उत्तरायण का उत्सव,परंपरा और परिवर्तन का सूर्यपर्व मकर सक्रांति*
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*उत्तरायण का उत्सव,परंपरा और परिवर्तन का सूर्यपर्व मकर सक्रांति*
*भारतीय संस्कृति में मकर सक्रांति का विशेष महत्व*
भारतीय संस्कृति में सूर्य केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि जीवन, ऊर्जा, अनुशासन और चेतना का प्रतीक है। सूर्य उपासना का पर्व मकर संक्रांति इसी गहन सांस्कृतिक दृष्टि का सजीव उदाहरण है। यह पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं देता, बल्कि यह भारतीय जीवन दर्शन में प्रकृति, विज्ञान, अध्यात्म और समाज के सामंजस्य को भी अभिव्यक्त करता है। प्राचीन परंपराओं से लेकर आधुनिक समय तक मकर संक्रांति ने स्वयं को निरंतर ढाला है, फिर भी उसका मूल भाव सूर्य के प्रति कृतज्ञता और सकारात्मकता का उत्सव बना हुआ है।
भारतीय पंचांग में मकर संक्रांति का विशिष्ट स्थान है। अधिकांश पर्व चंद्रमा की गति पर आधारित होते हैं, लेकिन मकर संक्रांति सूर्य की गति से निर्धारित होती है। जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण होता है, तभी यह पर्व मनाया जाता है। यही कारण है कि यह पर्व हर वर्ष लगभग 14 जनवरी को ही आता है। यह खगोलीय घटना भारत जैसे उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित देश के लिए विशेष महत्व रखती है, क्योंकि सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही दिन बड़े होने लगते हैं और तापमान में धीरे-धीरे वृद्धि होती है। ठंड की कठोरता से जूझ रहे जनमानस के लिए यह परिवर्तन आशा और राहत का संदेश लेकर आता है।
प्राचीन भारत में ऋतुओं और खगोलीय घटनाओं का गहरा अध्ययन किया गया था। मकर संक्रांति से जुड़ी परंपराओं के पीछे वैज्ञानिक आधार स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस समय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, इसलिए तिल, गुड़, खिचड़ी जैसे पौष्टिक और ऊष्मा प्रदान करने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन परंपरा में शामिल हुआ। गंगा, संगम और समुद्र में स्नान की परंपरा भी केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि शारीरिक शुद्धि और मानसिक अनुशासन से जुड़ी हुई थी। ठंडे पानी में स्नान को संयम और साहस का प्रतीक माना गया, जो मनुष्य को प्रकृति के साथ सामंजस्य सिखाता है।
पौराणिक कथाओं में मकर संक्रांति का उल्लेख अनेक रूपों में मिलता है। कहा जाता है कि इस दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं। शनि मकर राशि के स्वामी हैं। यह कथा केवल पारिवारिक मिलन का प्रतीक नहीं, बल्कि यह संदेश देती है कि कठोरता, अनुशासन और न्याय के प्रतीक शनि के साथ सूर्य का संतुलन आवश्यक है। इसी दिन भगवान विष्णु द्वारा असुरों के संहार की कथा भी मिलती है, जिसे नकारात्मक शक्तियों पर सकारात्मक ऊर्जा की विजय के रूप में देखा जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपने इच्छामृत्यु के वरदान के कारण सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की और इसी दिन देह त्याग किया। इससे यह धारणा और प्रबल हुई कि उत्तरायण काल शुभ और मोक्षदायी माना जाता है।
अध्यात्म में दक्षिणायन और उत्तरायण केवल दिशा परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना के प्रतीक हैं। दक्षिणायन को अंतर्मुखी साधना और विश्राम का काल माना गया, जबकि उत्तरायण को सक्रियता, सृजन और उत्सव का समय। देवताओं के जागरण और शुभ कार्यों के आरंभ की अवधारणा इसी से जुड़ी है। यही कारण है कि मकर संक्रांति के बाद विवाह, यज्ञ, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। इस पर्व के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया गया कि अंधकार और ठहराव के बाद प्रकाश और गति का स्वागत करना चाहिए
