धर्म ही आत्मकल्याण और मोक्ष का सच्चा मार्ग, जप-तप एवं तपस्या से होती है कर्मों की निर्जरा : महाश्रमण जिनेन्द्र मुनि
|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
धर्म ही आत्मकल्याण और मोक्ष का सच्चा मार्ग, जप-तप एवं तपस्या से होती है कर्मों की निर्जरा : महाश्रमण जिनेन्द्र मुनि
कांतिलाल मांडोत
गोगुंदा 5 अगस्त 26
कस्बे के ब्रह्मपुरी स्थित वर्धमान स्थानकवासी जैन स्थानक में गुरुवार को आध्यात्मिक चातुर्मास के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का अनुपम संगम बन गई। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने उपस्थित होकर प्रवचनों का लाभ प्राप्त किया तथा धर्म आराधना, स्वाध्याय और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन को श्रेष्ठ बनाने का संदेश ग्रहण किया। पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण से गुंजायमान रहा और श्रद्धालुओं ने संतों के प्रेरणादायी विचारों को अत्यंत मनोयोग से सुना।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए जिनेन्द्र मुनि काव्यतीर्थ ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ और अनमोल है। यदि व्यक्ति जीवन जीने की सही कला सीख ले तथा अपने विचारों और आचरण को धर्म के अनुरूप बना ले, तो उसका संपूर्ण जीवन सुख, शांति और आत्मिक आनंद से भर सकता है। उन्होंने कहा कि जप, तप, संयम और तपस्या कर्मों की निर्जरा के सबसे प्रभावी साधन हैं। इन साधनों के माध्यम से मनुष्य अपने संचित कर्मों का क्षय कर आत्मशुद्धि की ओर अग्रसर होता है। मुनि ने कहा कि आज समाज में लोग एक-दूसरे को पीछे छोड़ने, नीचा दिखाने और ईर्ष्या-द्वेष की भावना में उलझे हुए हैं, जबकि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को प्रेम, करुणा, विनम्रता और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलाना है। धर्म ही ऐसा पवित्र मार्ग है जो मनुष्य को मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ाते हुए उसके जीवन को सार्थक बनाता है।
तपस्वी रत्न प्रवीण मुनि महाराज ने अपने प्रवचन में आगम साहित्य की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान महावीर स्वामी एवं अन्य तीर्थंकरों की दिव्य वाणी का श्रवण आत्मा के उद्धार का सर्वोत्तम माध्यम है। उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों के उपदेश केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य को सत्य, अहिंसा, संयम और आत्मानुशासन का मार्ग दिखाते हैं। यदि व्यक्ति उनके बताए सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार ले तो वह आत्मा से महात्मा और महात्मा से परमात्मा बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ सकता है।
साध्वी राजश्री ने अपने प्रेरक प्रवचन में सांप और जुगनू का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि ईर्ष्या और द्वेष मनुष्य के भीतर की शांति को समाप्त कर देते हैं। साध्वी ने कहा कि आज के समय में प्रतिस्पर्धा के कारण लोग दूसरों की उन्नति से दुखी हो जाते हैं, जबकि आध्यात्मिक जीवन हमें प्रेम, सद्भाव, सहिष्णुता और आत्मचिंतन का संदेश देता है। राजश्री ने सभी से सकारात्मक सोच अपनाने तथा दूसरों की सफलता में प्रसन्नता अनुभव करने का आग्रह किया। वहीं साध्वी सुलक्षणा प्रभा ने अध्यात्म वाणी के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि सत्संग, स्वाध्याय और संतों का सान्निध्य व्यक्ति के जीवन में नई ऊर्जा, नई दिशा और आत्मविश्वास का संचार करता है। साध्वी ने जोर देकर कहा कि आध्यात्मिक चिंतन ही जीवन की अनेक समस्याओं का स्थायी समाधान है।
धर्मसभा के दौरान उमरणा गौशाला के मंत्री गुलाब सोलंकी सहित कमोल एवं बोईसर संघ आये अतिथियों का मेवाड़ी पगड़ी, शॉल एवं माल्यार्पण कर आत्मीय स्वागत एवं सम्मान किया गया। चातुर्मास संयोजक सुंदरलाल मेहता ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे चातुर्मास के पावन अवसर का अधिकाधिक लाभ उठाते हुए धर्म आराधना, तप, स्वाध्याय, सामायिक, नवकार महामंत्र जाप एवं संतों के प्रवचनों से नियमित रूप से जुड़ें। प्रचार-प्रसार समिति के गोपाल लोढ़ा ने भी सभी धर्मप्रेमियों से धार्मिक आयोजनों में सक्रिय सहभागिता निभाने और धर्म की शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन में अपनाने की अपील की।
धर्मसभा में तेरापंथ सभा के पदाधिकारी, समाज के गणमान्य नागरिक तथा बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। पूरे आयोजन के दौरान भक्तिमय वातावरण बना रहा। कार्यक्रम का समापन जिनेन्द्र मुनि काव्यतीर्थ के मंगल पाठ के साथ हुआ। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को धर्म, संयम, सदाचार और सेवा से परिपूर्ण जीवन जीने का संदेश देते हुए कहा कि सच्चा सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और धर्ममय जीवन में निहित है।
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space
आणखी कथा





