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राजनैतिक दलों के विभाजन का मुख्य कारण विरासत की  दावेदारी*

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राजनैतिक दलों के विभाजन का मुख्य कारण विरासत की       दावेदारी*

राजनैतिक रंगमंच पर तरह तरह के विचार धारा वाला व्यक्तित्व होता है।कोई व्यक्ति जिस ऐंगल की सोच रखता है,वह सोच पार्टी को नागवार गुजरती है,लेकिन उस व्यक्ति के लिए सही है तो उस व्यक्ति की सोच ही राजकीय दलों में विवाद का कारण बनता है।शरद पवार के पूर्व अनेक पार्टियो में राजकीय युद्ध हुए थे जिसकी लाइव स्टोरी दुनिया ने देखी थी।शरद पवार की एनसीपी 25 वर्ष की पुरानी पार्टी है। चाचा भतीजे के बीच महत्वकांशा बढ़ने से विचारो में अनबन के चलते बिखर गई।दोनों चाचा भतीजे ने एनसीपी पर अपने अपने हक की लड़ाई का सामाधन खोजने चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया।जबकि देश मे यह पहली और आखिरी लड़ाई नही है।एनसीपी के विवाद के पूर्व भी अनेक पार्टियो में घर्षण हुआ है।बिहार में लोकजनशक्ति पार्टी के अधिकार की लड़ाई जून 2021 में सामने आई थी।रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद राजकीय निर्णय पशुपति पारस लेते थे।भाई की मृत्यु के बाद पशुपतिकुमार पारस सक्रिय हुए।पांच सांसदों को पशुपति कुमार पारस ने अपने पक्ष में करके भतीजे चिराग पासवान का तख्ता पलट दिया।पशुपति लोकजनशक्ति पार्टी पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल रहे।भाई की मौत के बाद चाचा ने पार्टी पर कब्जा कर लिया।

इसी कड़ी में उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी के संस्थापक दिवंगत मुलायमसिंह यादव का अपने पुत्र अखिलेश यादव और चाचा शिवपाल के बीच राजकीय लड़ाई में मुलायमसिंह यादव और भाई शिवपाल यादव को पार्टी ने निष्कासित कर दिए गए।अखिलेश विशेष अधिवेशन में पार्टी के रास्ट्रीय अध्यक्ष बन गए।समाजवादी ड्रामा करीब तीन महीने तक चला था।इस पारिवारिक विवाद को दुनिया ने देखा।अखिलेश यादव निंदा के पात्र बने थे।लोगो ने अखिलेश का पारिवारिक दुर्व्यवहार को लेकर आलोचना भी की थी। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल में विभाजन की रेखा खींची गई थी। पार्टी संरक्षक प्रकाशसिंह बादल के भतीजे मनप्रितसिह बादल ने बगावत कर अलग पीपल्स पार्टी ऑफ पंजाब बनाई थी।सत्ता की महत्वकांक्षा थी।मनप्रितसिह 1995 में पहली बार चुनाव जीते थे।दरअसल,2007 में बादल सरकार में मंत्री थे। बादल 2010 में अकाली दल से अलग हो गए।इसके बाद चिंगारी तमिलनाडु पहुँची।तमिलनाडु के पूर्व सीएम और द्रविड़ मुन्नेत्र कजगम डीएमके के मुखिया थे।करुणानिधि की 2018 में मृत्यु के बाद राजकीय विरासत के लिए लड़ाई छिड़ गई थी।इस विवाद में अलागिरी और स्टालिन के बीच बहुत समय तक विवाद छिड़ा रहा।जबकि इस लड़ाई में स्टालिन हमेशा बड़े भाई को दबाने में सफल हुए थे।2014 में दोनों भाइयों के बीच विवाद छिड़ा था। अलागिरि को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

यह विवाद थमने के बाद महारास्ट्र में उद्धव और राज ठाकरे के बीच शिवसेना के हक की लड़ाई शुरू हो गई थी।नतीजतन, बाला साहेब ठाकरे की मृत्यु के बाद दोनों काका भतीजे में बड़ी लड़ाई छिड़ी थी।उत्तराधिकारी की लड़ाई में बहुत समय तक घमासान हुआ था।जोकि बालासाहेब का सिंहासन उद्धव ठाकरे को मिला।शिवसेना से अलग होकर राज ठाकरे ने महारास्ट्र में नवनिर्माण सेना नाम की पार्टी बनाई थी।जबकि इस पार्टी से कार्यकर्ता जुड़ते गए। इस विवाद को दुनिया ने नजर भरके देखा था।उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच लड़ाई को लेकर दुनिया मे चर्चा शुरू हुई थी। इसके बाद प्रादेशिक पार्टी और हरियाणा के चौटाला परिवार में चाचा भतीजे की लड़ाई टॉक ऑफ टाउन बन गई थी।बहुत दिनों तक विरासत की लड़ाई चलती रही थी।देवीलाल चौटाला की मौत के बाद चौटाला परिवार में अविश्वास का वातावरण खड़ा हो गया था।ओमप्रकाश और अजय जेल में गए थे।इंडियन नेशनल लोकदल की कमान अभय चौटाला को सौंपी थी।दुष्यंत चौटाला संसद बने थे।पार्टी में दो भाग पड़ने के बाद एक भाग अजय और दूसरा भाग दुष्यंत चौटाला के नाम रखा था।ग्वालियर पर राज करने वाले सिंधिया परिवार में वैचारिक मतभेद चरम पर था।विजयराज सिंधिया और माधवराज सिंधिया के बीच घरेलू विवाद रास्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बना था।राजमाता और राजकुमार के बीच बहुत विवाद हुआ था।विजयराज की इच्छा रही कि उनका परिवार भाजपा के साथ रहे,लेकिन माधवराज उपरांत ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे।

लालू यादव के दोनों बेटे तेजस्वी और तेजप्रताप में विवाद इतना बढ़ गया था कि दोनों भाई एक दूसरे की शक्ल तक देखने के लिए राजी नही थे।दोनों भाइयों के बीच लालू ने विरासत की इस जंग को सामाधन के तौर पर बीच बचाब कर सुलह कराया था।राजकीय राजनीति में गांधी परिवार के दोनों भाई राहुल और वरुण गांधी में भी राजकीय लड़ाई है।सोनिया और मेनका गांधी के बीच भी दूरिया है।संजीव गांधी की मौत के बाद उनकी वसीयत राजीव के पास रही थी।इंदिरा और मेनका छोटी छोटी बातो में विवाद खड़ा कर देती थी।1992 में मेनका ने पीएम निवास छोड़ दिया था।उसके बाद रास्ट्रीय संजय मंच के नाम से पार्टी बनाई थी।राजीव गांधी की मौत के बाद सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी की सर्वेसर्वा बनी ।समय समय पर राजनीति के मंच पर विवाद और वर्चस्व की लड़ाई के लिए मनमुटाव हुआ है।घर की लड़ाई रास्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के बाद किसी न किसी दिग्गज के सरंक्षण के नेतृत्व में सामाधन भी होता गया और समय के अनुसार गुत्थियां सुलझ भी गई है। शरद पवार की पार्टी एनसीपी में पारिवारिक विवाद का अंत होने के बाद बिहार की राजनीति में हलचल बढ़ने लगी है।जिसका हर एक नेताओ के लिए आफत के बादल मंडराते देखे जा सकते है।
    

                                 कांतिलाल मांडोत

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