नव ऊर्जा संचित कर राष्ट्र कल्याण की प्रेरणा देते है हमे रास्ट्रीय पर्व*

Oplus_131072
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
15 अगस्त राष्ट्र कल्याण की भावना का दिन
*नव ऊर्जा संचित कर राष्ट्र कल्याण की प्रेरणा देते है हमे रास्ट्रीय पर्व*
पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस का वह दिव्य प्रभात देश के लिए कितने आनन्द उल्लास का रहा होगा जो एक हजार वर्ष की गुलामी को भोगकर सर्व तंत्र स्वतंत्र हुआ।आज हम अपनी उस स्वतंत्रता की स्मृति को चिरस्थायी बनाये रखने के लिए प्रति वर्ष स्वतंत्रता दिवस को राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मनाते है।
उठ जाग मुसाफिर भोर भई का सहगान गाते हुये बालक प्रभात फेरी निकालते थे।राष्ट्र ध्वज तिरंगा मुक्त गगन में फहराया जा रहा है।आज हम स्मरण करते है, देश के उन नौनिहालों का,जिन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए हंसते हंसते स्वयं का बलिदान कर दिया।इसी दिन के लिए कई माताओ के सपूत,बहिनो के भाई फांसी के झूलो पर झूल गये।उन अनगिनत वीरो ने अंग्रेजो की गोलियों को पीठ पर ही नही,बल्कि अपने सिनो पर झेला था।
सचमुच धन्य-धन्य है वह रामराज्य, लाखों वर्ष का दीर्घकाल व्यतीत हो जाने पर भी जिसकी चमक और दमक किसी भी प्रकार से कम नहीं हुई है। आप सभी बुद्धिजीवी है,हम जानते हैं इस दीर्घ काल में समय ने कई करवटें लीं, अनेक राज कान्तियाँ हुई हैं। अनेक राजा-महाराजा और सम्राट्-शहंशाह तलवारें चमकाते, भाले उठाते, हिनहिनाते अश्वों व चिंघाड़ते हाथियों पर बैठकर आये, अपनी कायरतापूर्ण वीरता और सत्ता की शक्ति से जन-मन में भय का संचार किया। वे जिधर से गुजरे, उधर ही एक विनाशकारी तूफान उठा दिया। नादिर, चंगेज, तैमूर को क्या इतिहास भुला पाया है? क्या हम गजनवी और गौरी को इतिहास के पृष्ठों से अलग कर पाये हैं? उन्हें भुलाया नहीं जा सकता। उनका नाम सुनने मात्र से ही वीरों के कलेजे काँप उठते थे। वे और उनकी सेना जिधर से गुजरती, चमन वीरान हो जाता था। बस्तियाँ खाली हो जाती थीं, खलिहान आग की लपटों में स्वाहा हो जाते थे। वे इंसान की शक्ल में नरपिशाच थे। उन्होंने सम्प्रदायवाद के रंग से रंगकर अन्याय किया, अत्याचार किया, खून की नदियाँ बहा दीं तथा सांस्कृतिक पूजा-स्थलों को नष्ट-भ्रष्ट कर अपनी शक्ति का वर्चस्व बताया। वे मानव के तन पर शासन कर सके, मगर उनके मन पर विजय नहीं पा सके। कागज के काले पृष्ठों पर उनका कलंकित नाम आज भी अंकित है, मानव-मन में उनके प्रति घृणा का ज्वार आज भी उफन रहा है।
इस स्वतंत्र भारत में आज हम जन-मन को सुखी बनाने वाले रामराज्य की कल्पना करते हैं। राम का जीवन तो गन्ने के समान था, जिसमें सर्वत्र मिठास-ही-मिठास समाई थी। उसकी हर पेड़ी मिठास का अद्भुत स्रोत थी। राम का जीवन कितना महान् था, उन्हें स्वर्ण सिंहासन पर बिठाने की घोषणा हो चुकी थी। अवध की जनता राम को राज्य सिंहासन पर आरूढ़ देखने को उत्सुक थी।
आज हम देखरहे है जनता के बहुमत पर चुने हुए जनप्रतिनिधियों को शासन करने का अधिकार सौंपा जाता है।जनता के वोट प्राप्त करने हेतु प्रत्याशी घर घर और दर दर फिरकर याचना करते है,किन्तु अधिकार की कुर्सी पर पदासीन होने के पश्चात वे कितने घरों की सुध लेते है।दीन दुखियो की सेवा का दम्भ भरने वालो को राजधानी के वातानुकूलित बंगलो से बाहर निकलने में शर्म आती है।
स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस, ये राष्ट्रीय पर्व हमें नव ऊर्जा संचित कर राष्ट्र-कल्याण की प्रेरणा देते हैं। दिल्ली और देश के प्रान्तों की राजधानियों में तिरंगा फहराकर भव्य समारोह आयोजित कर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते है,यह उचित नहीं है। राष्ट्रीय पर्व को बीते समय में की गई प्रगति के आधार पर मूल्यांकन-दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। ऐसे दिवस खुले मस्तिष्क और ठंडे दिल से यह सोचने को बाध्य करते हैं कि हमने सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व आत्मिक उत्थान के साथ-साथ की एकता अखण्डता के लिए क्या प्रयास किया है और क्या करना शेष है
स्वतंत्रता के पश्चात् हमारा देश विभिन्न समस्याओं के जाल में फँस गया है। सत्ता के मोह ने समस्याओं को जन्म दिया है। सत्ताधीशों को स्वार्थ से हटकर जन-कल्याणा की भावना से सोचना होगा। सर्वोदय का राग मन की कलुषता हटाकर गाना होगा तभी आयेगी राष्ट्र में शांति, जनता में खुशहाली, जीवन के कण-कण में फिर सत् की निर्मल ज्योति जगमगायेगी। प्रजा से राजा है, न कि राजा से प्रजा है। यदि विचार मूर्तरूप ले सके तो गांधी जी के अनुसार स्वराज्य का सर्वोत्तम रूप रामराज्य है। रामराज्य अर्थात् ईश्वर का राज्य अथवा सद्गुणों का साम्राज्य। हम जनमानस सद्गुणों का संचार करें, अध्यात्म का अमृत पिलाकर जनता को नया जीवन दे।भारत को पुनः विश्व-गुरु के पद पर आरूढ़ करना प्रत्येक भारतवासी का प्रथम कर्तव्य है।na


Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space
