वासुदेव श्रीकृष्ण गुणपरक दृष्टिकोण लेकर चलने वाले सत्पुरुष थे*

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*वासुदेव श्रीकृष्ण गुणपरक दृष्टिकोण लेकर चलने वाले सत्पुरुष थे*
बिना जैन
सूरत 16 अगस्त 25
भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की यह अष्टमी कर्मयोगी श्रीकृष्ण के साथ जुड़ी हुई है। श्रीकृष्ण के साथ जुड़ जाने से इस अष्टमी का महत्व सचमुच बढ़ गया है। इस अष्टमी को जन-जन जन्माष्टमी के रूप में जानता है। इस अष्टमी को और भी अनेकों ने जन्म लिया है एवं ले रहे हैं और लेते रहेंगे, पर इन सबको कौन याद करता है? श्रीकृष्ण ने इस अष्टमी को जन्म लेकर जन-मानस के अन्दर विशिष्ट श्रद्धा और सम्मानपूर्ण स्थान बना लिया है। जन-मानस उन्हीं को स्थान और सम्मान देता है, जिनके जीवन में वैशिष्ट्य रहा हो।
श्रीकृष्ण ने जन्म लेकर, शानदार जीवन जीकर एक ऐसी दिव्य, भव्य एवं प्रेरणास्पद कहानी का निर्माण किया है जो कि आज भी असंख्यजन उनके गुणों का उत्कीर्तन करते हुए थकते नहीं है। कृष्ण का जन्म जिन परिस्थितियों में हुआ, वे परिस्थितियाँ इतनी विषम एवं विचित्र थीं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। तीन खंड के स्वामी का जन्म और जन्म के समय थाली बजाने वाले की बात तो दूर, कोई ताली बजाने वाला भी नहीं था। मामा कंस के कारागृह में जन्म हुआ एवं उसी समय वहाँ से चुपचाप उन्हें गोकुल में ले जाया गया। गोप-ग्वालों के बीच ग्रामीण वातावरण में उनका परिपालन हुआ। समय आया तो उन्होंने द्वारका में राज्य करके वातावरण
में एक ऐसी सौम्यता और स्फूर्ति का सूत्रपात किया कि परिव्याप्त अराजकता सम्पूर्ण रूप से समाप्त हो गई।
कंस और जरासंध आदि के अत्याचारों से संत्रस्त जन-जन को मुक्ति दिलाने वाले महापुरुष श्रीकृष्ण की जितनी भी महिमा गाई जाए, कम है। कालिया नाग का दमन, इन्द्र के कुपित होने से मुसलधार वर्षा से प्रलंयकारी स्थिति का निर्माण होने पर कनिष्ठा उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सबकी रक्षा, रणभूमि में सुदर्शन चक्र चलाकर अन्याय और अनीति के खिलाफ युद्ध, न्याय की स्थापना के प्रयास, पशुओं की रक्षा आदि कई ऐसे प्रसंग हैं, जिन्हें इतिहास कभी भी भूला नहीं सकता। श्रीकृष्ण के उल्लेखनीय कार्यों में सबसे महत्त्वपूर्ण है, महाभारत के युद्ध में अपने भक्तसखा अर्जुन को दिया गया गीता का उपदेश। श्रीकृष्ण कथित गीता विश्व का युग-ग्रन्थ माना जाता है। हर वर्ग, हर धर्म और हर सम्प्रदाय ने गीता को महत्त्व दिया है। वासुदेव कृष्ण का दूसरा कार्य है, अति निर्धन सहपाठी मित्र सुदामा को अपने-जैसा सम्पन्न बना देना। इसमें भी दान देने की विशेषता यह थी कि सुदामा में याचक का दैन्य नहीं आने दिया, क्योंकि मित्र को दिया गया दान यदुनाथ कृष्ण का गुप्तदान था।
आज आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति अपने दृष्टिकोण को गुण ग्राहकता से परिपूर्ण बनाएँ। संसार में अच्छाइयाँ और बुराइयाँ दोनों साथ-साथ चलती हैं। जहाँ फूल हैं, वहाँ कांटें भी है। यह हमारी जागरूकता पर निर्भर है कि हम क्या ग्रहण करें। जीवन अच्छाइयों से निर्मित होता है, बुराइयों से नहीं। सम्यग् दृष्टि और मिथ्यादृष्टि दोनों ही तरह के व्यक्ति संसार में रहते हैं। सम्यग्दृष्टि साधक कभी भी किसी की बुराई की ओर ध्यान नहीं देता। उसका दृष्टिकोण राजहंस के समान होता है, वह कंकरों के ढेर में से अपनी चोंच में मोती को उठाता है।
श्रीकृष्ण ने पर-पीड़ा को अपनी पीड़ा समझा। सच्चे अर्थों में मानव कहलाने का अधिकारी भी वही है, जो दूसरों की पीड़ा को प्रसन्नता में बदलने के लिए हर संभव प्रयास में तत्पर रहता है। अपने स्वार्थों का रोना रोने वाले तो इस संसार में बहुत हैं। जो दूसरों के दुःख से द्रवित होता है, वही महान कहलाता है।
