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जीवन मे अधिक प्रदुषण तो निरर्थक प्रवृतियों का है-जिनेन्द्रमुनि मसा*

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*जीवन मे अधिक प्रदुषण तो निरर्थक प्रवृतियों का है-जिनेन्द्रमुनि मसा*
कांतिलाल मांडोत
गोगुन्दा 15 अक्टूबर
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावकसंघ महावीर जैन गोशाला उमरणा के स्थानक भवन में जिनेन्द्रमुनि मसा ने कहा कि व्यक्ति दो तरह से प्रवृत होता है सार्थक और निरर्थक।यदि व्यक्ति अपनी सारी प्रवृत्ति में सूक्ष्म निरीक्षण करे तो उसे समझ मे आजाएगा कि उसकी प्रवृतियों में निरर्थक प्रवृतियों का जमघट भी कम नही है।अनावश्यक बोलना,अनावश्यक व्यर्थ कार्य करना,व्यर्थ समय खोना,अनावश्यक चीजो पर सोचते रहना केवल मनोरंजन के नाम पर अश्लील हंसी मजाक करना हानि कारक और व्यर्थ की प्रथाओं परिपाटियों का पालन करना,व्याधि प्राप्त हो जाने जैसे दुर्व्यसनों का सेवन करना, तास और अंको को खोलकर धन नष्ट करना आदि अनेक प्रवृतियां है जो न केवल निरर्थक है किन्तु वे अनेक आपदाओं को भी जन्म देती है।ऐसी प्रवृतियां लोक जीवन मे घर किए हुए है।लाखो करोड़ो व्यक्ति आंख मूंदकर ऐसे अनावश्यक कार्यो में अपना तन मन और धन नष्ट कर रहे है।अनेक संघर्ष और तनाव जो मानव जीवन मे व्याप्त है।उनमें से अधिकांश तो ऐसी निरर्थक बातो के कारण ही है।मुनि ने कहा व्यक्ति अपने तनाव और चिंता से मुक्त होने के अनेक उपाय करता है।किंतु अन्य कोई उपाय करने के पहले से पहले उसे अपने जीवन मे से निरर्थक कार्यो को अलविदा करना चाहिए जो उसके जीवन मे व्यर्थ ही डेरा डाले हुए है और उसके तन मन को प्रदूषित कर रहे है।यदि जीवन मे प्रवृतियों का निरर्थक अंश समाप्त हो जाता है और जीवन मे सार स्वरूप आवशयक कार्य विधियां ही शेष रहती है तो व्यक्ति के अधिकांश तनाव प्रकरण तो ऐसे ही समाप्त हो जाएंगे। प्रवीण मुनि ने कहा कि अति तर्कवाद के इस आधुनिक युग मे सर्वाधिक हानि धर्म साधनाओं की हुई है।धर्म साधनाओ को केवल दिखावटी धर्म के रूप में सिद्घ किया जाता रहा है।अवास्तविक अनावश्यक और समय खाऊ बताया जाने लगा।परिणाम स्वरुप साधना आराधना में बहुत कमी होती गई।रितेश मुनि ने कहा धर्म बौद्धिकता से रहित नही है।धर्म बौद्धिकता का चरम परिणाम है।महा प्रज्ञा है क्योंकि प्रज्ञा के शिखर पर पहुंचे सत पुरूषों ने अपने अनुभवों से धर्म की प्रस्थापना की है।प्रभातमुनि ने कहा आस्था एक प्रकाश है इसमें सत्य की सभी अपेक्षाएं प्रकाशित होती है।उसमें विवाद के लिए कोई स्थान नही होता।

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