।बिहार का बदलता राजनीतिक मूड: जनता भावनाओं से आगे बढ़ चुकी है।एक समय था जब बिहार की राजनीति का ढांचा जातिगत समीकरणों, जनभावनाओं और राजनीतिक नाटकीयता पर आधारित माना जाता था, लेकिन इस चुनाव ने इस सोच को झकझोर दिया है।जाहिर है, बिहार की जनता अब सत्ता परिवर्तन सिर्फ नाराजगी या भावनात्मक उभार के आधार पर नहीं करती, बल्कि दीर्घकालिक स्थिरता और प्रगति की दिशा को तरजीह देती है।महागठबंधन ने पूरी ताकत से नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की गई।मोदी सरकार पर अपमानजनक टिप्पणियाँ से माहौल बिगड़ गया।फर्जी आरोप,कटु बातें
और जातिगत ध्रुवीकरण की कोशिशें हुई।परन्तु बहुत बड़ा आघात मोदी को उस समय लगा जब मोदी की माँ को विपक्ष ने गंदी गालिया दी गई।कहा गए एनडीए का विरोध करने वाले नेताओं का कोई ढोर नही है।कांग्रेस के खाते में चार सीटे आना इस बात का संकेत है कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीतियां पार्टी के खिलाफ है।राहुल ने ऐड़ी चोटी का जोर लगाया।लेकिन अंततः करारी हार नसीब हुई है।तेजस्वी ने 19 नवम्बर को शपथ लेने की बात भी कर दी थी।लेकिन सारे अरमान धराशायी हुए।अब एनडीए पर आरोपो की धज्जियां उड़ाई जाएगी।
लेकिन बिहार के मतदाताओं ने शांत मन से यह मूल्यांकन किया कि कौन-सा नेतृत्व राज्य को स्थिरता, सुरक्षा और विकास की राह पर ले जा सकता है।जनता ने यह भी समझा कि सिर्फ विरोध के नाम पर राजनीति टिकाऊ नहीं हो सकती, जब तक उसके पास दृष्टि और साफ नीयत न हो।
        *सुशासन बनाम अव्यवस्था*
बिहार ने तुलना करके निर्णय दिया है।बिहार के राजनीतिक विमर्श में दो शब्द हमेशा प्रमुख रहे हैं जंगलराजऔर सुशासन।
बिहार चुनाव में भी यही दो मॉडल आमने-सामने थे।
एक सुशासन का मॉडलऔर दूसरा कानून-व्यवस्था में सुधार।
बिहार में संगठित प्रशासन भ्रष्टाचार विरोधी कदमविकास परियोजनाओं का विस्तार और शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में निवेश जैसे मुद्दे चर्चा में रहे है।सामाजिक सुरक्षा योजनाएँऔरअपराध नियंत्रण और आधुनिक पुलिसिंग से जनता अभिभूत होती दिखाई दी।अव्यवस्था/कट्टा संस्कृति का मॉडल विपरीत परिणाम दे गया।जिन राज्यों में अतीत में ऊंची अपराध दर, रंगदारी, अपहरण उद्योग, गुंडागर्दी और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधी प्रमुख धारा में रहे, उसकी यादें कभी मिटती नहीं।बिहार की जनता ने इस चुनाव में इन दोनों मॉडलों की तुलना करते हुए स्पष्ट और निर्णायक फैसला सुनाया है।यह स्पष्ट है कि वह किसी भी रूप में अतीत की अराजकता को वापस नहीं देखना चाहती। कट्टा संस्कृति बनाम क़ानून-व्यवस्था यह केवल चुनावी मुद्दा नहीं, सामाजिक प्रश्न था।बिहार में कट्टा संस्कृति और अपराध की राजनीति सिर्फ राजनीतिक मुद्दे नहीं थे। वे समाज की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े प्रश्न थे।
महागठबंधन इस धारणा को मिटाने में असफल रहा कि उनके कई जनाधार वाले क्षेत्रों में अतीत में अपराध और राजनीतिक संरक्षण का गठजोड़ दिखाई दिया था।वहीं दूसरी ओर, स्थिर नेतृत्व ने लगातार यह संदेश दिया कि कानून-व्यवस्था के साथ कोई समझौता नहीं होगा।मतदाता ने फिर साबित कर दिया किसुरक्षा विकास की पहली शर्त है।एसआईआर (SIR) विवाद से आरोपों की राजनीति का उल्टा असर देखने को मिला।चुनावों में महागठबंधन ने SIR को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा करने का प्रयास किया और प्रधानमंत्री मोदी पर कई मनगढ़ंत आरोप लगाए।
लेकिन जनता ने इस वाद-विवाद के राजनीतिक मकसद को समझ लिया।जब आरोप तथ्यों के बजाय भावनाओं पर आधारित हों, तो वे अक्सर उल्टा असर डालते हैं।मतदाता किसी भी नेतृत्व को निराधार आरोपों में उलझता देखना पसंद नहीं करता है।उसके लिए मायने रखता है।क्या काम हुआ, क्या योजनाएँ जमीन पर उतरीं और किसकी नीयत साफ दिखती है“वोटचोर” और “गद्दी चोर” जैसे शब्दों का परिणाम राजनीतिक गरिमा पर चोट करते है।लिहाजा,
