नाग पंचमी पर धर्मसभा में गूंजा क्रोध त्यागकर संयमित जीवन जीने का संदेश*
|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
*नाग पंचमी पर धर्मसभा में गूंजा क्रोध त्यागकर संयमित जीवन जीने का संदेश*
कांतिलाल मांडोत
गोगुंदा, 17 अगस्त
कस्बे के ब्रह्मपुरी स्थित वर्धमान स्थानकवासी जैन स्थानक में सोमवार को आध्यात्मिक चातुर्मास के तहत नाग पंचमी पर्व के अवसर पर धर्मसभा का आयोजन हुआ। धर्मसभा में साधु-साध्वियों ने श्रद्धालुओं को धार्मिक एवं आध्यात्मिक जीवन के महत्व से अवगत कराया। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने धर्म आराधना, नवकार महामंत्र जाप और आध्यात्मिक चिंतन में सहभागिता निभाई।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए महाश्रमण पूज्य गुरुदेव जिनेन्द्र मुनि काव्यतीर्थ ने कहा कि मनुष्य को अपने कर्मों का लेखा-जोखा इसी जीवन में भोगना पड़ता है। नाग पंचमी पर्व के संदर्भ में उन्होंने कहा कि मनुष्य के भीतर भी एक नाग विद्यमान है और वह है क्रोध रूपी नाग। क्रोध मनुष्य के विवेक को समाप्त कर देता है तथा उसके भीतर प्रेम, प्रीति और सद्भावना का नाश करता है। क्रोध के वशीभूत होकर मनुष्य स्वयं का ही अहित करता है और जीवन को दुर्गति की ओर ले जाता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर उत्पन्न होने वाले क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए। क्रोध का त्याग कर तप, जप और आध्यात्मिक साधना की ओर ध्यान देने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है। संयमित आचरण और सद्विचारों के माध्यम से व्यक्ति अपने कर्मों में सुधार कर सकता है और मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर हो सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म को केवल सुनने तक सीमित नहीं रखने, बल्कि उसे अपने व्यवहार और जीवनचर्या में उतारने का आह्वान किया।
तपस्वी रत्न प्रवीण मुनि ने आगम ज्ञान पर प्रकाश डालते हुए भगवान महावीर के उपदेशों को जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि आत्मकल्याण के लिए धर्म और साधना का मार्ग अपनाना आवश्यक है। व्यक्ति को अपने आचरण में अहिंसा, संयम और आत्मअनुशासन को स्थान देना चाहिए। साध्वी राजश्रीजी ने नाग पंचमी के धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को संयमित जीवन जीने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि पर्व केवल परंपरा निभाने का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और जीवन में सुधार का माध्यम भी हैं।
साध्वी सुलक्षणा प्रभाजी ने जीवन जीने की कला पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन तभी सार्थक बन सकता है, जब उसमें संयम, सदाचार, प्रेम और परस्पर सद्भाव बना रहे। उन्होंने श्रद्धालुओं को दैनिक जीवन में धर्म, ध्यान और आत्मचिंतन के लिए समय निकालने की प्रेरणा दी।
इस अवसर पर संघ अध्यक्ष नाथूलाल मेहता ने बाहर से आए अतिथियों और धर्मप्रेमियों का स्वागत किया। प्रचार-प्रसार समिति के गोपाल लोढ़ा ने बताया कि आध्यात्मिक चातुर्मास के दौरान नियमित रूप से प्रवचन, नवकार महामंत्र जाप सहित विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने समाज के सभी धर्मप्रेमियों से अधिक से अधिक संख्या में इन आयोजनों में शामिल होकर धर्म आराधना में सहभागिता निभाने का आह्वान किया।
धर्मसभा में तेरापंथ सभा के पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं ने धार्मिक वातावरण में आध्यात्मिक साधना की। समापन अवसर पर महाश्रमण पूज्य गुरुदेव जिनेन्द्र मुनि ने मंगल पाठ सुनाया। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को धर्ममय, संयमित, सदाचारी और शांतिपूर्ण जीवन जीने का संदेश दिया। धर्मसभा का वातावरण पूरे समय आध्यात्मिक ऊर्जा और श्रद्धा से ओतप्रोत रहा।
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space