ऐसे लोगों को चाहिए कि वे संवदेन शून्य न बनें एवं कृष्ण के जीवन से कुछ सीख अवश्य लें। मानव का महत्व मानव की आकृति से नहीं है, अपितु प्रकृति से है, मानवता से है। मानवता का भाव, पारस्परिकता का भाव कभी भी लुप्त नहीं होना चाहिए। इस संसार में धन्य जीवन उसी का है, जिसके मन में परोपकार परायणता है।
श्रीकृष्ण का जीवन एक ऐसा जीवन है कि हम उनके गुणों की चर्चा करते ही चले जाएँ। कृष्ण ने अपने जीवन में व्यापक रूप से धर्म-दलालियों से स्वयं को जोड़े रखा। उन्होंने स्पष्ट रूप से उद्घोषणा करवा दी थी कि कोई भी व्यक्ति यदि प्रभु के चरणों में दीक्षित होना चाहे तो उसकी दीक्षा का सारा भार मैं वहन करूँगा एवं उसके परिवार आदि की परिचर्या का सम्पूर्ण दायित्व में निभाऊँगा। यह दृष्टिकोण बहुत उत्कृष्ट दृष्टिकोण है। हम देखते हैं, कई ऐसे लोग हैं जो न स्वयं धर्म से जुड़ते हैं और न दूसरों को जुड़ने देते हैं। किसी के मन में धर्म आराधना का पवित्र भाव यदि जागृत हो गया, तो अंतराय, अवरोध उपस्थित करने वाले कई मिल जाएँगे।
श्रीकृष्ण से हम यह प्रेरणा अवश्य लें कि कभी भी अच्छे कार्यों का विरोध नहीं करेंगे। हम अच्छी प्रवृत्तियों का अनुमोदन एवं अभिनन्दन करना सीखें। कृष्ण के जीवन का इतिहास बोलता है कि उन्होंने धर्म-दलालियों से जुड़कर तीर्थकर गोत्र का अनुबंध कर लिया था। हम भी अपने जीवन को विशिष्टता प्रदान सकते हैं। आवश्यकता मात्र अनुकरण करने की है।
वासुदेव श्रीकृष्ण के मन में पशुजगत के प्रति जो प्रेम था, वह अभूतपूर्व था। उन्होंने पशुओं के संरक्षण के लिए अपने आपको सर्वात्मना समर्पित रखा। उन्होंने पशुओं की कभी उपेक्षा नहीं होने दी। आज हमारे अपने देश में पशुओं की, गोधन की जिस तरह से दुर्दशा हो रही है, उसे देखकर कर हृदय कंपित हो उठता है। आज देश में कत्लखानों की बाढ़ आ रही है। जहाँ पर कभी दूध-दही की नदियाँ बहती थीं, आज उस धरती पर खून की नदियाँ बह रही हैं।श्रीकृष्ण की इस जन्म-जयंती के पावन प्रसंग पर यह संकल्प सामूहिक रूप से करने की आवश्यकता है कि हम गोधन का अनिवार्य रूप से संरक्षण-संवर्धन करेंगे तथा कभी भी कत्लखानों को पुष्ट नहीं होने देंगे। हमारे संकल्पों में एवं आवाज में बल होना चाहिए। यदि सामूहिक रूप से हिंसा के उन्मूलन के लिए प्रयास किये जाएँ तो पुनः इस देश में अहिंसात्मक मूल्यों की प्राण-प्रतिष्ठा हो सकती है।
छोटे-से-छोटे और बड़े-से-बड़े गाँव-नगरों में कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विविध झाँकियों का निर्माण किया जाता है। प्रत्येक मंदिर और मोहल्ले में उमड़ती हुई भीड़ देखते ही बनती है। कई तरह के कार्यक्रमों का समायोजन जन्माष्टमी को होता है।हमारी जिनके प्रति आस्था और समर्पण का भाव है, वह रहना ही चाहिए। महापुरुषों के गुणों का गौरवगान एक अच्छी परम्परा है। पर मेरा इस सम्बन्ध में सोचना है मनोरंजन से अधिक महत्त्वपूर्ण
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर मन्दिर में हो या न हो, इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है, श्रीकृष्ण का अवतरण यदि हमारे मन में होता है तो हमारे देश की स्थिति अत्यन्त संतोषप्रद बन सकती है।चिन्तन के क्षणों में मुझे बार-बार एक बात लगती है कि आज के व्युग में श्रीकृष्ण की अधिक आवश्यकता है। कहने को हमारा भारतवर्ष धर्ममचात देश रह गया है किन्तु आज यहाँ अधर्म ही अधिक पुष्ट हो रहा है।

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