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युग प्रधान स्वामी विवेकानंद ने भारत की सनातन और पुरातन विशिष्टता को जन जन तक पहुंचाया*

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विवेकानंद की जन्म जयंती 12-जनवरी पर विशेष
*युग प्रधान स्वामी विवेकानंद ने भारत की सनातन और पुरातन विशिष्टता को जन जन तक पहुंचाया*
आकाश में सात नक्षत्र हैं लोग कहते है कि वे सात ऋषि है।एक बार एक नन्हा बालक वहां पहुंच गया. बड़ा प्यारा बालक था, मगर सप्तर्षियों की आंखे बंद होने के कारण उस बालक को किसी ने नहीं देखा. नन्हा बालक उनमें से एक ऋषि के पास इस तरह दौड़कर पहुंचा जैसे वह उन्हें जानता हो. बड़े प्यार से उसने ऋषि की गर्दन में अपनी बांहे डाल दी। काफी देर बाद ऋषि ने आख खोली और बालक को देखा ऐसा लगा जैसे वे बालक को देखकर काफी खुश हैं।नन्हें बालक ने ऋषि से कहा कि मैं जा रहा हूं. आप को भी मेरे साथ आना होगा। ऋषि बालक के प्यार भरे आग्रह को टाल न सके और साथ चलने के लिए तैयार हो गए। ऐसा दर्शन संतप्रबर, देव मानव श्री रामकृष्ण को हुआ था। उन्होंने बतलाया था कि यही बालक आगे चलकर विवेकानंद के नाम से चर्चित होगा।महान आत्माएं समय-समय पर जन्म लेती हैं। वे लोगों को जीवन का मर्म बताती हैं।

इसी कड़ी में स्वामी विवेकानंद का भी जन्म हुआ। कलकत्ता जैसे बड़े महानगर में भुवनेश्वरी देवी नित्य ही शिवाराधना करती थीं। वे भगवान शिव से प्रार्थना करती थीं कि हे प्रभु मेरी गोद में एक पुत्र देने की कृपा करें’ उनके एक रिश्तेदार ने वाराणसी के वीरेश्वर शिव की पूजा करने को कहा। उन्होंने वीरेश्वर शिव की आराधना शुरू की।अंततः शिव की कृपा हुई और जाड़े के अंतिम माह की 12 जनवरी सन् 1863 ई. को एक स्वस्थ और सुंदर बालक का जन्म हुआ। इस बालक के पिता प्रसिद्ध वकील विश्वनाथ दत्त थे। वे पारिवारिक रूप से काफी संपन्न थे। पिता विश्वनाथ और माता भुवनेश्वरी ने बालक को वीरेश्वर शिव का प्रसाद मानकर इनका नाम भी वीरेश्वर रखा।परंतु थोड़ा बड़ा नाम होने के कारण बच्चे मित्रता और प्यारवश में इन्हें ‘बिले’ कहने लगे।बिले बचपन में बहुत नटखट और जिद्दी किस्म के थे। जब उनकी शरारत काफी बढ़ जाती थी तो उनकी मां कहती- ‘बिले, यदि तुम यही करते रहे तो शिवजी तुम्हें कैलाश नहीं आने देंगे। यह सुनते ही बिले शांत हो जाता।’बालक बिले बचपन से ही बड़े दयालु और दानी थे। कभी कोई दुखिया उनके सामने हाथ फैलाता तो वह जो भी पाते उसे दे देते।उनके स्वभाव से ऊब कर एक दिन मां ने उन्हें ऊपर के कमरे में बंद कर दिया।तुरंत ही उन्हें एक भिखारी की टेर सुनायी दी। बालक बिले से रहा नहीं गया और उन्होंने पास पड़े संदूक में रखे कपड़े,शाल तथा कंबल आदि खिड़की से भिखारी के ऊपर फेंक दिया।

विद्यालय जाने से पहले ही बालक बिले ने घर पर ही रामायण और महाभारत की कहानियां कंठस्थ कर ली।सात वर्ष की उम्र में इन्हें नगरपालिका स्कूल में दाखिला मिला।बिले पढ़ने में इतने तेज थे कि इन्हें कोई पाठ दोबारा नहीं पढ़ना पड़ता था। बिले को पढ़ाई के साथ ही साथ खेल भी अत्यंत प्रिय थे। बिले बचपन से सत्यवादी भी थे।
जब बिले बड़े हो गए तो वह नरेंद्रनाथ कहे जाने लगे. परंतु उनके अधिकांश मित्र उन्हें नरेन ही कहते थे. नरेंद्र ने सन् 1880 ई. में कॉलेज में प्रवेश लिया। सत्रह वर्ष की उम्र में ही कॉलेज में पढ़ने वाले नरेन को ईश्वर पर अटूट विश्वास था।

