*वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप राजतिलक दिवस पर गोगुंदा में श्रद्धा का सैलाब,राजतिलक स्थली पर पुष्पांजलि, माल्यार्पण और स्वच्छता से सजी अमर यशगाथा*
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*वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप राजतिलक दिवस पर गोगुंदा में श्रद्धा का सैलाब,राजतिलक स्थली पर पुष्पांजलि, माल्यार्पण और स्वच्छता से सजी अमर यशगाथा*
कांतिलाल मांडोत
गोगुन्दा 28 मार्च 2026
मेवाड़ की पावन धरा पर जब भी वीरता, स्वाभिमान और राष्ट्रगौरव की बात होती है, तो महाराणा प्रताप का नाम श्रद्धा और गर्व से लिया जाता है। उनका जीवन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, त्याग और अडिग संकल्प की जीवंत प्रेरणा है। वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के राजतिलक दिवस पर गोगुंदा की पावन राजतिलक स्थली पर आयोजित कार्यक्रम ने एक बार फिर उस अमर यशगाथा को स्मरण कर जन-जन के हृदय में देशभक्ति की ज्योति प्रज्वलित कर दी।
राजतिलक दिवस के अवसर पर पूर्व उपसरपंच दयालाल चौधरी के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने गोगुंदा स्थित ऐतिहासिक राजतिलक स्थली पर पहुंचकर विधिवत राजतिलक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस अवसर पर उपस्थित जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं ने महाराणा प्रताप की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर माल्यार्पण किया तथा उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के अंतर्गत सफाई अभियान भी चलाया गया, जिससे यह संदेश दिया गया कि ऐतिहासिक धरोहरों की स्वच्छता और संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

गोगुंदा उप प्रधान लक्ष्मण सिंह जाला, नांदेशमा मंडल अध्यक्ष नवल सिंह, पूर्व उप प्रधान पप्पू राणा, मंडल संयोजक डीसी मेघवाल, मंडल महामंत्री सुरेश सोनी, प्रशासक कालू लाल, वार्ड पंच कमलेश तेली, गोपाल वेद, रोशन प्रजापत, गा गू लाल मेघवाल, जगदीश प्रजापत, जीतू पालीवाल, पप्पू प्रजापत, हरीश चौधरी, किरण पालीवाल, प्रवीण पालीवाल, दीपक पालीवाल, जितेंद्र सिंह, अंबालाल उपसरपंच सहित अनेक कार्यकर्ता इस आयोजन में उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में महाराणा प्रताप के अद्वितीय साहस और राष्ट्रनिष्ठा को नमन किया।
गोगुंदा की यह भूमि केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि स्वाभिमान की प्रतीक धरा है। यहीं पर महाराणा प्रताप का राजतिलक हुआ था, जिसने मेवाड़ की अस्मिता को नई दिशा दी। उस समय की परिस्थितियाँ अत्यंत चुनौतीपूर्ण थीं। मुगल सम्राट अकबर की शक्ति के सामने अधिकांश राजाओं ने समझौते का मार्ग अपनाया, किंतु महाराणा प्रताप ने स्वाधीनता के मार्ग से कभी समझौता नहीं किया। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा, परंतु उन्होंने अपने आत्मसम्मान को सर्वोपरि रखा। हल्दीघाटी का युद्ध उनकी वीरता और अदम्य साहस का प्रमाण है, जहां उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अपूर्व शौर्य का परिचय दिया।
महाराणा प्रताप की यशगाथा आज भी जनमानस में जीवित है। उनकी कठिन तपस्या, वनवास के दिन, परिवार सहित कष्ट सहते हुए भी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना, हर भारतीय के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राष्ट्र और स्वाभिमान की रक्षा के लिए त्याग और समर्पण आवश्यक है। यही कारण है कि उनकी राजतिलक स्थली का महत्व स्वतः ही बढ़ जाता है। यह स्थल केवल इतिहास का स्मारक नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का केंद्र है।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि हमें महाराणा प्रताप के आदर्शों को अपने जीवन में उतारना चाहिए। जिस प्रकार उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस और सत्यनिष्ठा का परिचय दिया, वही मूल्य आज के समाज में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। राष्ट्रप्रेम, आत्मसम्मान और कर्तव्यनिष्ठा की भावना को सुदृढ़ करने के लिए ऐसे आयोजनों का विशेष महत्व है।
सफाई अभियान के माध्यम से कार्यकर्ताओं ने यह संदेश भी दिया कि ऐतिहासिक धरोहरों की रक्षा केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। स्वच्छ और सुव्यवस्थित राजतिलक स्थली न केवल श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगी, बल्कि यह हमारे सांस्कृतिक गौरव को भी सुदृढ़ करेगी।
राजतिलक दिवस का यह आयोजन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि वह एक भावनात्मक क्षण था जब सभी उपस्थित जनों ने इतिहास की उस अमर गाथा को हृदय से महसूस किया। गोगुंदा की पवित्र धरा पर गूंजते जयघोषों ने यह स्पष्ट कर दिया कि महाराणा प्रताप की स्मृति आज भी उतनी ही प्रखर है जितनी सदियों पहले थी।
निस्संदेह, जब तक भारतभूमि पर स्वाभिमान और स्वतंत्रता का मूल्य रहेगा, तब तक महाराणा प्रताप का नाम आदर और गर्व के साथ लिया जाता रहेगा। उनकी राजतिलक स्थली का महत्व समय के साथ और भी बढ़ता जाएगा, क्योंकि यह स्थल हमें निरंतर यह स्मरण कराता है कि सत्य, साहस और राष्ट्रप्रेम ही किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति होते हैं।
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