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कार्तिक पूर्णिमा अत्यंत महत्वपूर्ण दिवस है*अनेक सत्पुरुषों का संबंध कार्तिक पूर्णिमा से जुड़ा है*

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कार्तिक पूर्णिमा पर विशेष
*कार्तिक पूर्णिमा अत्यंत महत्वपूर्ण दिवस है*अनेक सत्पुरुषों का संबंध कार्तिक पूर्णिमा से जुड़ा है*
आज कार्तिक पूर्णिमा है। चातुर्मास की समाप्ति का दिवस है। आज का दिन अत्यन्त महिमापूर्ण दिन है। अनेक सत्पुरुषों का सम्बन्ध इस दिन के साथ जुड़ा है। आज के दिन अनेक महान आत्माओं ने जन्म लिया और हमारे आदर्श बनें। उनका पुण्य स्मरण हमारे मन में नई प्रेरणा और स्फूर्ति का संचार करता है। हमारी समग्र संस्कृति पर उनका उपकार है। उपकारी जनों के उपकारों को याद करना, कृतज्ञता है। आज के दिन सत्पुरुषों का मंगल स्मरण करके मानवता के हित में कुछ विशिष्ट संपादित करने का उत्तम दिवस है।सत्पुरुषों से हमारी संस्कृति गौरवान्वित है। हम इन सभी का आस्था और आदर के साथ स्मरण कर रहे हैं। इन सत्पुरुषों के द्वारा निर्दिष्ट पथ गतिशील करके जीवन को भव्यता प्रदान करने का प्रयत्न करें। जीवन सद्गुणों से ही सुसज्जित बनता है। जो भी इन महापुरुषों का अनुकरण करेंगे, उनका जीवन महान बनेगा, विशिष्टता ग्रहण करेगा।
आज का आदमी काम से नहीं, दाम से मतलब रखता है। आज का आदमी दान से नहीं, नाम से मतलब रखता है।
सत्पुरुषों का स्मरण करें हम, परम-ज्योति को प्रगटाएँ। मानवता के हित में हम सब, मिल-जुलकर कुछ कर जाएँ ।
*गुरु नानकदेव*
मानवता के मूर्त रूप नानकदेव का जन्म भी कार्तिक पूर्णिमा को ही हुआ था। वे गरीबों के मसीहा थे। उन्होंने ज्ञान-भक्ति व प्रेम का संदेश दिया। अहिंसा धर्म का प्रचार करते हुए कहा था कि जो खान-पीन को शुद्ध रखकर प्रभु भजन करता है, उसका जीवन सार्थक-सफल हो जाता है। उनकी वाणी है- जो रत्त लगे कपड़े जापा होवे पलीत। जो रत्त पीवे मानुषा, तिन क्यों निर्मल चित्त । अर्थात् कपड़े पर खून लगने से कपड़ा गंदा हो जाता है, वही खून जब मनुष्य पीवेगा तब चित्त निर्मल नहीं रहेगा। इसी प्रकार उन्होंने संगत और पंगत की सीख देते हुए कहा है-
संगत करो तो साधु की, पंगत करो तो लंगर की।
अर्थात् साधु संगत में सच्ची सीख मिलती है और लंगर में बिना भेद- भाव सभी एक ही पंगत में बैठते हैं। संगत और पंगत का अर्थ है – पहले भजन करो, फिर भोजन करो। भजन और भोजन में भेदभाव नहीं होना चाहिए। भूखा द्वार पर हो तो उसे भोजन कराना चाहिए। भारतीय संस्कृति का यही है।धर्मप्राण क्रान्तिकारी वीर लौंकाशाह जैसी महान आत्मा आज के ही दिन अवतरित हुईं। उस युग में धार्मिक क्षेत्र में गहन अंधकार परिव्याप्त था। धर्म के नाम पर कई तरह के पाखण्ड और आडंबरों को पुष्ट किया जा रहा था। लौंकाशाह ने जब यह सब कुछ देखा तो उनका अंतर उद्वेलित हुए बिना नहीं रहा। उन्होंने शास्त्रों का लिपिकरण करते हुए गहरा अध्ययन-अनुशीलन किया एवं निग्रन्थ संस्कृति में तेजी से प्रविष्ट होते जा रहे शिथिलाचार और विकृत आचार का उन्मूलन करने के लिए एक क्रांत-द्रष्टा के रूप में स्वयं को प्रस्तुत किया।
*पर्व-प्रवचन*
