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आज की शिक्षा प्रणाली में सुधार की अपेक्षा-जिनेन्द्रमुनि म.सा*

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*आज की शिक्षा प्रणाली में सुधार की अपेक्षा-जिनेन्द्रमुनि म.सा*
कांतिलाल मांडोत
गोगुन्दा 3 दिसम्बर
शिक्षा एक बहुत बड़ी चीज है।यह जीवन मे एक नई चमक ला लेती है।मानव की सोई हुई शक्ति को जगाने वाली शिक्षा ही है।शिक्षण का सही अर्थ मानव बनाने का है।जिस शिक्षा में मानव में मानवता जागृत न हो अथवा पशुता के संस्कार समाप्त न हो,उस शिक्षा का कोई महत्व नही है।वर्तमान में जो शिक्षा पद्धति है,वह समीचीन नही है।आज इस बात की आवश्यकता है कि शिक्षा का,ज्ञान का स्वरूप सम्यक हो एवं वातावरण में व्याप्त अराजकता के उन्मूलन के लिए जागरुकता पूर्वक हो।उपरोक्त विचार जिनेन्द्रमुनि म.सा ने कड़िया के सौभाग्य तीर्थधाम में व्यक्त किये।मुनि ने कहा यह कटु सत्य है कि आज की शिक्षा प्रणाली सम्यक नही है।कहा हमारा ज्योतिर्मय अतीत एवं कहा अंधकारमय वर्तमान?यदि यही स्थिति रही तो भविष्य को घूमिल और अंधकारमय ही समझना चाहिए।जब हम अपने अतीत की और दृष्टिपात करते है तो मन गर्व से अभिभूत हो उठता है।बड़ो के प्रति विनय रखो, छोटो को स्नेह दो,किसी का दिल मत दुखाओ, जुठ मत बोलो,हिंसा से बचो।अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिए किसी का शोषण मत करो।इस शिक्षा के आधार पर व्यक्तित्व का निर्माण होता था और आज?आज की नाजुक स्थिति के सम्बंध में कुछ अधिक कहने की आवश्यकता नही है।हाथ कंगन को आरसी की जरूरत नही हुआ करती।जो कुछ है,सब आपके सामने है।कुते ,बिल्लियां और चूहों से प्रारम्भ होने वाली शिक्षा भला किस तरह से व्यक्ति के भीतर सुसंस्कारो के बिजो का वेपन कर रही है।सी ए टी कैट और डीओजी डॉग से आज के बालक की प्राइमरी शिक्षा प्रारम्भ होती है।कुते और बिल्ली को रटने वाले बालक कुते और बिल्ली के ही तो संस्कार आएंगे।पुराने जमाने मे स्कुल में शिक्षकगण हमे ग की पहचान गणेश से करवाते थे।आज स्थिति ही बदल गई है।आज ग से गणेश की नही अपितु बालक को ग से गधे का बोध कराया जाता है।पाश्चात्य शिक्षा का यह यह प्रभाव हुआ है कि न हम पूरे अंग्रेज बन पाये औऱ न पूरे भारतीय ही रह पाये।हमारा चित बन गया यूरोपियन औऱ देह रह गई भारतीय।शरीर भारतीय है क्योंकि उसे आज गोरा नही बाना पाये ।मुनि ने कहा संस्कारहीनता एव उच्छ्रंखलता के कारण आज परिवार,समाज औऱ राष्ट्र का जो अंतर ह्दय है,वह अत्यंत आंदोलित एवं उद्देलित है ।आज का जो दौर चल रहा है ,वह अत्यंत भयावह है।विकृतियों की पुष्टि से जीवन मूल्यों का तेजी से जो क्षरण हो रहा है।उसकी रोकथाम के लिए हम सबको आगे आना होगा।संत ने कहा शिक्षा का उदेश्य केवल पेटपूर्ती अथवा रोजगार मात्र नही है।शिक्षा वही शिक्षा है जो सुधार की समग्र दिशाओं को प्रशस्त करती है।हमे वही शिक्षा आत्मसात करनी है जिसे स्व पर हित सम्यक प्रकार से सम्पादित हो।मुनि ने कहा शिक्षकों का दायित्व भी कम महत्वपूर्ण नही है।शिक्षक का पद बहुत ही गरिमामय पद है।शिक्षा के नाम पर कभी भी बालक को कुसंस्कार देने की भूल न करे।मुनि ने कहा यह ऐसी भूल है जो चिरकाल तक कदम कदम पर शूल का कार्य करके चुभन देती है।

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