यदि हम पुरानी परंपराओं पर दृष्टि डालें, तो मकर संक्रांति सामूहिकता का पर्व था। गांवों में मेलों का आयोजन होता था, गंगासागर जैसे तीर्थों पर लाखों लोग एकत्र होते थे। दान-पुण्य को विशेष महत्व दिया जाता था। अन्न, वस्त्र और धन का दान समाज में संतुलन और सहकार की भावना को मजबूत करता था। पतंग उड़ाने की परंपरा भी केवल मनोरंजन नहीं थी, बल्कि यह खुले आकाश में सूर्य के संपर्क में रहने और शरीर को सक्रिय रखने का माध्यम थी। खेतों में नई फसल के आगमन पर किसान सूर्य को धन्यवाद देते थे और प्रकृति के साथ अपने संबंध को पुनः स्थापित करते थे।
समय के साथ समाज बदला और मकर संक्रांति की अभिव्यक्ति भी बदली। आज शहरी जीवन में यह पर्व पहले की तरह सामूहिक कृषि उत्सव नहीं रहा, लेकिन इसके स्वरूप में नई परंपराएं जुड़ गई हैं। आधुनिक समय में मकर संक्रांति स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक जागरूकता से भी जुड़ रही है। लोग इस दिन योग, सूर्य नमस्कार और ध्यान को अपनाने लगे हैं। सूर्य को ऊर्जा का स्रोत मानते हुए सौर ऊर्जा के प्रति जागरूकता भी इसी पर्व के आसपास दिखाई देने लगी है। कई स्थानों पर सोलर लैंप, स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जो इस पर्व को नई प्रासंगिकता प्रदान करते हैं।
नई पीढ़ी के लिए मकर संक्रांति केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का माध्यम बन रही है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पतंग उत्सव, पोंगल, लोहड़ी और माघी की झलकियां साझा की जाती हैं। इससे विविधता में एकता का भाव और मजबूत होता है। दक्षिण भारत में पोंगल के रूप में यह पर्व प्रकृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। पंजाब में लोहड़ी अग्नि और सामूहिक नृत्य के माध्यम से जीवन उल्लास को प्रकट करती है। असम में बिहू, गुजरात में उत्तरायण और महाराष्ट्र में तिलगुल की परंपरा यह दर्शाती है कि रूप अलग हैं, लेकिन केंद्र में सूर्य और कृतज्ञता ही है।
हालांकि आधुनिकता के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। पतंग उड़ाने में सिंथेटिक मांझे का उपयोग पर्यावरण और पक्षियों के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। तीर्थ स्थलों पर बढ़ती भीड़ से स्वच्छता और पर्यावरण संतुलन पर असर पड़ता है। ऐसे में नई परंपराओं का दायित्व यह है कि वे मूल भाव को सुरक्षित रखते हुए समय की मांग के अनुसार स्वयं को परिष्कृत करें। पर्यावरण के अनुकूल उत्सव, संयमित आचरण और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ पर्व मनाना आज की आवश्यकता है।
मकर संक्रांति हमें यह भी सिखाती है कि परंपरा और परिवर्तन विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। पुरानी मान्यताओं में छिपे वैज्ञानिक और मानवीय मूल्यों को समझकर यदि हम उन्हें आधुनिक संदर्भ में अपनाएं, तो संस्कृति जीवंत बनी रहती है। सूर्य की उपासना केवल देवत्व की आराधना नहीं, बल्कि उस ऊर्जा का सम्मान है जो जीवन को संभव बनाती है। यह पर्व हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, निष्क्रियता से सक्रियता की ओर और नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर बढ़ने का संदेश देता है।
अंततः मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह सेतु है, जो अतीत की परंपराओं को वर्तमान की चेतना से जोड़ता है और भविष्य की दिशा दिखाता है। सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही जैसे प्रकृति में नया उत्साह आता है, वैसे ही यह पर्व मानव जीवन में आशा, अनुशासन और सामूहिकता का संचार करता है। पुरानी और नई परंपराओं के संगम के रूप में मकर संक्रांति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी वह प्राचीन काल में थी, क्योंकि सूर्य की तरह ही इसका संदेश भी शाश्वत है।

कांतिलाल मांडोत रास्ट्रीय पत्रकार*
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