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संग्रह की ही नहीं ,सदुपयोग की भी दृष्टि रखिए-जिनेन्द्रमुनि मसा*

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*संग्रह की ही नहीं ,सदुपयोग की भी दृष्टि रखिए-जिनेन्द्रमुनि मसा*
कांतिलाल मांडोत
गोगुन्दा 7 अगस्त
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ उमरणा में आयोजित धर्मसभा में जिनेन्द्रमुनि मसा ने कहा कि जो व्यक्ति या परिवार दुर्व्यसनों से मुक्त रहकर श्रम करता है उसके पास संपत्ति का एकत्री करण होना आश्चर्य की बात नहीं है। किन्तु वह संपति अहंकार प्रदर्शन और अधर्म वृद्धि में प्रयुक्त न हों यह बात धनिक व्यक्तियों को विशेष गहराई से समझना चाहिये । संग्रहित संपत्ति के विषय में धनिक व्यक्तियों का स्वस्थ दृष्टि कोण नहीं होगा तो वह संपत्ति आपको तथा आपकी भावी पीढी को पतन के गर्त में भी डाल देगी। संपति की प्राप्ति के पीछे अनेक कारण रहते हैं। श्रम, पुण्य और सूझबूज तो मुख्य कारण है ही व्यसन मुक्त जीवन जीना भी संपत्ति अर्जन में बहुत सहायक होता है। संत ने कहा संपत्ति के अर्जन में व्यक्ति की ऊर्जा का व्यय होना तो निश्चित है अतः अपना सब कुछ झोंक कर व्यक्ति जो कुछ इकट्ठा कर लेता है उसका तनिक भी दुरुपयोग नहीं होना चाहिये ।
जैन संत ने कहा संपत्ति के संग्रह की भी सीमा हो जाना उचित है। इससे असीम तृष्णा पर अंकुश लग जाएगा । अति संग्रह भी अशान्ति और दुश्चिन्ताओं को जन्म देता है।
अर्जित संपत्ति का सदुपयोग किया जाए तो संपत्ति अर्जन के साथ जुड़ी समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। और आत्म संतोष का लाभ भी मिलेगा । रीतेश मुनि ने कहा कि आपने संग्रह की वृत्ति पर गुरुदेव से व्यक्तव्य सुना।मुनि ने कहा कि
राष्ट्रीय सामाजिक एवं धार्मिक स्तर पर किया गया सद्व्यय संपत्ति का सदुपयोग तो होगा ही किन्तु उसके साथ ही दानदाता को इससे जो सुयश की संपत्ति प्राप्त होती है वह अमूल्य और दुर्लभ होती है।
संत ने कहा संपत्ति के हजारों ढेर इकट्ठे कर लेने वाला भी यदि यशः लक्ष्मी से वंचित है तो वह दरिद्र ही है।सुकीर्ति को भी यशः वैभव कहा है। प्रशंसा का वैभव शुभ कार्य करने से ही तो प्राप्त होगा ।आज समाज और राष्ट्र के अनेक ऐसे क्षेत्र है। जहां धनिकों को उदारता पूर्वक सहयोग करना चाहिये । प्राकृतिक विपदा और आकस्मिक दुर्घटनाओं से हजारों नागरिकों के जीवन संकट में पड़ जाते है, सीमा पर शहीद हुए सैनिकों के पीछे रहे परिजनों की सेवा समाज में गरीबी की चक्की में पिसते स्वधर्मी आदि सभी जगह संपत्ति का सदुपयोग आवश्यक है ।इस पर अपनी आगम वाणी के भाव रखते हुए प्रवीण मुनि ने कहा कि आगम जीवन मे दिव्यता प्रदान करने वाली वाणी है।मरणोपरांत मोक्षदायिनी है।संत ने अपने भाव को रेखांकित करते हुए धर्म की आराधना करने और आगामी दिनों में पर्युषण महापर्व पर तप आराधना कर आत्मा के कल्याण का मार्ग सुगम बनाने का आह्वान किया।प्रभातमुनि मसा ने समाज मे विघटनकारी घटनाओं पर दुःख व्यक्त किया।आज समाज मे मनमुटाव की घटना बढ़ रही है जिससे एक दूसरे में मतभेद पनप रहा है।सबको साथ लेकर चलने वाला ही भगीरथ होता है ।संत ने जप तप करने की उपस्थिति श्रावकों को सीख दी।

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