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तनावों का अंत : जीवन का वसंत
*आत्मशांति की खोज में भटकता आधुनिक मनुष्य*
आज का मनुष्य भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में इतना उलझ गया है कि वह अपने भीतर की शांति से दूर होता जा रहा है। आधुनिक जीवन में सुख के साधन पहले की अपेक्षा कहीं अधिक हैं, परन्तु इसके बावजूद मनुष्य के भीतर बेचैनी, तनाव और असंतोष बढ़ता ही जा रहा है। इसका मूल कारण यह है कि मनुष्य ने सुख का अर्थ केवल बाहरी सुविधाओं और इन्द्रियजन्य भोगों में ढूँढ़ना शुरू कर दिया है। भौतिक वस्तुएँ कुछ समय के लिए संतोष दे सकती हैं, परन्तु वे आत्मा को स्थायी शांति नहीं दे सकतीं। आत्मशांति का एक छोटा सा अनुभव भी वर्षों की तृष्णा को शांत कर सकता है। जो व्यक्ति अध्यात्म से जुड़ जाता है, वह जीवन के तनावों और कषायों से धीरे-धीरे मुक्त होने लगता है। वास्तव में कषाय और तनाव एक-दूसरे को उत्तेजित करते रहते हैं और इनके बीच मनुष्य पिसता रहता है। परिणामस्वरूप उसका जीवन अशांत और असंतुलित बन जाता है।
भौतिक जगत पदार्थों को महत्व देता है, जबकि अध्यात्म का क्षेत्र आत्मा को सर्वोपरि मानता है। भौतिकवादी व्यक्ति अपने जीवन को बाहरी विकास और सुविधाओं के विस्तार में लगा देता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति आत्मा की खोज में लगा रहता है, वह स्थायी शांति और आनंद को प्राप्त कर सकता है। यह सत्य है कि आत्मा की खोज के लिए मनुष्य को कहीं बाहर भटकने की आवश्यकता नहीं होती। यह खोज भीतर की यात्रा है, जहाँ व्यक्ति अपने अंतर्मन में उतरकर स्वयं को पहचानता है।
लेकिन जीवन की विडम्बना यह है कि मनुष्य ने आवश्यकताओं की पूर्ति को ही सुख समझ लिया है। वास्तविक सुख तो अंतर्मन की शांति में है। यदि दर्द शरीर के किसी हिस्से में हो और दवा किसी अन्य स्थान पर लगाई जाए, तो दर्द कैसे ठीक हो सकता है। उसी प्रकार यदि शांति भीतर है और हम उसे बाहर खोजते हैं, तो वह हमें कभी नहीं मिल सकती।
भ्रमित खोज का प्रतीक
मानव जीवन में अक्सर ऐसा होता है कि हम अपने दुखों और समस्याओं के समाधान गलत स्थान पर ढूँढ़ते रहते हैं। जैसे किसी व्यक्ति को भीतर के संकट का समाधान बाहरी वस्तुओं में खोजने की आदत पड़ जाती है। यही कारण है कि मनुष्य जीवन भर भाग-दौड़ करता रहता है, परन्तु संतोष और शांति उससे दूर ही रहते हैं। यह स्थिति उस व्यक्ति के समान है जो जिस स्थान पर वस्तु खोता है, उसे किसी दूसरे स्थान पर ढूँढ़ने लगता है।
आज मनुष्य भी अपनी शांति और आनंद की खोज बाहरी आकर्षणों में कर रहा है। धन, प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य को प्राप्त करने के बाद भी उसे भीतर से खालीपन का अनुभव होता है। इसका कारण यह है कि वह अपने वास्तविक स्रोत से दूर हो गया है। जब तक मनुष्य अपने अंतर्मन में उतरकर आत्मा के सच्चे स्वरूप को नहीं पहचानता, तब तक उसे सच्चा सुख नहीं मिल सकता।
समता और सहिष्णुता का महत्व
शांतिपूर्ण जीवन के लिए समता, सहिष्णुता और उदारता का होना अत्यंत आवश्यक है। आज समाज में छोटी-छोटी बातों पर क्रोध, विवाद और संघर्ष बढ़ते जा रहे हैं। व्यक्ति का मन इतना संवेदनशील और अस्थिर हो गया है कि वह तुरंत उत्तेजित हो जाता है। ऐसे समय में विवेक और संतुलन की आवश्यकता होती है। समत्व का भाव मनुष्य को परिस्थितियों के बीच संतुलित बनाए रखता है।
जो व्यक्ति समता का अभ्यास करता है, वह जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी शांत रहता है। उसके व्यवहार, वाणी और दृष्टि में मैत्री और सौहार्द की भावना रहती है। आज परिवारों में जो कलह और विवाद देखने को मिलते हैं, उनके मूल में समता और सहिष्णुता का अभाव ही होता है। जब मनुष्य अपने अहंकार और स्वार्थ को त्यागकर दूसरों के दृष्टिकोण को समझने लगता है, तब उसके जीवन में शांति का प्रवेश होता है।
