*श्रद्धांजलि : संघर्ष, सादगी और करुणा की अमिट पहचान – पूज्य बड़े भ्राता श्री दीपचन्दजी मांडोत*
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*श्रद्धांजलि : संघर्ष, सादगी और करुणा की अमिट पहचान – पूज्य बड़े भ्राता श्री दीपचन्दजी मांडोत*
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने कर्म, व्यवहार और मानवीय गुणों के कारण पूरे समाज की अमूल्य धरोहर बन जाते हैं। पूज्य बड़े भ्राता श्री दीपचन्दजी मांडोत ऐसे ही विलक्षण व्यक्तित्व थे। उनका जीवन संघर्ष, परिश्रम, ईमानदारी, करुणा, सादगी और मानवीय मूल्यों की एक ऐसी प्रेरणादायी गाथा है, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्गदर्शन देती रहेगी। उनके निधन से केवल मांडोत परिवार ही नहीं, बल्कि समूचे जैन-अजैन समाज ने एक ऐसे सज्जन, सरल और सम्मानित व्यक्ति को खो दिया है, जिसकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकेगी।
बड़े भाईसाहब का जीवन किसी सुविधा या वैभव के बीच नहीं, बल्कि कठिन संघर्षों के बीच शुरू हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा कमोल, तरपाल और नान्देशमा में हुई। उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर थी। संसाधनों का अभाव था, लेकिन उनके भीतर शिक्षा प्राप्त करने और जीवन में आगे बढ़ने की अदम्य इच्छा थी। वे प्रतिदिन लगभग चार किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते थे। तपती धूप हो, कड़ाके की सर्दी हो या वर्षा का मौसम, उन्होंने कभी कठिनाइयों को अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने दिया। यही संघर्ष आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत बना।
नान्देशमा में वे श्रद्धेय लहरिलालजी सिंघवी सा के यहां रहकर स्कूल की शिक्षा प्राप्त करते थे। सीमित साधनों के बीच भी उन्होंने जीवन के हर अनुभव से सीख ली। अभावों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि और अधिक मजबूत बनाया। बचपन से ही उनमें मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास के गुण स्पष्ट दिखाई देते थे।
युवावस्था में परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के उद्देश्य से वे पालघर के पास एक गांव में नौकरी करने गए। लेकिन वहां स्वास्थ्य अनुकूल नहीं रहने के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ा। कई लोग ऐसी परिस्थितियों में निराश हो जाते हैं, किंतु भाई साहब ने कभी हार नहीं मानी। वे मानते थे कि जीवन में आने वाली हर बाधा एक नई दिशा देने के लिए आती है।
इसके बाद जसवंतगढ़ निवासी हमारे रिश्तेदार वेनीचन्दजी सा तलेसरा उन्हें सूरत लेकर आए। यही वह मोड़ था जिसने उनके जीवन को नई दिशा दी। सूरत में उन्होंने लंबे समय तक वेनीचन्द सा तलेसरा के सान्निध्य में रहकर व्यापार की बारीकियां सीखीं। उन्होंने व्यापार को केवल लाभ कमाने का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे विश्वास, ईमानदारी और रिश्तों की नींव पर खड़ा किया।
बाद में हमारे पूज्य जीजाजी श्री चुनीलालजी कच्छारा के सहयोग से उन्होंने लायन सिल्क मिल में भागीदारी के रूप में अपना व्यवसाय प्रारंभ किया। आगे चलकर मीठालालजी कच्छारा सा के साथ उनकी दीर्घकालीन भागीदारी रही, जिसने व्यापार को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। कपड़ा उद्योग में उन्होंने अपनी मेहनत, दूरदृष्टि और साख के बल पर एक विशिष्ट पहचान बनाई।
