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त्याग एवं संयम का पथ कठिन एवं लम्बा है-जिनेन्द्रमुनि मसा

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त्याग एवं संयम का पथ कठिन एवं लम्बा है-जिनेन्द्रमुनि मसा
14 जुलाई को सायरा के उमरना में चातुर्मास प्रवेश कार्यक्रम
कांतिलाल मांडोत
गोगुन्दा 10 जुलाई
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावकसंघ तरपाल में जसवंतगढ से उमरना चातुर्मास के लिए पधारे जैन मुनि आदि ठाना तीन ने तरपाल श्रावक श्राविकाओं को सम्बोधित करते हुए जैन संत जिनेन्द्रमुनि म सा ने कहा कि संयम की राह कठिन है।जब तक साधक में आनन्द की अनुभूति न हो,तब तक वह नीरस लगता है।तरपाल वेनिचन्द बम्बोरी के निवास स्थान पर विश्राम कर रहे जैन संत जिनेन्द्रमुनि म सा ,रितेश मुनि म सा एवं प्रभातमुनि म सा के दर्शन के लिए आसपास से लोगो का आवागमन हुआ।
जिनेन्द्रमुनि ने कहा कि साधनाजन्य फल को उपलब्धि या अनुभूति न हो तब तक मन में ऊब सी आने लगती है, और नया साधक, कभी-कभी पुराना साधक भी, इससे उकता जाता है खिन्न हो जाता है, और मन संशय से डाँवाडोल हो उठता है। या किसी कामना से अभिभूत हुआ चंचल भी हो जाता है। साधक साधना, त्यागः संयम सब कुछ छोड़कर भौतिक सुखों के प्रति आकषित हो, उन्हें प्राप्त करने को प्रयत्नशील भी हो जाता है।
संत ने कहा कि साधक के जीवन में ऐसी स्थिति अनहोनी नहीं है। प्राचीनकाल में भगवान महावीर के समय में भी ऐसी घटनाएँ हुई हैं, आज भी हो रही हैं और जब तक व्रत या दीक्षाएँ होती रहेंगी. व्रत-त्याग की घटनाएं भी घटित होती जायेंगी।
ऐसी घटनाएँ दुर्घटनाएँ न बनें, समाज व व्यक्ति के जीवन में कलंक न बने. इसलिए यह जरूरी है कि साधक स्वयं जीवन में जागृत तथा प्रबुद्ध रहे। गुरु भी, शिक्षक, उद्बोधक या अभिभावक भी उसकी मानसिकता को परिवर्तित करे। अवरोध नहीं, बोध देने का प्रयास करे। अवरोध या प्रतिरोध में विरोध-विद्रोह की संभावना रहती है, जबकि बोध में शोध की संभावना छिपी होती है।
अनेक श्रावक एवम साधक के मन खिन्न व चंचल हो उठने पर भगवान महावीर ने उसे दुत्कारा नहीं किन्तु उसकी आत्म-स्मृतियाँ जगाने का प्रयास किया निमित्त भले ही पूर्वजन्म की घटना बनी। कभी भावी जीवन की वास्तविकता भी इस बोध-जागृति में सहायक बनती है। आत्म-बोध, स्वरूप-चिन्तन या भावो जीवन पर विवेक करने के लिए अठारह पद दिए है।

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