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*भारत की चुनावी व्यवस्था की अमेरिकी तारीफ से उठे सवाल, ट्रम्प ने दिखाई दुनिया को वोटर आईडी की ताकत*,

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का भारत की चुनावी व्यवस्था और मतदाता पहचान पत्र की व्यवस्था की सार्वजनिक सराहना करना केवल दो देशों की चुनावी प्रणालियों की तुलना भर नहीं है, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी है। भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ समय से व्यापार, टैरिफ और अन्य मुद्दों को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। ऐसे माहौल में ट्रम्प का भारत की वोटर आईडी व्यवस्था का उदाहरण देकर अमेरिका में भी चुनावी पहचान को अधिक सख्त बनाने की वकालत करना अपने आप में महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है।
ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया मंच पर भारत की चुनाव प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि जब भारत में मतदाताओं की पहचान के लिए फोटो पहचान पत्र की व्यवस्था है तो अमेरिका में वैध फोटो आईडी के बिना मतदान की अनुमति क्यों होनी चाहिए। उन्होंने अमेरिकी संसद से ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को पारित करने की अपील करते हुए कहा कि अमेरिकी चुनाव में केवल अमेरिकी नागरिकों को ही मतदान का अधिकार मिलना चाहिए। उनके इस बयान ने एक बार फिर अमेरिका की चुनावी व्यवस्था में मतदाता पहचान और नागरिकता के मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
भारत में मतदाता पहचान पत्र की व्यवस्था कोई अचानक बनाई गई व्यवस्था नहीं है। देश में मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने के लिए फोटो पहचान पत्र की शुरुआत कई चरणों में हुई और बाद में इसे पूरे देश में लागू किया गया। 1990 के दशक में चुनाव आयोग ने मतदाताओं को फोटो पहचान पत्र उपलब्ध कराने की दिशा में तेजी से काम किया। 1994 से देशभर में इलेक्ट्रोरल फोटो आइडेंटिटी कार्ड यानी ईपीआईसी की व्यवस्था शुरू हुई और बाद में यह व्यवस्था देश के अधिकांश मतदाताओं तक पहुंची। डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ ई-ईपीआईसी की सुविधा भी शुरू की गई।
भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में चुनाव कराना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। करोड़ों मतदाता, अलग-अलग भाषाएं, भौगोलिक परिस्थितियां और दूरदराज के क्षेत्रों में मतदान केंद्रों तक पहुंच सुनिश्चित करना भारतीय चुनाव व्यवस्था को दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रियाओं में शामिल करता है। इसके बावजूद चुनाव आयोग लगातार मतदाता सूची, पहचान, मतदान केंद्र और चुनावी प्रक्रिया को व्यवस्थित करने की कोशिश करता रहा है।
भारत में मतदान के लिए मतदाता पहचान पत्र महत्वपूर्ण दस्तावेज है, हालांकि चुनाव आयोग की निर्धारित व्यवस्था के तहत अन्य स्वीकृत पहचान दस्तावेजों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि मतदान करने वाला व्यक्ति वही है, जिसका नाम मतदाता सूची में दर्ज है। पहचान की यह व्यवस्था चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाता की वास्तविक पहचान सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यही वह पहलू है जिसकी ओर ट्रम्प ने अमेरिका के संदर्भ में ध्यान दिलाया है। अमेरिका में चुनाव व्यवस्था भारत से काफी अलग है। वहां चुनाव कराने में राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और मतदाता पहचान से जुड़े नियम भी राज्य के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ राज्यों में फोटो पहचान पत्र की आवश्यकता अधिक सख्त है, जबकि कुछ राज्यों में पहचान के लिए दूसरे तरीके अपनाए जाते हैं। इसी अंतर को लेकर अमेरिका में वर्षों से राजनीतिक बहस चल रही है।