लौकाशाह श्रावक ही थे, पर उनका आत्मबल अत्यन्त प्रखर था। वे तत्वज्ञ थे। साथ ही उनके जीवन में व्रतों की तेजस्विता एवं निर्मलता थी। संयम-साधना के क्षेत्र में विकृतियों का पोषण उन्हें ठीक नहीं लगा। धर्म और संयम के क्षेत्र में जो आडम्बर खुलकर चल रहे थे, उन्हें दूर करने के लिए उन्होंने सिंहनाद किया। उनके सिंहनाद में सत्य का बल था, किसी भी व्यक्ति या परम्परा विशेष के प्रति दुर्भाव नहीं था।
व्यक्ति जब सत्य का आश्रय लेकर चलता है तो उसका प्रभाव होता ही और ऐसा ही हुआ। कहा जाता है कि लौंकाशाह के सिंहनाद से यतियों के द्वारा की जा रही विकृत स्थापनाओं पर विराम लगने लगा, पर लौंकाशाह को कदम-कदम विरोध का सामना भी करना पड़ा। लौंकाशाह की प्रेरणा से अनेकों गृहस्थों ने दीक्षा ग्रहण की। अनेकों यतियों ने अपनी विकृत मान्यताओं में परिष्कार किया। समय आने पर स्वयं लौंकाशाह ने अपने अनेकों साथियों के साथ धर्म और परम्परा की रक्षा के लिए संयम ग्रहण कर लिया। आध्यात्मिक जगत में तेजस्वी क्रान्ति आई। गुजरात एवं राजस्थान प्रान्त में लौंकाशाह ने सघन विचरण किया। कई दुर्मतिजन लौंकाशाह के प्रभाव को सहन नहीं कर पाए। फलस्वरूप अलवर में तपस्या के पारणक में विष मिश्रित आहार उन्हें दे दिया गया एवं वहीं पर लौंकाशाह दिवंगत हो गए।लौंकाशाह ने प्राणों का उत्सर्ग पसन्द किया, पर उन्होंने विकृतियों के साथ एक क्षण के लिए भी समझौता नहीं किया। उनका स्पष्ट अभिमत था- मैं असत्य और पाखण्डों का पक्षधर एक क्षण के लिए भी नहीं बन सकता।

लौंकाशाह जैसे महान साधकों हम कभी भी भुला नहीं सकते। जैन परम्परा, गौरवशाली परंपरा है। इस परम्परा की प्राचीनता एवं उपादेयता असंदिग्ध है। इस महान परंपरा को सत्पुरुषों ने गौरवान्वित किया है पर स्वयं इसमें सूई भर संशय नही है।
*आचार्य हेमचन्द*
इसी तरह महान ज्योतिर्धर आचार्य हेमचन्द्र का जन्म दिवस भी कार्तिक पूर्णिमा ही है। हेमचन्द्राचार्य के नाम से सम्पूर्ण जैन जगत परिचित है। साहित्य के क्षेत्र में आचार्य हेमचन्द्र का जो महान योगदान रहा है, वह एकदम अभूतपूर्व एवं अद्वितीय है। जैन व्याकरण, न्याय, कोश, हेमलिंगानुशासन जैसे ग्रंथों की रचना करके उन्होंने बहुत बड़े अभाव की पूर्ति की। त्रिषष्टिशलाका पुरुष के रूप में चौवीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती, नौ वासुदेव, नौ प्रतिवासुदेव और नौ बलदेव के जीवन चरित्र का जो चित्रण उन्होंने किया, वह साहित्य भण्डार की अनमोल निधि है।साहित्यिक, राजनैतिक एवं जैनधर्म के प्रचार-प्रसार में आचार्य हेमचन्द्र की विशिष्ट भूमिका रही है। सिद्धराज जयसिंह और सम्राट कुमारपाल जैसे महाराजा उनके चरणों के अनन्य उपासक थे। आचार्य हेमचन्द्र के जीवन से जुड़े अनेकों प्रसंग हैं। कहा जाता है कि एक बार आचार्य हेमचन्द्र पाटणपुर की ओर आ रहे थे। रास्ते में एक विधवा वृद्धा महिला ने निवेदन किया- ‘गुरुदेव ! मेरी कुटिया को पावन कीजिये, आपका पदार्पण मेरे सौभाग्य का सूर्योदय सिद्ध होगा। आप जैसे महान संतों का पदार्पण सहज कहाँ होता है।
वृद्धा की भावना में बल था। हेमचन्द्राचार्य ने उसके आग्रह को स्वीकार कर लिया। वृद्धा अत्यन्त प्रसन्न थी। उसने एक गुदड़ी बनाई थी, सर्दियों से बचने के लिए। रूई से बनी हुई साधारण-सी गुदड़ी, पर उसमें उसकी श्रद्धा समाई हुई थी। उसने पुरजोर आग्रह करके उसे आचार्य के चरणों में अर्पित कर दिया तथा उन्होंने उसे ओढ़ लिया।