वह हमेशा सोचते कि- ईश्वर कौन है? वह कहां है ? क्या हम ईश्वर से मिल सकते हैं? इसके लिए वह बहुधा ध्यान में डूबे रहते थे।वह हमेशा ऐसे गुरु की तलाश में रहते जिसने ईश्वर को देखा हो. इसी ऊहापोह के बीच एक दिन उन्हें रामकृष्ण के दर्शन हुए, उन्हें लगा कि यही हमारे सच्चे गुरु हैं। एक दिन उन्होंने सबकुछ छोड़कर रामकृष्ण से पूछा- क्या आपने ईश्वर को देखा है? ‘रामकृष्ण ने सहज भाव से बताया कि हां मैंने ईश्वर को देखा है और तुम्हें भी दिखा सकता हूं. नरेंद्र को विश्वास हो गया कि सच्चा गुरु मिल गया। फिर क्या था। नरेंद्र देखते ही देखते स्वामी विवेकानंद बन गए क्योंकि दीक्षा लेने के बाद साधुओं को अपना नाम बदलना पड़ता है।यहीं शुरू होता है स्वामी जी का आध्यात्मिक सफर।उन्होंने भारत को करीब से जानने के लिए भारत भ्रमण किया।अपनी यात्रा के अंत में वह कन्याकुमारी पहुंचे और वहां परकन्याकुमारी देवी के दर्शन किए। यहीं से उन्हें राह मिल गयी।स्वामीजी को अपनी मातृभूमि से बहुत प्यार था। भारतीयों की हीन दशा को देखकर उन्होंने प्रतिज्ञा की, कि मैं पश्चिम का सारा विज्ञान भारत में लाऊंगाऔर एक स्वावलंबी और सशक्त भारत का निर्माण करूंगा।इसी समय शिकागो में एक नुमाइश चल रही थी। इसी नुमाइश का एक अंग ‘सर्व धर्म महासभा’का आयोजन भी था। स्वामी इस आयोजन में भाग लेने के लिए चल पड़े। वह हांगकांग, चीन और जापानके अनेक बंदरगाहों से होते हुए कनाडा पहुंचे। यहांसे वे शिकागो गए। वहां एक बार उन्हें तब निराशा हुई जब वहां के लोगों ने बताया कि वक्ताओं के नामनिश्चित हो चुके हैं। शिकागो शहर काफी महंगा था और सम्मेलन में दो माह बाकी थे।अतः वह वहां से बोस्टन चले आए।यहां भी इन्हें बड़ी दिक्कतें हुई, परंतु ईश्वर पर भरोसा होने के कारण इन्होंने साहस नहीं छोड़ा। अंततः बोस्टन में इनकी मुलाकात प्रो.जॉन हेनरी राइट से हुई और शीघ्र ही यह मुलाकात दोस्ती में बदल गई. उन्हीं की मदद से इन्हें सम्मेलन में बोलने का मौका मिला। धर्म महासभा की बैठक19 सितंबर 1893 से शुरू हुई. यह सभा कोलम्बस हॉल में आयोजित थी। लगभग 60 वक्ता और हजार अमेरिकी नागरिकों से हॉल खचाखच भरा था।स्वामी जी तनिक भयभीत थे क्योंकि पहली बार इतने विशाल जनसमूह में बोलना था फिर भी अपना नंबर पर वह खड़े हुए एक कदम आगे बढ़े और बोलना शुरू किया जैसे ही उन्होंने कहा- अमेरिकी भाईयों एवं बहनों! पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहटसे गूंज उठा। वह इस बात से खुश थे कि पहली बारकिसी वक्ता ने उनको अपना माना और आत्मीयता दिखाई।गेरुए वस्त्र और दैदीप्यमान चेहरे वाले स्वामी जो ने अपने संबोधन से ही वहां के लोगो को मंत्र मुग्ध यहां कर अपना बना लिया।उन्होंने अपने धर्म के विषय में हुई कहा कि हमारा धर्म दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धर्म इसलिए नाम है, क्योंकि यह सभी धमों से प्यार करता है। अपने इस छोटे से भाषण से वह जगत प्रसिद्ध हो गए।यहां से वे हां से लौटकर इंग्लैंड भी गए वहां भी उनका भव्य स्वागत हुई हुआ। इस तरह इंग्लैंड और यूरोप होते हुए वे भारत वापस लौटे। उन्होंने भारत को शक्तिशाली बनने का संदेश दिया भारत के विभिन्न भागों में भ्रमण कर इन्होंने सम्मेलन नवीन भारत के लिए अपने दर्शन का प्रचार-प्रसार बैठक किया इनके शिष्यों ने अनेक संस्थाएं और मठ लम्बस स्थापित किए और इन्होंने नर-नारायण की सेवा का आदेश दिया। एक बार वे अमेरिका के विशेष आग्रह पर पुनः अमेरिका गए परंतु वहां से लौटने बाद इतने अपने बेलूर के मठ में विश्राम के लिए चले गए. और नंबर यहीं पर 4 जुलाई 1902 ई. को महासमाधि में विलीन हो गए परतु आज भी उनका दर्शन भारतीयों में जोकि अमेरिकी है।उनके दृढ विचारों का उदाहरणहै।अत: स्वामी जी के दर्शन को आज भारत को जरूरत है। तभी भारत स्वामी में न्याय और समानता आ सकती है।

                          *कांतिलाल मांडोत*

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