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मन और मस्तिष्क गर्म हो जाये, तो संयम ,शांति और समर्पण जरूरी-शास्वत सागरजी मसा

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मन और मस्तिष्क गर्म हो जाये, तो संयम ,शांति और समर्पण जरूरी-शास्वत सागरजी मसा
चंपालाल बोथरा
सूरत 21 जुलाई 2025
बाड़मेर जैन श्री संघसर्वमंगलमय वर्षावास 2025 कुशल दर्शन दादावाड़ी, पर्वत पाटिया, सूरत में प.पू. खरतरगच्छाचार्य, छत्तीसगढ़ श्रृंगार, संयम सारथी, शासन प्रभावक श्री जिनपीयूषसागर सूरीश्वरजी म.सा. के शिष्य, पूज्य श्री शाश्वतसागरजी म.सा. ने अपने ओजस्वी प्रवचनों में जीवन के गहन आध्यात्मिक प्रश्नों को अत्यंत सरल व प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत करते हुए कहा कि गर्मी में लोग फ्रिज और ए.सी. लाते हैं, लेकिन जब मन और मस्तिष्क गर्म हो जाए, तो संयम, शांति और समर्पण लाना ज़रूरी होता है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि आज का मानव बाहरी सुख-सुविधाओं जैसे सनस्क्रीन और आरामदायक वस्त्रों की तलाश में तो लगा हुआ है, लेकिन आत्मा की शांति के लिए संयम और आत्मचिंतन को भूल चुका है।


घर की रामायण रिश्तों का आइना पूज्य श्रीजी ने सूरत के श्रेष्ठीवर्य ज़वेरी परिवार द्वारा पालिताना की पावन टोंक में निर्मित सहस्रफ़न्ना पार्श्वनाथ भगवान के मंदिर के बाहर तीन विशेष पुतलियों का उल्लेख सोमपुरा द्वारा किया, जिनमें एक में सर्प, दूसरी में बिच्छू, और तीसरी में वानर का प्रतीक बना है ।उन्होंने इन प्रतीकों के माध्यम से समझाया कि सर्प विषैली वाणी और क्रोध का, बिच्छू चुभन और द्वेष का, तथा वानर चंचलता और अस्थिरता का प्रतीक है। इनसे बचने का उपाय प्रेम, करुणा, संयम, सहनशीलता और आत्मदर्शन है। पूज्य श्रीजी ने कहा कि ये पुतलियाँ सास, बहु और ननद के रिश्तों का अपमान नहीं, बल्कि आत्मा की परीक्षा हैं और इन्हें देखकर व्यक्ति को अपने भीतर झाँकना चाहिए। एक और प्रसंग में कहा कि परिवार की बेटियों को संपत्ति’ नही संमत दोरामायण के प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने राजा जनक और सीता संवाद का उल्लेख किया, जिसमें जनक ने सीता को गहने नहीं, ‘संमति’ दी थी। इसी संमति के बल पर सीता 14 वर्ष के वनवास में भी अडिग रहीं। उन्होंने यह भी कहा कि आज समाज बेटियों को विदाई में गहने देता है, पर जीवन निर्णय की शक्ति नहीं देता, जिस कारण वे बाहरी रूप से समृद्ध, पर आंतरिक रूप से असुरक्षित रह जाती हैं।प्रवचन में पूज्य श्री समर्पितसागरजी म.सा. ने एक अत्यंत भावपूर्ण उदाहरण सुनाते हुए धर्म, अहंकार और आत्म-साक्षात्कार की गहराई को उजागर किया। उन्होंने बताया कि एक पुत्र अपने वृद्ध पिता को मृत्यु से पूर्व धर्म का बोध कराना चाहता है। योग्य वक्ता न मिलने पर, वह एक बहुरूपिया को बुलाता है, जो तीन दिन तक धर्म का उपदेश देता है।

तीन दिन बाद पिता का देहांत हो जाता है। पुत्र जब बहुरूपिये को 1000 रुपये देना चाहता है, तो वह लेने से इंकार कर देता है। पुत्र कहता है कि मैंने आपसे फीस तय करके बुलाया था, लीजिए। तब बहुरूपिया कहता है कि मैंने धर्म सुनाया, लेकिन उनके चेहरे पर न समता थी, न शांति। गले, नाक, मूत्र मार्ग सबमें नलियाँ थीं। सुविधा की कमी नहीं थी, पर आत्मिक संतोष नहीं दिखा। उनकी आंखें बंद हुईं, पर मेरी आंखें खुल गईं। इस अनुभव ने मेरी दृष्टि और दृष्टिकोण बदल दिया।तीन सत्य दृष्टिकोण का आधार पूज्य श्रीजी ने कहा कि जीवन में तीन प्रकार के सत्य होते हैं।

लेकिन अहंकारी मन में नहीं। अहंकार हमें सम्मान ‘स्वीकृति’ और ‘महत्व’ की भूख से बाहर नहीं निकलने देता
अंतिम संदेश पागल बनो अहंकारी नहीं पूज्य समर्पितसागरजी म.सा. ने कहा कि खाली मन में ही संत और सत्कथाएं प्रवेश कर सकती हैं। जीवन में यदि कोई बनना है, तो ज्ञानी नहीं—विनम्र बनो, साधक बनो। एक पागल भी मार्ग पर आ सकता है, लेकिन अहंकारी कभी मार्ग पकड़ ही नहीं सकता।
संघ के वरिष्ठ सदस्य चम्पालाल बोथरा ने बताया की आज के प्रवचन के उपरांत बड़ी संख्या में श्रद्धालु आत्ममंथन में लीन हुए और जीवन में दृष्टिकोण के नवजागरण का संकल्प लिया

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