नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे 9974940324 8955950335 ,हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर करें , पर्यावरण संरक्षण, खनन माफिया और राजनीति के टकराव में फंसी देश की प्राचीन पर्वतमाला* – भारत दर्पण लाइव

पर्यावरण संरक्षण, खनन माफिया और राजनीति के टकराव में फंसी देश की प्राचीन पर्वतमाला*

😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊

अरावली पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और सियासी तूफान

*पर्यावरण संरक्षण, खनन माफिया और राजनीति के टकराव में फंसी देश की प्राचीन पर्वतमाला*
भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में शामिल अरावली एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया फैसले के बाद, जिसमें 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृति को ही अरावली मानने की व्याख्या की गई, राजस्थान की सियासत गरमा गई है। कांग्रेस ने इस फैसले को पर्यावरण के खिलाफ बताते हुए सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। उदयपुर, जैसलमेर, जोधपुर और अलवर जैसे शहरों में हुए इन प्रदर्शनों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह लड़ाई वास्तव में अरावली और पर्यावरण बचाने की है, या फिर अदालत के फैसले को लेकर राजनीतिक रोटियां सेंकने का नया मौका।
अरावली पर्वतमाला भारत की भू-आकृतिक विरासत का अहम हिस्सा है। यह न केवल राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात के पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने में भूमिका निभाती है, बल्कि मानसून, भूजल स्तर, जैव विविधता और मरुस्थलीकरण को रोकने में भी इसकी भूमिका मानी जाती है। राजस्थान में अरावली का करीब 80 किलोमीटर हिस्सा फैला हुआ है, जो राज्य के लगभग 15 जिलों को छूता है। माउंट आबू की चोटी, जो 1727 मीटर ऊंची है, इसी पर्वतमाला का गौरवशाली उदाहरण है। इसके बावजूद, विडंबना यह है कि अरावली का बड़ा हिस्सा वर्षों से अवैध खनन, अतिक्रमण और प्रशासनिक उदासीनता का शिकार रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली भू-आकृतियों को अरावली की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। इस फैसले के बाद यह तथ्य सामने आया कि अरावली क्षेत्र की लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियां 100 मीटर के दायरे में नहीं आतीं। यही बिंदु कांग्रेस और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के विरोध का मुख्य कारण बना। कांग्रेस का आरोप है कि इस व्याख्या से खनन माफियाओं को खुली छूट मिल जाएगी और अरावली का बड़ा हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएगा।
राजस्थान में इस फैसले के विरोध में कांग्रेस ने व्यापक प्रदर्शन किए। उदयपुर में कलेक्टोरेट के बाहर जोरदार प्रदर्शन हुआ, जहां पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की की घटनाएं भी सामने आईं। जोधपुर में अरावली के मुद्दे पर अड़े कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को पुलिस ने खदेड़ दिया, जबकि अलवर में विरोध ने उग्र रूप ले लिया। जैसलमेर जैसे सीमावर्ती जिले में भी इस फैसले को लेकर नाराजगी देखने को मिली। इन प्रदर्शनों में न केवल कांग्रेस कार्यकर्ता, बल्कि पर्यावरण प्रेमी और जीव-जंतुओं के संरक्षण की बात करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हुए।
कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए यहां तक कह दिया कि अदालत अवैध खनन माफियाओं की परोक्ष पैरवी कर रही है। यह आरोप अपने आप में गंभीर है और न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सीधा हमला माना जा रहा है। सवाल यह है कि क्या एक संवैधानिक संस्था पर इस तरह उंगली उठाना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप है, या फिर यह राजनीतिक हताशा का परिणाम है। आलोचकों का कहना है कि कांग्रेस के पास फिलहाल कोई ठोस जनमुद्दा नहीं है और अरावली का यह विषय उसे एक भावनात्मक और पर्यावरणीय आवरण में राजनीति करने का अवसर दे रहा है।
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर यह तर्क भी सामने आ रहा है कि अदालत ने यह व्याख्या किसी राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि उपलब्ध कानूनी और तकनीकी तथ्यों के आधार पर दी है। भू-वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली की संरचना अत्यंत पुरानी है और समय के साथ इसके कई हिस्से घिसकर समतल हो चुके हैं। ऐसे में केवल नाम के आधार पर हर ऊंच-नीच को अरावली घोषित कर देना वैज्ञानिक दृष्टि से भी उचित नहीं माना जा सकता। अदालत का उद्देश्य संभवतः यह रहा हो कि स्पष्ट मानक तय किए जाएं, ताकि कानून के दुरुपयोग और भ्रम की स्थिति से बचा जा सके।
हालांकि, यह भी सच है कि अरावली क्षेत्र में अवैध खनन एक बड़ी और पुरानी समस्या रही है। चाहे कांग्रेस की सरकारें रही हों या भाजपा की, खनन माफियाओं पर लगाम लगाने में सभी विफल रहे हैं। पहाड़ियों को काटकर पत्थर और खनिज निकाले गए, जंगल उजाड़े गए और वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट किया गया। आज जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है, तो अचानक पर्यावरण की चिंता दिखाना कई लोगों को पाखंड प्रतीत होता है। सवाल यह भी उठता है कि जब सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने अरावली को बचाने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए
पर्यावरण प्रेमियों की चिंता को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। अरावली केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि यह एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है। यहां कई दुर्लभ वनस्पतियां और जीव-जंतु पाए जाते हैं, जिनका अस्तित्व सीधे तौर पर इन पहाड़ियों से जुड़ा है। अरावली का क्षरण दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण, राजस्थान में मरुस्थलीकरण और जल संकट को और गंभीर बना सकता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो अदालत के फैसले के दूरगामी प्रभावों पर गंभीर मंथन आवश्यक है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन उसे एक नया मुद्दा जरूर देता है, लेकिन यह भी साफ है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सड़कों पर उतरकर बदलवाना न तो आसान है और न ही संवैधानिक रूप से उचित। लोकतंत्र में अदालत के फैसलों से असहमति जताने के लिए पुनर्विचार याचिका, कानूनी बहस और विशेषज्ञ समितियों के माध्यम से रास्ते मौजूद हैं। हिंसक प्रदर्शन, पुलिस से झड़प और उग्र बयानबाजी न केवल मुद्दे की गंभीरता को कमजोर करती है, बल्कि जनसमर्थन भी कम कर सकती है।
अंततः अरावली का सवाल केवल कांग्रेस बनाम भाजपा या सरकार बनाम विपक्ष का नहीं होना चाहिए। यह आने वाली पीढ़ियों के पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति से ऊपर उठकर एक संतुलित नीति बनाई जाए, जिसमें वैज्ञानिक तथ्यों, पर्यावरणीय जरूरतों और स्थानीय लोगों के हितों का समन्वय हो। अवैध खनन पर सख्ती, वैकल्पिक आजीविका के साधन, हरित संरक्षण और स्पष्ट कानूनी परिभाषाएं ही अरावली को बचा सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही हो या गलत, यह तय करना कानूनी विशेषज्ञों का काम है। लेकिन इस फैसले ने यह तो स्पष्ट कर दिया है कि अरावली अब केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि राजनीति, पर्यावरण और विकास के बीच टकराव का प्रतीक बन चुकी है। यदि इस टकराव में विवेक और जिम्मेदारी नहीं दिखाई गई, तो नुकसान न तो किसी पार्टी का होगा और न ही किसी अदालत का, बल्कि उस प्रकृति का होगा, जो सदियों से इस देश को जीवन देती आई है।

                *कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*

Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें 

Advertising Space


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे.

Donate Now

लाइव कैलेंडर

February 2026
M T W T F S S
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
232425262728