डॉक्टरों की सुरक्षा से समझौता नहीं, अस्पतालों में हिंसा पर लगे निर्णायक लगाम*
|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
डॉक्टर इज नैक्स्ट टू गॉड
*डॉक्टरों की सुरक्षा से समझौता नहीं, अस्पतालों में हिंसा पर लगे निर्णायक लगाम*
देश में डॉक्टर को अक्सर भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है। यह केवल एक भावनात्मक उपमा नहीं, बल्कि उस भरोसे का प्रतीक है जिसके सहारे कोई व्यक्ति अपने जीवन और अपने परिवार के सदस्य का जीवन चिकित्सक के हाथों में सौंप देता है। बीमारी, दुर्घटना या किसी गंभीर संकट की स्थिति में परिवार का सबसे पहला सहारा अस्पताल और डॉक्टर ही होते हैं। उस समय मरीज और उसके परिजन डॉक्टर से उम्मीद करते हैं कि वह हर संभव प्रयास करके जीवन बचाएगा। ऐसे में उसी डॉक्टर के साथ अस्पताल के भीतर मारपीट, गाली-गलौज या धमकी की घटना केवल एक व्यक्ति के सम्मान पर हमला नहीं, बल्कि पूरे चिकित्सा तंत्र की गरिमा और समाज के भरोसे पर चोट है।
ठाणे के नगर अस्पताल में डॉक्टरों से मारपीट के मामले में सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी इसी गंभीर सवाल को सामने रखती है। बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा ट्रायल कोर्ट से दी गई जमानत पर रोक लगाने और मामले का स्वतः संज्ञान लेने के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय ने उचित ठहराया है। शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे समेत आरोपियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया कि अस्पताल में घुसकर डॉक्टरों पर हमला करने जैसी घटनाओं को सामान्य विवाद मानकर नहीं देखा जा सकता। पीठ ने इस बात को भी गंभीरता से लिया कि घटना में एक महिला डॉक्टर भी मौजूद थीं और मारपीट का वीडियो सामने आया था। न्यायालय का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संदेश देता है कि अस्पताल हिंसा के लिए कोई खुला मैदान नहीं हो सकता और कानून के सामने राजनीतिक पहचान अथवा सामाजिक प्रभाव की कोई विशेष ढाल नहीं होनी चाहिए।
दरअसल, डॉक्टरों पर हमले की घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं हैं। यह उस सामाजिक मानसिकता का परिणाम भी हैं जिसमें कई बार मरीज की हालत बिगड़ने या उपचार में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने पर गुस्सा डॉक्टर के खिलाफ मोड़ दिया जाता है। परिवार का दुख और चिंता स्वाभाविक है। किसी अपने को गंभीर स्थिति में देखकर व्यक्ति विचलित हो सकता है। लेकिन भावनात्मक आक्रोश को हिंसा में बदलने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती। बीमारी हमेशा डॉक्टर की गलती नहीं होती और हर चिकित्सा प्रक्रिया का परिणाम मरीज या उसके परिजनों की इच्छा के अनुरूप हो, यह भी संभव नहीं है। चिकित्सा विज्ञान संभावनाओं और जटिलताओं के बीच काम करता है। इस वास्तविकता को समझे बिना डॉक्टर को हर असफलता का जिम्मेदार ठहराना खतरनाक प्रवृत्ति है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि अस्पताल जैसी जगह, जहां व्यक्ति सुरक्षा और उपचार की उम्मीद लेकर पहुंचता है, वहां डॉक्टर स्वयं असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। यदि चिकित्सक को यह भय रहने लगे कि किसी मरीज के परिजन या भीड़ इलाज के परिणाम से नाराज होकर उस पर हमला कर सकती है, तो इसका सीधा असर चिकित्सा व्यवस्था पर पड़ेगा। डॉक्टर निर्णय लेने में हिचकेंगे, तनाव बढ़ेगा और कई बार कठिन परिस्थितियों में जरूरी चिकित्सकीय फैसले लेने का साहस भी प्रभावित हो सकता है। इसका नुकसान अंततः मरीज को ही होगा।