उनकी ईमानदारी और विश्वसनीयता का आलम यह था कि बाजार में केवल उनका नाम ही विश्वास की गारंटी माना जाता था। लोग कहते थे कि “लायन वाले दीपचन्दजी” का नाम लेते ही काम आसान हो जाता है। व्यापारिक जगत में उनकी इतनी प्रतिष्ठा थी कि उनके नाम पर लाखों रुपये का माल उधार मिल जाता था। यह सम्मान धन से नहीं, बल्कि वर्षों की सत्यनिष्ठा, व्यवहार-कुशलता और भरोसे से अर्जित हुआ था।
उन्होंने केवल स्वयं सफलता प्राप्त नहीं की, बल्कि अनेक लोगों को व्यापार की राह दिखाई। उनके मार्गदर्शन में कई युवाओं ने व्यापार सीखा और आज वे सफल व्यवसायी हैं। वे सभी उन्हें अपना गुरु मानते हैं और आदरपूर्वक स्मरण करते हैं। बड़े पापा का मानना था कि ज्ञान बांटने से बढ़ता है, इसलिए उन्होंने कभी किसी को सीख देने में संकोच नहीं किया।
व्यापार में जितने सफल थे, मानवीय गुणों में उससे कहीं अधिक समृद्ध थे। उनका स्वभाव अत्यंत सौम्य, मिलनसार और स्नेहपूर्ण था। वे छोटों को अपार स्नेह देते थे और बड़ों का पूरा सम्मान करते थे। उनकी मधुर वाणी हर किसी का मन जीत लेती थी। उनसे मिलने वाला व्यक्ति अपनेपन का अनुभव करता था। उनके चेहरे पर हमेशा रहने वाली मुस्कान और सहज व्यवहार लोगों के दिलों में विशेष स्थान बना लेते थे।
बच्चों के प्रति उनका विशेष प्रेम था। बच्चों के साथ वे स्वयं भी बच्चे बन जाते थे। उनके मन की पवित्रता, निष्कपटता और भोलापन उनकी सबसे बड़ी पहचान थी। आज के समय में जहां स्वार्थ और दिखावे का बोलबाला है, वहां बड़े भाईसाहब का जीवन सादगी और निष्काम भाव का अद्भुत उदाहरण था।
उनके व्यक्तित्व का सबसे उज्ज्वल पक्ष उनकी करुणा थी। वे सचमुच करुणा की जीती-जागती प्रतिमूर्ति थे। किसी का दुख देखकर उनका हृदय द्रवित हो उठता था। जरूरतमंद की सहायता करना वे अपना कर्तव्य मानते थे। समाज का कोई भी धार्मिक, सामाजिक या मानवीय कार्य हो, वे सदैव अग्रणी भूमिका निभाते थे। उन्होंने जीवनभर लोगों को जोड़ा, सहयोग दिया और प्रेम बांटा।
उनकी कृतज्ञता भी अद्भुत थी। जिन्होंने जीवन में कभी उनका साथ दिया, उन्हें वे जीवनभर याद रखते थे। सफलता मिलने के बाद भी उन्होंने कभी अपने संघर्षों को नहीं भुलाया और न ही उन लोगों को, जिन्होंने कठिन समय में उनका साथ निभाया था। यही गुण उन्हें सबसे अलग और महान बनाते थे।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब उनकी यादें, उनके संस्कार, उनके आदर्श और उनका स्नेह हमारे हृदयों में सदैव जीवित रहेंगे। वे अपनी धर्मपत्नी मीना देवी , पुत्र विजेश कुमार मांडोत दो पुत्रिया भावना और पायल तथा समस्त परिवार को शोकाकुल छोड़ गए हैं, किंतु उनके द्वारा दिए गए जीवन-मूल्य और प्रेरणाएं हमेशा हमारा मार्गदर्शन करती रहेंगी।
उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक युग का अवसान है। मांडोत परिवार ही नहीं, बल्कि समाज का हर वह व्यक्ति जिसने उन्हें निकट से जाना, आज स्वयं को अनाथ-सा महसूस कर रहा है। फिर भी हमें संतोष है कि उन्होंने अपना जीवन पूर्ण गरिमा, ईमानदारी और मानवता के साथ जिया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियां कभी भी सफलता के मार्ग में बाधा नहीं बनतीं, यदि मन में दृढ़ संकल्प, परिश्रम और सच्चाई हो।
पूज्य बड़े भ्राता श्री दीपचन्दजी मांडोत आज भले ही हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष, उनका प्रेम, उनकी करुणा, उनकी मुस्कान और उनका प्रेरणादायी व्यक्तित्व सदैव हमारे हृदयों में जीवित रहेगा।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोकाकुल परिवार को यह अपार दुःख सहन करने की शक्ति दें।
*कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*
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