महागठबंधन ने चुनाव प्रचार की भाषा को जिस तरह व्यक्तिगत और कटु बना दिया, उससे एक बड़ा वर्ग असहज हुआ।राजनीति में गरिमा, संतुलन और संयम महत्वपूर्ण हैं।जब नेता अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो वह उनके चरित्र का परिचय भी देता है।आम मतदाता के मन में यह सवाल उठा किक्या ऐसे नेतृत्व पर शासन की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।नतीजा यह हुआ कि नकारात्मक अभियान अपना असर खो बैठा और जनमत सुशासन की ओर झुकता चला गया।विकास का एजेंडा क्यों जीता?क्योकि विकास अब राजनीति का विकल्प नहीं, बल्कि आधार बन चुका है।बिहार के मतदाताओं ने उन क्षेत्रों में हुए बदलावों को महसूस किया है।सड़कें बेहतर हुईं है।बिजली आपूर्ति स्थिर हुई।
शिक्षा स्कूलों की स्थिति में सुधार अस्पतालों का विस्तार, कृषि परियोजनाएँ ,महिलाओं की सुरक्षा की दिशा में कदमऔर रोजगार योजनाएँ और कौशल केंद्र युवाओं के लिए छात्रवृत्ति व सहायता कार्यक्रमआदि मुख्य बिंदु थे।महागठबंधन ने बहुमत का भ्रम फैलाया था लेकिन तेजस्वी को हार का सामना करना पड़ा।वही कांग्रेस के खाते में 5 सीटे मिली है। एनडीए खाते में 200 पार का आंकड़ा है।
महागठबंधन इन मोर्चों पर ठोस प्रस्तुति देने में असफल रहा।
भाषणों से विकास नहीं होता, और मतदाता अब केवल नारों से प्रभावित नहीं होते।छवि की राजनीति में कौन विश्वसनीय है?यह चुनाव छवि के आधार पर भी लड़ा गया था।
दो छवियाँ सामने थीं,जिसमेस्थिर, स्पष्ट, ईमानदार और काम-केंद्रित नेतृत्व था।
विवादों, आरोपों, आक्रामक नारों और अतीत की विरासत से घिरा नेतृत्व को करारी हार का सामना किया।जनता ने दूसरी छवि की कमजोरी को समझते हुए पहली छवि पर भरोसा जताया।विश्वसनीयता चुनाव जीतने का सबसे बड़ा हथियार है, और इस बार भी वही हुआ।महागठबंधन की हार की रणनीति और सोच की विफलता है।महागठबंधन की हार के कई कारण रहे है। नकारात्मक नैरेटिव पर अधिक निर्भरतारही थी।नेतृत्व विकास की ठोस तस्वीर पेश करने में विफल रहा।अतीत की छवि का बोझभी हार का कारण बना है।जंगलराज, अराजकता, जातीय ध्रुवीकरण की यादें अभी भी जनता के मन में ताजा हैं।बिखरी रणनीति और असंगत संदेश की वजह रही है।एक स्पष्ट, संगठित और प्रेरक दृष्टि प्रस्तुत नहीं कर सके।
          *ज़मीनी मुद्दों से दूरी*
महंगाई, रोजगार, शिक्षा और कृषि इन वास्तविक विषयों पर प्रभावी रोडमैप नहीं दिखाया गया। नेतृत्व के बयानों का उलटा असर देखने को मिला ।
कटाक्ष, अपमानजनक भाषा और बेबुनियाद आरोपों ने जनता को दूर कर दिया।बिहार का संदेश है कि राजनीति अब विकास की राह पर तय होगी।यह जनादेश केवल जीत-हार का आंकड़ा नहीं है।यह बिहार की जनता की परिपक्वता और दूरदर्शिता का प्रमाण है।नागरिक अब सुरक्षा,रोजगार बुनियादी ढांचे,स्थिर सरकार पारदर्शी प्रशासन को प्राथमिकता देता है।सुशासन की जीत केवल किसी दल या नेता की जीत नहीं, बल्कि जनता की वह आवाज़ है जो कहती है।हमें विकास चाहिए, अव्यवस्था नहीं।आगे की चुनौती है कि सुशासन को और मजबूत करना होगा।अब जब जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया है, तो आने वाले समय में जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
सुशासन को और मजबूत बनाना होगा।आगे की प्राथमिकताएँ स्पष्ट हैं किअपराध पर सख्त नियंत्रण, युवाओं के लिए रोजगार ढांचे का विस्तार औद्योगिक निवेश को आकर्षित करना और शिक्षा और स्वास्थ्य में गहन सुधार डिजिटल और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावादेना होगा।महिलाओं और कमजोर वर्गों के लिए सुरक्षा और सहायता कार्यक्रम सुचारू रूप से चलाना होगा।
*भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’*
यह जनादेश बताता है कि जनता उम्मीद करती है कि विकास की गति और तेज हो।सुशासन की जीत केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक विजय भी है कि यह चुनाव बिहार के राजनीतिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा।एक ओर आरोपों, कटाक्षों, अव्यवस्था और कट्टा संस्कृति को जनता ने निर्णायक रूप से खारिज कर दिया,और दूसरी ओर विकास, स्थिरता, कानून-व्यवस्था और ईमानदार नेतृत्व की राह को चुना।महागठबंधन की करारी हार यह बताती है कि मनगढ़ंत आरोप, नकारात्मक राजनीति और भ्रम फैलाने से चुनाव नहीं जीते जाते।बिहार की जनता ने यह साबित कर दिया कि सुशासन ही सबसे बड़ी राजनीति है।और यही कारण है कि इस बार जनता ने कटुता को नहीं,विकास, साफ छवि और कानून-व्यवस्था को चुना गया है।

*कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*

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