इसलिए डॉक्टरों की सुरक्षा को किसी पेशेवर समूह की विशेष मांग समझना भूल होगी। यह सीधे-सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रश्न है। जिस देश में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने की बात हो रही है, वहां चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। अस्पतालों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था, संवेदनशील मामलों में प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, शिकायतों के लिए प्रभावी व्यवस्था और हिंसा की स्थिति में तत्काल कानूनी कार्रवाई आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष कानून के शासन से जुड़ा है। लोकतंत्र में कोई व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं हो सकता। जनप्रतिनिधि होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी को अस्पताल में जाकर डॉक्टर से दुर्व्यवहार या मारपीट करने का अधिकार मिल जाता है। यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि ही कानून को अपने प्रभाव की सीमा में समझने लगे तो आम नागरिक से कानून के सम्मान की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? जनप्रतिनिधियों पर तो सामान्य नागरिक की तुलना में अधिक जिम्मेदारी होती है, क्योंकि उनका आचरण समाज के लिए उदाहरण बनता है।
यह भी जरूरी है कि राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के व्यवहार को लेकर स्पष्ट आचारसंहिता तय करें। अस्पताल में हिंसा करने वाला व्यक्ति किसी दल का समर्थक हो, पदाधिकारी हो या निर्वाचित प्रतिनिधि, उसके खिलाफ कार्रवाई केवल इसलिए कमजोर नहीं पड़नी चाहिए कि उसके पीछे राजनीतिक पहचान है। राजनीति का उद्देश्य समाज में व्यवस्था और विश्वास कायम करना है, न कि किसी व्यक्ति को कानून से बचाने का माध्यम बनना।
डॉक्टरों के साथ होने वाली बदसलूकी का एक कारण अस्पतालों में संवाद की कमी भी है। गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीज के परिजन स्वाभाविक रूप से कई सवाल पूछते हैं। उन्हें उपचार, बीमारी की गंभीरता, संभावित जोखिम और आगे की प्रक्रिया के बारे में पर्याप्त जानकारी न मिले तो बेचैनी और असंतोष बढ़ सकता है। अस्पताल प्रशासन को मरीजों और परिजनों के साथ संवाद की ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे शिकायतों को हिंसा का रूप लेने से पहले ही रोका जा सके। लेकिन संवाद की व्यवस्था का अर्थ यह कतई नहीं कि हिंसा को सहन किया जाए। शिकायत का अधिकार हर व्यक्ति को है, हिंसा का अधिकार किसी को नहीं।
महिला डॉक्टर के साथ हुई मारपीट इस मामले को और गंभीर बनाती है। कार्यस्थल पर किसी महिला चिकित्सक को धमकाना या उसके साथ हिंसक व्यवहार करना सभ्य समाज के लिए बेहद चिंताजनक है। चिकित्सा क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है और अस्पतालों में बड़ी संख्या में महिला डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मी सेवाएं दे रहे हैं। यदि वे अपने कार्यस्थल पर सुरक्षित नहीं हैं तो यह केवल स्वास्थ्य क्षेत्र ही नहीं, बल्कि महिलाओं की कार्यस्थल सुरक्षा का भी सवाल है।
अस्पतालों में हिंसा को रोकने के लिए केवल घटना के बाद गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है। व्यवस्था को इस तरह बनाया जाना चाहिए कि हिंसा की नौबत ही न आए। अस्पतालों में प्रवेश और सुरक्षा प्रबंधन बेहतर हो, संवेदनशील वार्डों में निगरानी हो, विवाद की स्थिति में तत्काल हस्तक्षेप के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध हों और किसी भी हमले की सूचना पर पुलिस तेजी से कार्रवाई करे। साथ ही चिकित्सा संस्थानों में शिकायत निवारण की पारदर्शी प्रणाली होनी चाहिए ताकि वास्तविक लापरवाही के आरोपों की निष्पक्ष जांच भी हो सके।
