तप से तन नहीं मन शुद्ध होता है पर्युषण में संस्कारों की सीख*
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*तप से तन नहीं मन शुद्ध होता है पर्युषण में संस्कारों की सीख*
कांतिलाल मांडोत
गोगुंदा 13 सितम्बर
पर्युषण महापर्व के छठे दिन रविवार को श्वेतांबर जैन समाज की ओर से स्थानक में धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। धर्मसभा में सजोड़े सामूहिक नवकार महामंत्र का जाप किया गया। नवकार महामंत्र के सामूहिक जाप से पूरा स्थानक भक्तिमय वातावरण में गूंज उठा। इस अवसर पर महिलाएं पारंपरिक बांधनी परिधान में तथा पुरुष सफेद वस्त्रों और मेवाड़ी पगड़ी में शामिल हुए। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने उपवास, तप, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण, ध्यान और धार्मिक साधना के माध्यम से आत्मचिंतन किया। पर्युषण महापर्व के दौरान नवकार महामंत्र का अखंड जाप भी जारी है।
धर्मसभा में महाश्रमण पूज्य गुरुदेव जिनेंद्र मुनि मसा ने पर्युषण पर्व में तप और तपस्या के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में सच्चे और पक्के संस्कारों का होना जरूरी है। व्यक्ति को अपने से छोटे-बड़े सभी के साथ विनय और सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संस्कार जीवन को दिशा देने का कार्य करते हैं और इनकी शुरुआत परिवार से होती है। संस्कारी माता-पिता के व्यवहार और आचरण का प्रभाव बच्चों पर भी पड़ता है। इसलिए परिवार में ऐसा वातावरण होना चाहिए, जिसमें बच्चों को बचपन से ही विनय, अनुशासन, सेवा और धार्मिक मूल्यों की शिक्षा मिल सके।

मुनि ने भगवान महावीर के सिद्धांतों को जीवन में अपनाने का संदेश देते हुए कहा कि पर्युषण आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन का अवसर है। तपस्या केवल शरीर को कष्ट देने का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं, विकारों और गलत प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने की साधना है। जप, ध्यान और स्वाध्याय के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर झांक सकता है और अपने जीवन में आवश्यक सुधार कर सकता है। पर्युषण के दिनों में किया गया आत्मचिंतन जीवन को संयम और सदाचार की दिशा में ले जाने वाला होना चाहिए।
साध्वी राजश्रीजी ने अंतगढ़ सूत्र के वाचन के दौरान देवकी महारानी, श्रीकृष्ण वासुदेव एवं गज सुकुमाल के जीवन प्रसंगों का वर्णन किया। उन्होंने धार्मिक प्रसंगों के माध्यम से संघ, समाज और परिवार में आपसी समायोजन के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि किसी भी परिवार या समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए केवल अनुशासन पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामने वाले का दिल जीतना भी जरूरी है। प्रेम, सम्मान और विश्वास के आधार पर बनाए गए संबंध अधिक मजबूत होते हैं।
उन्होंने सास-बहू तथा पिता-पुत्र जैसे पारिवारिक रिश्तों का उल्लेख करते हुए कहा कि आपसी समझ, प्रेम, सम्मान और समायोजन से परिवार में सुख और शांति बनी रहती है। छोटी-छोटी बातों को लेकर मन में दूरी पैदा करने के बजाय एक-दूसरे की परिस्थितियों और भावनाओं को समझने का प्रयास करना चाहिए। परिवार में संवाद और सामंजस्य रहेगा तो नई पीढ़ी को भी अच्छे संस्कार प्राप्त होंगे।
साध्वी सुलक्षणाप्रभाजी ने संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मां बच्चे को प्रथम संस्कार देती है। परिवार का वातावरण और माता-पिता का व्यवहार बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि बच्चे जो देखते और अनुभव करते हैं, उसका प्रभाव उनके जीवन पर पड़ता है। इसलिए माता-पिता को अपने आचरण से बच्चों के सामने संस्कार और सद्व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान श्रावक-श्राविकाओं की ओर से तप-तपस्या का क्रम भी जारी है। अनेक धर्मावलंबी अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपवास, जप, तप और धार्मिक साधना में सहभागी बन रहे हैं। कार्यक्रम संयोजक सुंदरलाल मेहता ने धर्मप्रेमियों से अधिक से अधिक संख्या में जप, तप एवं धार्मिक साधना में सहभागिता करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के समापन पर जिनेंद्र मुनि मसा ने मंगल पाठ कराया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहे। इस अवसर पर साध्वी सुलक्षणाजी के सांसारिक परिवार तथा रमेश मेहता एवं दिलीप सिंघवी की ओर से प्रभावना वितरित की गई।
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