हेमचन्द्राचार्य ने जब पाटनपुर में प्रवेश किया तो सम्राट कुमारपाल ने सेनापति, मंत्री आदि कई प्रमुखजनों, पारिवारिक सदस्यों एवं नगर की प्रजा के साथ स्वागत किया। कुमारपाल सम्राट ने देखा कि आचार्य हेमचन्द्र एक मैली एवं साधारण-सी चादर-गुदड़ी ओढे हुए हैं। उसे यह ठीक नहीं लगा। वह आचार्य के निकट आया और कान में धीरे से कहा- गुरुदेव ! आपन यह चादर ओढ रखी है, यदि इसे बदल लें तो अच्छा रहेगा। आचार्य न कहा- क्यों, चादर को बदलने की क्या बात है, इसमें अच्छा और बुरा जैसा क्या है? कुमारपाल ने कहा- ‘इसलिए कि आप मेरे गुरु हैं और आप यदि ऐसी चादर ओढ़े हुए प्रवेश करेंगे तो मुझे शर्म लगेगी। लोग मुझे क्या कहेंगे।
आचार्य हेमचन्द्र ने कहा- ! तुम्हें मेरी इस चादर की तो शर्म आती है, लेकिन तुम्हें यह शर्म नहीं आती है कि तुम्हारे इस राज्य में सैकड़ों-हजारों, असहाय, माताएँ-बहिनें, विधवाएँ किस तरह का अभावपूर्ण जीवन गुजार रही है? तुम्हारी प्रजा का जीवन कठिनाइयों की चक्की में पिसा जा रहा है, क्या कभी तुम्हारा ध्यान उस ओर गया है?’ कुमारपाल को अपनी भूल का अहसास हुआ और कहा जाता है कि उसने उसी समय एक घोषणा की कि कई करोड़ की राशि मैं गरीब-विधवाओं की सहायता में लगाऊँगा। उसने अपनी प्रजा के अभ्युदय के लिए आचार्य हेमचन्द्र के सदुपदेशों से स्वयं को हर तरह से न्यौछावर कर दिया। ऐसे एक नहीं, अनेकों उदाहरण हैं।
श्रीमद् राजचन्द्र
इसी तरह श्रीमद् राजचन्द्र का नाम भी आज की पूर्णिमा के साथ जुड़ा हुआ है। वे गृहस्थ जीवन में थे, किन्तु किसी संत से उनका जीवन कम महत्वपूर्ण नहीं था। उन्होंने आत्मतत्व की खोज में अपने आपको सर्वात्मना समर्पित कर दिया। गृहस्थ में रहते हुए एक विशिष्ट जीवन जीया। उनके जीवन के कण-कण में अध्यात्म समाया हुआ था। जन्म, जीवन और मरण को, साधना से जुड़कर उन्होंने सार्थक बना डाला ।
श्रीमद् राजचन्द्र के जीवन का एक प्रसंग है। वे जवाहरात के व्यापारी -। कहा जाता है कि एक बार एक व्यापारी से सौदा कर लिया गया कि अमुक समय में जवाहरात ले लूंगा। जब देने का समय आया तब बाजार में भाव बढ़ गया, इससे श्रीमद् राजचन्द्र को बहुत अधिक मुनाफा होमजार में भान पर जिससे सौदा निश्चित हुआ, बेचारा वह तो एकदम नष्ट ही हो जाता। इसलिए वह अत्यन्त घबराता हुआ था।श्रीमद् राजचन्द्रजी दुकान पर बैठे हुए थे, वे सारी स्थिति को तुरन्त समझ गए। उन्होंने उस व्यक्ति को आश्वस्त करते हुए कहा- ‘भैया ! तुम घबरा रहे हो और तुम्हारी घबराहट स्वाभाविक है पर घबराओ मत। इस दस्तावेज का कोई अर्थ नहीं है। जाओ, तुम आराम से अपना व्यापार करो। राजचन्द्र दूध पी सकता है, किन्तु किसी का खून नहीं पी सकता है।’ यह कहते हुए उन्होंने दस्तावेज के टुकड़े-टुकड़े करके फैंक दिये। महात्मा गाँधीजी के जीवन पर श्रीमद् राजचन्द्रजी की साधना का अमिट प्रभाव पड़ा तथा उन्होंने उन्हें अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया।इस प्रकार आज के दिन ऐसे कई सत्पुरुष इस धरती पर हुए हैं।

                                  कांतिलाल मांडोत

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