ट्रम्प जिस ‘सेव अमेरिका एक्ट’ की वकालत कर रहे हैं, उसका उद्देश्य अमेरिकी संघीय चुनावों में मतदाता पंजीकरण और मतदान से जुड़े नियमों को सख्त करना है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत मतदाता पंजीकरण के समय अमेरिकी नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देने और मतदान के समय फोटो पहचान पत्र दिखाने जैसी शर्तों को मजबूत करने की बात कही गई है। डाक मतपत्रों से जुड़े नियमों को भी अधिक कड़ा करने का प्रस्ताव है। हालांकि यह अभी कानून नहीं बना है और इसे लेकर अमेरिकी राजनीति में गहरा मतभेद है।
रिपब्लिकन नेताओं और ट्रम्प समर्थकों का तर्क है कि चुनाव में मतदाता की पहचान और नागरिकता की जांच मजबूत होने से चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास बढ़ेगा। उनका मानना है कि मतदान का अधिकार केवल पात्र नागरिकों तक सीमित रहना चाहिए और इसके लिए स्पष्ट पहचान व्यवस्था जरूरी है। दूसरी ओर डेमोक्रेट और इस कानून के विरोधी पक्ष का तर्क है कि अमेरिका में गैर-अमेरिकी नागरिकों का मतदान पहले से ही प्रतिबंधित है। उनका कहना है कि अत्यधिक दस्तावेजी शर्तें उन अमेरिकी नागरिकों के लिए परेशानी पैदा कर सकती हैं, जिनके पास आसानी से उपलब्ध पहचान या नागरिकता संबंधी दस्तावेज नहीं हैं।
यहीं से भारत और अमेरिका की चुनावी व्यवस्था के बीच मूल अंतर भी सामने आता है। भारत में चुनाव आयोग एक केंद्रीय संवैधानिक संस्था के रूप में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की निगरानी करता है, जबकि अमेरिका में चुनावी प्रशासन का बड़ा हिस्सा राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए अमेरिका में एक समान राष्ट्रीय मतदाता पहचान व्यवस्था लागू करना राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर कठिन मुद्दा बना हुआ है।
दुनिया के दूसरे लोकतांत्रिक देशों में भी मतदाता पहचान के अलग-अलग मॉडल देखने को मिलते हैं। ब्रिटेन में कई चुनावों के लिए मतदान केंद्र पर फोटो पहचान पत्र दिखाने की व्यवस्था लागू की गई है, जबकि कनाडा में पहचान और पते को प्रमाणित करने के लिए अलग-अलग विकल्प उपलब्ध हैं। जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया में भी मतदाता पहचान को लेकर भारत से अलग व्यवस्था है। इससे स्पष्ट होता है कि चुनावी पहचान का कोई एक वैश्विक मॉडल नहीं है। हर देश ने अपनी राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुसार प्रणाली विकसित की है।
ऐसे में ट्रम्प का भारत की चुनावी व्यवस्था को उदाहरण बनाना निश्चित रूप से भारत के लिए महत्वपूर्ण है। भारत में चुनाव प्रक्रिया को लेकर समय-समय पर राजनीतिक दलों की ओर से सवाल उठते रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से लेकर मतदाता सूची और चुनाव आयोग की भूमिका तक विपक्षी दल कई मुद्दे उठाते रहे हैं। लोकतंत्र में सवाल उठाना और संस्थाओं से जवाब मांगना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि राजनीतिक बहस तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित हो।
ट्रम्प के बयान ने भारत में इसी राजनीतिक बहस को एक नया संदर्भ दे दिया है। जिस समय भारत में कुछ राजनीतिक दल चुनावी प्रक्रिया और ईवीएम को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं, उसी समय दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक अमेरिका का राष्ट्रपति भारतीय मतदाता पहचान व्यवस्था का उदाहरण देकर अपने देश में चुनाव सुधार की मांग कर रहा है। यह स्थिति निश्चित रूप से विचार करने योग्य है।
हालांकि भारत में चुनाव व्यवस्था की आलोचना करने वाले सभी सवालों को केवल ट्रम्प के बयान के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में चुनाव आयोग सहित सभी संस्थाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर चर्चा आवश्यक है। लेकिन राजनीतिक दलों को यह भी समझना चाहिए कि किसी व्यवस्था की आलोचना और उसकी विश्वसनीयता पर बिना पर्याप्त प्रमाण के लगातार संदेह पैदा करना दो अलग बातें हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं में सुधार की मांग हो सकती है, लेकिन संस्थाओं के प्रति जनता का भरोसा कमजोर करना लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता।