आधुनिक समाज में करुणा, सहानुभूति और परोपकार जैसी मानवीय भावनाएँ धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। मनुष्य अपने स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा में इतना डूब गया है कि उसे दूसरों के दुख-दर्द का अनुभव ही नहीं होता। यदि समाज में करुणा और सहृदयता का स्रोत सूख जाए, तो मानवता का विकास रुक जाता है।
सहिष्णुता, परोपकार, दया और उदारता जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाते हैं। इन गुणों के बिना जीवन में शांति की स्थापना संभव नहीं है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने भीतर इन मूल्यों को पुनः जाग्रत करें और अपने व्यवहार में अपनाएँ।
निष्काम सेवा मनुष्य के जीवन को पवित्र और संतोषपूर्ण बनाती है। जो व्यक्ति दूसरों के हित के लिए कार्य करता है, वह भीतर से अत्यंत संतुष्ट और प्रसन्न रहता है। उसकी दृष्टि में दूसरों की भलाई ही उसका सच्चा धर्म बन जाती है। वह अपनी सेवा का प्रदर्शन नहीं करता और न ही किसी प्रकार के प्रतिफल की अपेक्षा रखता है।
ऐसा व्यक्ति संसार में प्रकाश की एक किरण के समान होता है, जो दूसरों के जीवन में आशा और प्रसन्नता का संचार करता है। उसका जीवन उस घड़े की तरह होता है जो स्वयं झुका रहता है, परन्तु प्यासे प्राणियों की प्यास बुझाता रहता है। निस्वार्थ सेवा मनुष्य के भीतर करुणा और शांति का विस्तार करती है।
आज के तनावपूर्ण जीवन में योग और ध्यान का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है। योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह मन और आत्मा को संतुलित करने की साधना भी है। योगाभ्यास से शरीर की ऊर्जा संतुलित होती है और मन के भीतर जमा हुए क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार जैसे विकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं।
ध्यान के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर उतरता है और आत्मा की शांति का अनुभव करता है। जब मन शांत होता है, तब जीवन की कठिन परिस्थितियाँ भी हमें विचलित नहीं कर पातीं। शांत मन ही स्वस्थ शरीर का आधार है और संतुलित जीवन की कुंजी भी।
वर्तमान युग को वैज्ञानिक प्रगति का युग कहा जाता है। विज्ञान ने मानव जीवन को अनेक सुविधाएँ प्रदान की हैं, परन्तु इसके साथ ही जीवन की गति भी अत्यधिक तेज हो गई है। मशीनों की आवाज़, यातायात का शोर और निरंतर प्रतिस्पर्धा का वातावरण मनुष्य के मानसिक संतुलन को प्रभावित करता है।
विज्ञान ने भौतिक प्रगति तो दी है, परन्तु मानसिक शांति के लिए मनुष्य को अभी भी अपने भीतर की यात्रा करनी पड़ती है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि शांति और आनंद का वास्तविक स्रोत उसके अपने अंतर्मन में है, तब वह बाहरी आकर्षणों से मुक्त होकर संतुलित जीवन की ओर बढ़ने लगता है।
तनावमुक्त जीवन की ओर
जब मनुष्य अपने भीतर के राग, द्वेष और कषायों को समाप्त करने का प्रयास करता है, तब उसके अंतर्मन में शांति का प्रवाह शुरू हो जाता है। यह शांति जीवन को संतुलित और आनंदमय बना देती है। ऐसा जीवन तनावों से मुक्त होता है और उसमें प्रसन्नता का वसंत खिल उठता है।
वास्तव में जीवन का वसंत तभी खिलता है जब मनुष्य अपने भीतर के तनावों और उनके कारणों से मुक्त हो जाता है। आत्मचिंतन, समता, सेवा और योग जैसे साधनों के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन को शांत, संतुलित और आनंदमय बना सकता है। यही जीवन की सच्ची उपलब्धि है और यही वह मार्ग है जो मनुष्य को तनावमुक्त और सुखी जीवन की ओर ले जाता है।
*कांतिलाल मांडोत*
कांतिलाल मांडोत
L 103 जलवन्त टाउनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार
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