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संतो की सहस्त्र रश्मि सूर्य की चमचमाती किरणों की तरह स्वयं आलोकित है-गुलाबचंद कटारिया

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संतो की सहस्त्र रश्मि सूर्य की चमचमाती किरणों की तरह स्वयं आलोकित है-गुलाबचंद कटारिया

कांतिलाल मांडोत
उदयपुर 5 मार्च

संत रत्न सदा ही जन जन के लिए वंदनीय और अभिनन्दन रहे है।पुष्कर मुनि,गणेश मुनि और सौभाग्य मुनि का आशीर्वाद हमेशा मुझे मिला है।उनके विराट व्यक्तित्व और अनुपम कृतित्व को शब्दों के संकीर्ण घेरे में आबद्ध करना कठिन ही नही अपितु कठिनतर है।जिनेन्द्र मुनि आदि संतो का दर्शन एवं शुभ आशीर्वाद के लिए पहुंचे पंजाब के महामहिम राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया ने गुरुगणेश धाम सेक्टर 11 में अपने उदबोधन में व्यक्त किये।गुरुगणेश धाम उदयपुर में जिनेन्द्र मुनि मसा,कोमल मुनि मसा एवं घोर तपस्वी प्रवीण मुनि मसा का दर्शन एवं आ अभिवादन करते समय उन्होंने कहा कि इनके आशीर्वाद में हमारी दिनचर्या सामयिक से शुरू होती है।आज भी हम जो कुछ है।उनके आशीर्वाद से है।संत धर्म का मूर्तिमान रूप है।कटारिया ने कहा कि संत धर्म के व्याख्याकार ही नही स्वयं एक व्याख्या है।जिनेन्द्र मुनि काव्यतिर्थ के दर्शन के लिए आए महामहिम कटारिया ने कहा कि इन संतो का जीवन धर्म का जीता जागता स्वरूप है,संत के चरणों का प्रभाव जिधर मुड़ जाता है वहा का जन जीवन धर्म से सरस बन जाता है।मानवता की हरियाली लहलहाने लगती है,साधना के सरस सुमन पुलक उठते है।कटारिया ने अपने उदबोधन में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि संत एक व्यक्ति नही,धर्म का,सदाचार का,सत्य,अहिंसा,विश्वप्रेम और विश्व मानवता का एक पावन प्रतिष्ठान है।संत वंदनीय और अभिनन्दनीय है।अपने परिवार के साथ आये महामहिम ने संत चरणों से आशीर्वाद ग्रहण किया।जिनेन्द्र मुनि ने आशीर्वचन में अपने भाव व्यक्त करते हुए जीवन मे दुगुनी तरक्की कर आगे बढ़ने की शुभकामनाएं दी।कटारिया ने कहा कि जप सामायिक और ध्यान की साधना गुरु परम्परा से ही प्राप्त की है।आज भी नियमित सामायिक और जप साधना की शुरुआत से ही दिनचर्या शुरू करते है।हररोज की शक्ति भी जप साधना से ही प्राप्त करते है।कटारिया ने कहा कि संतो का मानस उदार, विशाल और व्यापक था।वहां संकीर्णता के दायरे नही थे।समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय कार्य करने वाले कार्यकर्ता,जिज्ञासुगण,विचारक सभी संतो के निकट संपर्क में आए और संतो से कुछ लेकर ही गये।हमे भी समय समय पर संतो का आशीर्वाद मिलता ही रहा है।गणेशमुनि शास्त्री और जिनेन्द्र मुनि काव्यतिर्थ के सौजन्यपूर्ण व्यवहार अपने अंतरमन तक प्रभावित होकर ही लौटे है।

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