भारत की चुनाव व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता उसका विशाल पैमाना है। करोड़ों मतदाताओं को एक चुनावी प्रक्रिया में शामिल करना, दूरदराज के इलाकों तक मतदान केंद्र पहुंचाना, मतदाता सूची तैयार करना और पहचान सुनिश्चित करना आसान काम नहीं है। इस व्यवस्था को लगातार बेहतर बनाने की जरूरत जरूर है, लेकिन इसकी उपलब्धियों को भी स्वीकार किया जाना चाहिए।
टैरिफ और व्यापार जैसे मुद्दों पर भारत के प्रति ट्रम्प का रुख हाल के दिनों में काफी सख्त दिखाई दिया है। इसके बावजूद जब भारत की चुनावी व्यवस्था की बात आई तो उन्होंने खुले तौर पर उसकी एक महत्वपूर्ण व्यवस्था को अमेरिकी चुनाव सुधार के लिए उदाहरण बनाया। यही बात इस बयान को खास बनाती है। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन किसी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो अच्छी बात दिखाई देती है, उसकी सराहना करना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक संदेश देता है।
भारत के विदेश मंत्रालय ने भी ट्रम्प के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय चुनाव व्यवस्था की मजबूती और पारदर्शिता का उल्लेख किया। दूसरी ओर कांग्रेस ने ट्रम्प की टिप्पणी पर राजनीतिक तंज कसा। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की प्रतिक्रिया से साफ है कि भारत की चुनाव व्यवस्था को लेकर घरेलू राजनीतिक विवाद अभी समाप्त होने वाला नहीं है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से एक बड़ा सवाल जरूर सामने आता है कि क्या भारत को अपनी चुनावी व्यवस्था की उपलब्धियों को लेकर आत्मविश्वास दिखाने का समय आ गया है। यदि दुनिया के प्रभावशाली नेता भारत की मतदाता पहचान व्यवस्था को अपने देश में चुनाव सुधार के संदर्भ में उदाहरण के तौर पर देखते हैं, तो भारत को भी अपनी चुनावी संस्थाओं की मजबूती और कमियों दोनों पर संतुलित दृष्टिकोण रखना चाहिए।
बैलेट पेपर या ईवीएम को लेकर राजनीतिक बहस अपनी जगह हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत मतदाता के अधिकार, स्वतंत्र मतदान, पारदर्शी प्रक्रिया और मजबूत संस्थाओं में होती है। भारत ने मतदाता पहचान की दिशा में जो व्यवस्था विकसित की है, वह निश्चित रूप से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
ट्रम्प की टिप्पणी को न तो भारत के लिए किसी प्रमाणपत्र के रूप में देखने की जरूरत है और न ही इसे राजनीतिक हथियार बनाने की। इसका सबसे सकारात्मक संदेश यही है कि भारत की चुनावी व्यवस्था में ऐसी कई व्यवस्थाएं हैं, जिन्हें दुनिया के दूसरे लोकतंत्र भी अपने संदर्भ में उपयोगी मान सकते हैं। भारत को अपनी चुनाव प्रणाली पर गर्व करने के साथ उसमें लगातार सुधार की प्रक्रिया भी जारी रखनी चाहिए।
आखिरकार लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है, बल्कि मतदाता के विश्वास को बनाए रखने का नाम है। पहचान की स्पष्ट व्यवस्था, Yपारदर्शी मतदाता सूची, निष्पक्ष चुनाव संचालन और मजबूत चुनावी संस्थाएं इस विश्वास की नींव हैं। ट्रम्प ने भारतीय वोटर आईडी व्यवस्था की जिस तरह खुले मंच से सराहना की है, वह भारत के लिए अपनी चुनावी प्रणाली की उपलब्धियों को दुनिया के सामने रखने का एक अवसर भी है। साथ ही यह घरेलू राजनीतिक दलों के लिए भी संदेश है कि चुनावी सुधार की बहस आरोपों से नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों, प्रमाणों और रचनात्मक सुझावों से आगे बढ़नी चाहिए।

       *कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*

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