यहां डॉक्टरों की जवाबदेही का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डॉक्टर कानून से ऊपर नहीं हैं। यदि किसी चिकित्सक की लापरवाही साबित होती है तो उसके खिलाफ निर्धारित कानूनी और पेशेवर प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जवाबदेही और हिंसा दो अलग-अलग चीजें हैं। चिकित्सा संबंधी शिकायत का समाधान कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए, हाथ उठाकर नहीं। किसी डॉक्टर की गलती का आरोप लगाकर अस्पताल में भीड़ जुटाना या मारपीट करना न्याय व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकता।
राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि अस्पतालों में होने वाली हिंसा कई बार स्थानीय प्रभाव और दबाव से जुड़ जाती है। यदि प्रभावशाली लोगों को यह विश्वास हो जाए कि वे अपने पद या राजनीतिक संपर्क के बल पर किसी चिकित्सक को धमका सकते हैं और बाद में आसानी से राहत पा सकते हैं, तो कानून का भय समाप्त हो जाएगा। यही वह स्थिति है जिससे न्यायपालिका की कठोर टिप्पणियां व्यवस्था को सचेत करती हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। न्यायालय ने केवल एक मामले में जमानत के प्रश्न पर विचार नहीं किया, बल्कि यह संकेत दिया है कि डॉक्टरों पर हमले को हल्की घटना की तरह नहीं लिया जा सकता। अस्पताल में घुसकर हिंसा करना समाज के उस भरोसे को तोड़ता है जिसके आधार पर स्वास्थ्य व्यवस्था चलती है। न्यायालय का संदेश साफ है कि इलाज करने वाले हाथों को सुरक्षा चाहिए, भय नहीं।
समाज को भी यह समझना होगा कि डॉक्टर कोई चमत्कार करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में अपनी विशेषज्ञता और अनुभव के आधार पर मरीज का उपचार करने वाला पेशेवर है। कई बार पूरी कोशिश के बावजूद मरीज को बचाना संभव नहीं होता। दुख और निराशा की उस घड़ी में डॉक्टर को दोषी ठहराना आसान लग सकता है, लेकिन हिंसा समस्या का समाधान नहीं है। इसके बजाय अस्पताल प्रशासन से जानकारी मांगी जाए, मेडिकल रिकॉर्ड देखा जाए और जरूरत पड़ने पर कानूनी रास्ता अपनाया जाए।
आज आवश्यकता ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें डॉक्टर निर्भय होकर अपना काम कर सकें और मरीज भी सम्मान तथा सुरक्षा के साथ इलाज करा सके। डॉक्टर और मरीज एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही चिकित्सा व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं। इनके बीच विश्वास जितना मजबूत होगा, स्वास्थ्य व्यवस्था उतनी ही बेहतर होगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख इसलिए स्वागतयोग्य है कि इससे एक स्पष्ट सामाजिक और कानूनी संदेश जाता है कि अस्पताल हिंसा का स्थान नहीं है। किसी डॉक्टर को धमकाना, अपमानित करना या उस पर हाथ उठाना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता। कानून के सामने आम नागरिक हो या राजनीतिक पद पर बैठा व्यक्ति, सभी की जवाबदेही समान होनी चाहिए। लोकतंत्र की असली ताकत इसी में है कि प्रभावशाली व्यक्ति भी कानून के सामने उतना ही उत्तरदायी हो जितना कोई सामान्य नागरिक।
डॉक्टरों की सुरक्षा केवल डॉक्टरों की सुरक्षा नहीं है। यह उस हर परिवार की सुरक्षा है जिसे कभी न कभी अस्पताल के दरवाजे पर उम्मीद लेकर पहुंचना पड़ता है। जिस दिन समाज यह बात पूरी तरह समझ लेगा, उस दिन डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप कहने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी; उसके सम्मान और सुरक्षा को एक जिम्मेदार समाज का सामान्य कर्तव्य मान लिया जाएगा।
*कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space






